अतिसार और संग्रहणी का घरेलु इलाज, लक्षण. कारण Atisar ka Ilaj (Diarrhea)

अतिसार और संग्रहणी आंतों के रोग है। अतिसार (पतले दस्त) शरीर के संपूर्ण जल के दूषित होने के कारण होता है। इसमें बार-बार मल त्याग करना पड़ता है या मल बहुत पतले होते हैं या दोनों ही स्थितियां हो सकती हैं। पतले दस्त, जिनमें जल का भाग अधिक होता है, थोड़े-थोड़े समय के अंतर से आते रहते हैं। पेट में दर्द, मरोड़, ऐठन तथा भारीपन महसूस होता है। लेकिन जब आंतो की ग्रहण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है तो संग्रहणी होती है। संग्रहणी में अतिसार की तरह पतले दस्त नहीं होते। इस में कभी गाढ़ा, कभी बंधा हुआ, कभी पतला मल उतरता है। पेट में दर्द कम होती है।

कारण –

अतिसार अंतड़ियों में अधिक द्रव के जमा होने, अंतड़ियों द्वारा तरल पदार्थ को कम मात्रा में अवशोषित करने या अंतड़ियों में मल के तेजी से गुजरने की वजह से होता है। इसके अलावा खान-पान जैसे: खान-पान की गड़बड़ी, अधिक खाना खाने, विषाक्त और चिकनी चीजें खाने, शराब पीने, गंदी और सड़ी चीजें खाने, दस्तावर वस्तुओं (वह खाने की वस्तुऐं जो दस्त लाती हैं) के खाने, दूषित पानी पीने, बर्फ का अधिक सेवन करने, मौसम परिवर्तन (ठंडी से गर्मी और गर्मी से ठंडी में जाने पर), रात को अधिक जागना, रात को ठंड लगना, भय, शोक होना, मानसिक कष्ट होना, पेट में कीड़े होना, गर्म-मसालों और उत्तेजक चीजों के खाने आदि कारणों से पतले दस्त आने शुरू हो जाते हैं। साथ ही म्यूकस कोलाइटिस, अलसरेटिव कोलाइटिस, अमीबा जीवाणुओं के कारण से यह रोग होता है।

लक्षण –

अतिसार का मुख्य लक्षण और कभी-कभी अकेला लक्षण, विकृत दस्तों का बार-बार आना होता है। तीव्र दशाओं में उदर के समस्त निचले भाग में पीड़ा तथा बेचैनी प्रतीत होती है अथवा मलत्याग के कुछ समय पूर्व मालूम होती है। धीमे अतिसार के बहुत समय तक बने रहने से, या उग्र दशा में थोड़े ही समय में, रोगी का शरीर कृश हो जाता है और जल ह्रास (डिहाइड्रेशन) की भयंकर दशा उत्पन्न हो सकती है। खनिज लवणों के तीव्र ह्रास से रक्तपूरिता तथा मूर्छा (कॉमा) उत्पन्न हो सकती है।

इसके आलावा अतिसार से पीड़ित रोगी में इस प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं जैसे(- नाभि, पेट, गुदा और दिल में दर्द, भूख कम होना, अधिक प्यास लगना, पेट में गुड़गुडाहट होना, शरीर में कमजोरी आना, किसी काम में मन न लगना, पानी की कमी, शरीर में कम्पन्न और टूट का होना, बेचैनी, आंखे बैठना, जीभ मैली होना, नब्ज की गति धीमी होना तथा पतला मल तेल गति से त्याग होना आदि।

अतिसार का घरेलु आयुर्वेदिक इलाज –

निंबू बीज सहित पीस लें और पेस्ट बनालें। एक चम्मच पेस्ट दिन में तीन बार लेने से अतिसार में फ़ायदा होता है।

अदरक, कच्चे बेल का गूदा और गुड़ मिलाकर मट्ठे के साथ पीने से अतिसार संग्रहणी में तत्काल लाभ मिलता है।

सौंप को घी में तलकर मिश्री मिलाकर उसे मुंह में चूसने से अतिसार एवं आंव में आराम मिलता है।

जीरे का चूर्ण (भुना हुआ) दही के साथ खिलाने से अतिसार में आराम मिलता है। इसे पांच-छह ग्राम से ज्यादा ना लें।

दस्त रोकने के लिए दही के साथ इसबगोल की भूसी का प्रयोग करें।

50 ग्राम शहद पाव भर पानी में मिलाकर पीने से दस्त नियंत्रण में आ जाते हैं।

पतले दस्त में पुदीने का अर्थ लाभदायक होता है।

अतिसार और संग्रहणी में छोटी पीपली का चूर्ण शहद में मिलाकर देने से आराम मिलता है।

दस्त लगने पर भुना हुआ धनिया पीसकर रोगी को देना चाहिए। यदि दस्त के साथ खून भी आ रहा हो तो धनिया पानी में भिगोकर उसे पीस लेना चाहिए और छान कर देना चाहिए।

अतिसार रोग दूर करने का एक साधारण उपाय है केला दही के साथ खाएं। इससे दस्त बहुत जल्दी नियंत्रण में आ जाते हैं।

दस्त अधिक लगने पर अथवा पेट में वायु विकार होने पर तेजपात के पत्तों का काढ़ा पिलाना चाहिए। तत्काल आराम मिलेगा।

अत्यधिक दस्त होने पर दालचीनी की छाल के चार हिस्से चूर्ण में, एक हिस्सा कथा मिलाकर उसको पानी में उबाल कर काढ़ा बना ले। यह काढ़ा रोगी को देने से दस्त बंद हो जाते हैं।

भांगरे का रस दही के साथ लेने से पतले दस्त रुक जाते हैं।

बेल के मुरब्बे का एक टुकड़ा लगभग 20-25 ग्राम का प्रतिदिन सुबह शाम खाने से दस्त बंध कर आने लगता है।

अदरक की चाय बनाकर पीने से अतिसार में लाभ होता है और पेट की ऐंठन दूर होती है।

बबूल के पत्तों का रस पीने से सभी तरह के अतिसार में लाभ होता है।

2 माशे जावित्री दही की मलाई या गाय के दही में, 7 दिन तक लेने पर कैसा भी अतिसार हो लाभ पहुंचता है।

लोहे की कटोरी या तवे पर जरा सी घी डालकर हरड़ भून लें और उसमें 3-4 माशे दस्त के रोगी को खिलाएं। जरुर लाभ होगा। यह कमजोर रोगी के लिए उत्तम एवं प्रभावी औषधि है।

चावलों का माड़ दिन में कई बार पिलाने से भी दस्तो में आराम मिलता है।

बबूल के कोमल पत्ते, जल में पीसकर और पानी मिलाकर पीने में अतिसार में लाभ पहुंचता है।

भुनी हुई सौंठ, भुनी हुई सौंफ और बड़ी इलायची का छिलका सबका संभाग लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। सवेरे शाम इस चूर्ण की फंकी लेकर ऊपर से थोड़ा सा जल पी ले। दस्त बंद हो जाएंगे।

सूखे आंवले, बंशलोचन, छोटी इलाइची और धनिया -सभी को बराबर लेकर कूट-पीस लेl जितना वजन हो जाए उतना ही उस में मिश्री मिला लें। सुबह-शाम छः माशे सेवन करने से हर तरह के अतिसार में आराम मिलेगा।

कुटजारिष्ट नामक औषधि (बाजार मे मील जायेगी) अतिसार, पेचिश, खूनी पेचिश आदि में लाभ करती है। इस औषधि को 2 चम्मच आधा कप पानी में डाल कर दिन में तीन बार पीना चाहिए।

जामुन की छाल अथवा आम की छाल पीसकर दूध या शहद के साथ पिलाने से खूनी दस्त बंद हो जाते हैं।

बड़ का दूध नाभि में भर लेने से नाभि के चारो ओर लेप करने से भी दस्त रुक जाते हैं।

पुराने चावल का भात, दलिया, खिचड़ी, मसूर की दाल, नींबू, अनान्नास, सेब और अनार का रस, आंवला, मौसम्मी, बेल का मुरब्बा, छाछ, बार्ली, सागूदाना, केला, दही, गर्म पानी, जौ का माड़, बेल, चीकू, शरीफा, साबूदाने की खीर, आम का रस, छेने का पानी और कांजी आदि का सेवन करना रोगी के लिए लाभकारी होता है।

परहेज –

गेहूं, उड़द, जौ, रोटी, दाल, काशीफल, बथुआ, सहंजना, आम, बेर, मकोय, पेठा, ईख, गुड़, लहसुन, आंवला, सोया, पोई का साग, पालक, मेथी, ककड़ी, कन्दों का साग, पान, भारी अन्न, भारी पानी, दषित पानी, बासी पानी, दही का तोड़, जवाखार, खीरा, खरबूजा, सज्जीखार आदि क्षार, नमकीन और खट्टे वस्तुऐं आदि चीजों का सेवन करना रोगी के लिए हानिकारक होता है। क्रोध, रूखे (खुश्क) पदार्थ, देर से पचने वाले भारी भोजन, मिर्च-मसालादार खाद्य पदार्थ, गर्म, नशीली चीजें, दाल, खटाई, अधिक भोजन, सड़ी गली, विरुद्ध-भोजन, अंजन, तम्बाकू, स्नान, रात को जागना, सहवास (संभोग, स्त्री-प्रसंग), नस्य और अधिक पानी पीना आदि कारणों से रोगी को दूर रहना चाहिए।


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