वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की जीवनी | Alexander fleming biography in hindi

Sir Alexander Fleming / अलेक्जेंडर फ्लेमिंग स्कॉटलैण्ड के जीव वैज्ञानिक एवं औषधि निर्माता (Pharmacologist) थे। इन्होंने पेनिसिलिन का आविष्कार करके मानवता को संक्रामक रोगों की भयानकता से मुक्त किया। इन्हीं के बदौलत आज करोड़ो जिंदगियां बचाई जा सकती है।

वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की जीवनी | Alexander fleming biography in hindiवैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग – Alexander Fleming Biography In Hindi

अलेक्जेंडर फ्लेमिंग का जन्म दक्षिण-पश्चिमी स्कॉटलैंड में 6 अगस्त, 1881 में हुआ था। इनके पिता का नाम हफ फ्लेमिंग था। और माँ का नाम ग्रेस स्टिरलिंग मोर्टों था। अपने 8 भाई बहनों में वह सबसे छोटे थे। अभी वह 8 साल के ही थे उनके पिता की मृत्यु हो गई। एक बार के लिए तो लगा कि फ्लेमिंग परिवार मुखिया के मर जाने से बिखर कर रह जाएगा परंतु उनकी मां एक जिंदादिल तबीयत की महिला थी वह व्यवहार और चरित्र दोनों से बहुत अच्छी थी। उन्होंने बड़ी आसानी से परिवार को संभाल लिया और बच्चो का पालन पोषण किया।

अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की प्रारंभिक शिक्षा लूइन मोर स्कूल में संपन्न हुई। इसके बाद उन्होंने डार्वेल स्कूल में एडमिशन लिया। उनके शुरुआती दिन काफी संघर्ष पूर्ण थे। स्कूल जाते वक्त उन्हें 6KM पैदल पहाड़ी पर चढ़ना उतरना पड़ता था। परंतु इस दैनिक पैदल यात्रा ने उन्हें प्रकृति को काफी करीब से देखने-परखने का मौका दिया। उनकी बुद्धि काफी कुशाग्र थी। 12 साल का होते होते उन्हें किल्मरनोक एकेडेमी भेज दिया गया।

अलेग्जेंडर ने चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने का निश्चय किया। स्कूल के रिकॉर्ड में आज भी दर्ज है कि वे अपने समय में अपनी श्रेणी में सदैव प्रथम रहे। पढ़ाई लिखाई के अतिरिक्त और कार्यों में भी उनकी दिलचस्पी कम नहीं थी। वह राइफल टीम के मेंबर थे तो स्विमिंग और वाटर पोलो भी उनके शौक में शामिल थे। यही नहीं बल्कि शौकिया नाट्य-प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए भी वक्त निकाल लिया करते।

सन 1906 में सेंट मैरी हॉस्पिटल मेडिकल स्कूल से डिग्री प्राप्त करने के बाद प्रतिजीवी पदार्थो पर काम करना आरंभ किया। इसके बाद वे रॉयल आर्मी मेडिकल कोप्स में चले गए प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने पर सन 1918 में वह फिर से सेंट मैरी मेडिकल स्कूल लौट आए। सन 1928 की बात है जब वह रोगो के जीवाणुओं के साथ कुछ प्रयोग कर रहे थे तो आकस्मिक रुप से उन्होंने पेनिसिलीन जैसे जीवनदाई औषधिक का आविष्कार कर डाला। पेनिसिलिन आविष्कार की कहानी बड़ी दिलचस्प है।

फ्लेमिंग अपने प्रयोगों के लिए पेट्रीडिश काम में लगा रहे थे। एक दिन फोड़ो से प्राप्त पीप में मौजूद जीवाणुओं पर प्रयोग करते समय प्रोफेसर फ्लेमिंग ने एक आश्चर्य बात देखी। उन्होंने देखा की पेट्रीडिश में पड़ी जैली में फफूंद उग आई थी। जहां पर भी यह फफूंद उगी थी, वहां सभी बैक्टेरिया मर गए थे। इस फफूंद का जन्म शायद हवा में उड़ कर आए हुए उन बीजाणुओं से हुआ था जो उनकी प्रयोगशाला में खुली खिड़की से प्रवेश करके खुली पेट्रीडिश पर जम गए थे। उन्होंने इस फफूंद का पता लगाया और पाया कि यह पेनिसिलियम नोटाडेम थी। यह फफूंद परिवार की एक वायरल किस्म थी।

इस अकस्मात् हुई घटना को फ्लेमिंग ने कई बार दोहराया। सबसे पहले उन्होंने पेनिसिलियम कि उस विरल किस्म के नमूने उगाए। फिर उस फफूंदी से निकाले गए रस द्वारा रोग जीवाणुओ पर प्रभाव का अध्ययन किया। प्रयोग को कई प्रकार के जीवाणुओं के साथ दोहराकर कर उन्होंने पता लगाया कि इस फफूंद से निकले रस का रोग जीवाणुओ पर घातक प्रभाव पड़ता है। वह इस रस से मर जाते हैं।

यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण अविष्कार था क्योंकि उन्होंने एक ऐसा द्रव प्राप्त कर लिया था, जो रोगाणुओं को पैदा होने से रोकता था। चूँकि यह रस पेनिसिलियम फफूंद से प्राप्त किया गया था इसलिए इसका नाम पेनिसिलिन रखा। फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन घोल के साथ अनेक प्रयोग किए। उन्होंने पाया कि इस घोल को हल्का कर लेने पर भी इसका प्रभाव जीवाणुओं पर पड़ता है।

शुरूआत में पेनिसिलीन की ओर चिकित्सा जगत का आकर्षण कम ही रहा। इसके पीछे कई कारण थे। एक तो इसके प्लांट यानि फफूंदी को उगाना बहुत मुश्किल था, और इससे एण्टीबायोटिक कारक अलग करना और भी दुष्कर था। तो इस वजह से इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन खर्चीला और कठिन था। दूसरी दुश्वारी पेनिसिलीन के साथ यह थी कि यह मानव शरीर में बहुत थोड़ी देर टिकती थी और अधिकतर मूत्र के साथ निकल जाती थी। उस समय के चिकित्सक इसकी कीमत को देखते हुए मूत्र से निकली दवा पुनः उपयोग में ले आते थे।

अंत में इस समस्या का समाधान किया सन 1938 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हॉवर्ड फ्लोर और अर्नस्ट चेन ने। उन दोनों ने एक जटिल प्रक्रम द्वारा इस औषधि को स्थिर कर दिया। इस प्रक्रम को ‘फ्रीज ड्राइंग’ कहते हैं।

सन 1941 के अंतिम दिनों में फ्लेमिंग अमेरिका गए और वहां उन्होंने पेनिसिलीन को अलग करने की विधि के विषय में अनेक वैज्ञानिकों से विचार विमर्श किए। अमेरिका के औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में उन्हें भरपूर सहयोग किया। अनेक महीनों की सक्रियता और प्रयासों के बाद पेनिसिलिन को बहुत अधिक मात्रा में पृथक करने की विधि मालूम कर ली गई। शीघ्र ही इस औषधि का निर्माण और प्रयोग विस्तृत रुप से होने लगा। देखते ही देखते यह औषधी चिकित्सा जगत की रीड बन गई।

पेनिसिलीन स्कारलेट फीवर (Scarlet Fever), निमोनया (Pneumonia), मेनिनजाइटिस (Meningitis) और डिप्थीरिया (Diphtheria) जैसी बीमारियों में काफी कारगर है। सामान्यत: ऑपरेशन के समय सर्जन इसे रोगियों को देते हैं। पेनिसिलिन कई प्रकार के जीवाणुओं को पैदा होने या फैलने से रोकता है। यौन रोगों पर नियंत्रित करने के लिए यह बहुत ही प्रभावकारी औषधि है।

बाद में अनेकों तरह के एण्टीबायोटिक के आविष्कार हुए। फ्लेमिंग ने यह भी ज्ञात कर लिया था कि बैक्टीरिया एण्टीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता भी पैदा कर लेते हैं। अतः उन्होंने इसके प्रयोग में सावधानी बरतने को कहा और बताया कि जब तक बहुत जरूरी न हो इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। आज अच्छे चिकित्सक इसका प्रयोग कम ही करते हैं।

इस महान खोज के लिए सन 1945 का चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार फ्लेमिंग, फ्लोरा और चेन को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। इस खोज से फ्लेमिंग का नाम विश्व भर में प्रसिद्ध हो गया। 11 मार्च 1955 को 73 साल की उम्र में लंदन में फ्लेमिंग की मृत्यु हुई।


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