एडवार्ड जेनर की जीवनी | Edward Jenner Biography In Hindi

Edward Jenner / एडवार्ड जेनर इंग्लैंड के चिकित्सक, वैज्ञानिक और अविष्कारक थे। विश्व में इनका नाम इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि इन्होंने ‘चेचक’ जैसे घातक बीमारी के टीके का आविष्कार किया था। 

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एडवार्ड जेनर का जन्म 17 मई, सन्‌ 1749 को बर्कले, इंग्लैंड में हुआ। उनके पिता, रेवरेंड स्टीफन जेनर, बर्कले के पादरी थे, जेनर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 13 वर्ष की उम्र में ब्रिस्टल के पास सडबरी नामक एक छोटे से गांव में की और इसके बाद उन्होंने लंदन के सर्जन जॉन हंटर की देखरेख में 21 वर्ष की आयु तक अध्ययन किया। इनके पिता पादरी थे जिस कारण इनका शिक्षा की बुनियादी भी मजबूत थी।

इन्होंने चेचक के टिके का अविष्कार इंग्लैंड में प्रचलित एक मान्यता के अनुसार की थी – मान्यता थी की जिसे (cowpox) हो चुकी है उसे चेचक नहीं हो सकती हैं’ इसी को आधार मानकर जेनर ने चेचक के टिके का अविष्कार किया। शीतला-काउ की बीमारी गायो के थनों पर पड़ता है और जो भी इस रोग से पीड़ित गाय का दूध दुहता है उसे यह बीमारी हो जाती है इस रोग से छोटे छोटे घाव-फुंसियां हाथों में हो जाती है लेकिन रोगी को कोई विशेष कष्ट नहीं होता।

सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल, लंदन में अपना परिक्षण पूरा करने के बाद जेनर अपने गांव आ गए और अपनी प्रेक्टिस शुरु कर दी। कई वर्षों बाद जब उन्होंने चेचक की भयानकता का अनुभव किया। तभी उन्होंने शीतला-काउ बीमारी का कथन सुना। इसके बाद जेनर ने इस कथन का परीक्षण करने का निश्चय किया। उन्होंने एक गौ-शीतला से पीड़ित व्यक्ति के घाव से कुछ द्रव लिया और उसे एक पांच साल के जेंमस फिप्स नामक बच्चे को इंजेक्शन लगा दिया। बच्चे को गौ-शीतला का हल्का-सा प्रकोप हो गया। उसे 7 सप्ताह बाद जेनर ने एक व्यक्ति के घाव से जिसे चेचक निकली हुई थी, कुछ पस लेकर उस लड़के को इंजेक्शन लगा दिया। इस लड़के को चेचक निकलने की कोई शिकायत न हुई। इससे जेनर को पूरा विश्वास हो गया कि लड़का को गौ-शीतला के कारण चेचक से प्रतिरक्षित हो गया है। और इस प्रकार उन्होंने चेचक का इलाज इजाद की।

हालांकि शुरूआती दौर में कई लोगो को इस बात पर विश्वास नही हुआ, और जेनर पर विरोध प्रदर्शन किये। लेकिन जेनर इन सब बातो पर ध्यान नहीं दिए और वे गौ-शीतला का द्रव इकठ्ठा करने में लगे रहे। धीरे-धीरे चारो तरफ ये बात फ़ैल गयी। लोगो दूर-दूर से टिक लगवाने आने लगे और इसी तरह दुनिया को चेचक टिका मिल गया। जेनर कुछ दिन में ही विश्वविख्यात हो गए।

इन्होंने यह भी सिद्ध किया कि गोमसूरी (cowpox) में दो विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ सम्मिलित है, जिनमें से केवल एक चेचक से रक्षा करती है। इन्होंने यह भी निश्चित किया कि गोमसूरी, चेचक और घोड़े के पैर की ग्रीज़ (grease) नामक बीमारियाँ अनुषंगी हैं। सन्‌ 1798 में इन्होंने ‘चेचक के टीके के कारणों और प्रभावों’ पर एक निबंध प्रकाशित किया।

1803 में ‘चेचक’ के टीके के प्रसार के लिये ‘रॉयल जेनेरियन संस्था’ की स्थापना हुई। एडवर्ड जेनर के कार्यों के उलक्ष्य में ‘आक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय’ ने इन्हें ‘एम. डी.’ की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया। 1806 में ब्रिटिश संसद ने जेनर को अच्छी-खासी धन राशि दे कर सम्मानित किया। 1822 में ‘कुछ रोगों में कृत्रिम विस्फोटन का प्रभाव’ पर निबंध प्रकाशित किया और दूसरे वर्ष ‘रॉयल सोसाइटी’ में ‘पक्षी प्रर्वाजन’ पर निबंध लिखा।

इसके बाद भी जेनर ने जानवरी सम्बंधित कई अनुसन्धान किये। एडवर्ड जेनर के इस आविष्कार से आज करोड़ों लोग चेचक जैसी घातक बीमारी से ठीक हो रहे हैं और अपने जीवन का आनन्द ले रहे हैं। यदि एडवर्ड जेनर नहीं होते तो आज सम्पूर्ण दुनिया के 1.5 करोड़ लोग प्रतिवर्ष सिर्फ़ ‘चेचक’ के द्वारा काल के ग्रास बन रहे होते। 26 जनवरी, 1823 को बर्कले में एडवर्ड जेनर का देहावसान हुआ।


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