वी.वी. गिरि की जीवनी | Varahagiri Venkata Giri Biography in Hindi

V. V. Giri – श्री वराहगिरि वेंकट गिरि को पूरी दुनिया में वी वी गिरी (V.V Giri) के रूप में जानती है। वह भारत के चौथे राष्ट्रपति बने थे। ‘भारत रत्न’ से सम्मानित वी. वी. गिरि भारत के राष्ट्रपति पद के आलावा उत्तर प्रदेश, केरल और कर्णाटक के राज्यपाल भी रहे।

वी.वी. गिरि की जीवनी | Shri Varahagiri Venkata Giri Biography In Hindi

वी.वी. गिरि का परिचय – V. V. Giri Biography in Hindi

पूरा नाम वाराहगिरि वेंकट गिरि (Shri Varahagiri Venkata)
जन्म दिनांक 10 अगस्त, 1894
जन्म भूमि बेहरामपुर, ओड़िशा
मृत्यु 23 जून, 1980, मद्रास
पिता का नाम वी.वी. जोगिआह पंतुलु
माता का नाम श्रीमती सुभ्र्दम्म
शिक्षा विधि स्नातक
कर्म-क्षेत्र भारत के चौथे राष्ट्रपति
नागरिकता भारतीय
कार्यकाल (13 मई, 1967 – 3 मई, 1969)
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न

डॉक्टर जाकिर हुसैन के राष्ट्रपति निर्वाचित होने तक अलिखित रुप से यह सहज सम्मति थी की अचानक राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर उपराष्ट्रपति को ही राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण कराई जाए अथवा उपराष्ट्रपति ही अगले राष्ट्रपति चुन लिए जाएं। 13 मई 1969 को जब डॉक्टर जाकिर हुसैन की असमय मृत्यु हो गई तो श्री वी वी गिरी ही कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गए। लेकिन उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि निर्वाचन के बिना स्वत: प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति बन जाए।

निर्वाचन की अनिवार्यता के कारण कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद हेतु नीलम संजीव रेड्डी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। ऐसे में कार्यवाहक राष्ट्रपति वी वी गिरी ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देकर स्वतंत्र उम्मीदवार की हैसियत से राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निश्चय किया। यह विजयी भी हुए और भारत के चौथे राष्ट्रपति बने।

प्रारंभिक जीवन – Early Life of V. V. Giri  in Hindi

वी वी गिरी का जन्म 10 अगस्त 1894 को बरहमपुर ग्राम में हुआ था। तब बरहमपुर गंजम जिले में आता था और यह जिला मद्रास के अधीन था। वर्तमान में गंजम जिला उड़ीसा का भाग है। वी वी गिरी के पिता का नाम बीवी जोगिया पंतुलु और माता का नाम श्रीमती सुभ्र्दम्म था। 12 संतानों में उनका क्रम दूसरा था। वह सात भाई थे और इनकी पाँच बहने थी। वी वी गिरी नियोगी ब्राह्मण परिवार से थे जो आर्थिक रुप से संपन्न था उनके परिवार में प्रसिद्ध वकील भी थे और सरकारी कर्मचारी भी।

वी वी गिरी की आरंभिक शिक्षा कालिकोट तथा बरहमपुर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास में सीनियर कैंब्रिज का इम्तिहान दिया और 1913 में आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। वह अगस्त 1913 में आयरलैंड के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में नामजद हुए तथा अक्टूबर 1913 कानून की पढ़ाई करने हेतु चयनित हुए। उस समय वहां अन्य विषयों को भी पढ़ाया जाता था। उन्होंने साहित्य, अर्थशास्त्र, राजनीति के विज्ञान, संवैधानिक कानून और अंतर्राष्ट्रीय कानून जैसे विषय स्नातक स्तर की परीक्षा हेतु लिए।

वी वी गिरी स्वतंत्र विचार वाले उदार व्यक्ति थे और रुढ़िवादी विचारों से दूर रहते थे। लेकिन विदेश में रहते हुए उनके विचारों में मौलिक परिवर्तन हुआ। वहां जाने के बाद वह एमोन-डी-वालेरा के संपर्क में आए जो ज्वलंत विचारों वाले राष्ट्रवादी थे और आयरलैंड की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे।

कैरियर – Varahagiri Venkata Giri Career History

विद्यार्थी जीवन में ही वी वी गिरी की मुलाकात महात्मा गांधी से लंदन में हुई थी। इन दिनों वह अपना ग्रीष्मकालीन अवकाश गुजारने के लिए लंदन आए हुए थे। वहाँ गाँधी जी से वी वी गिरी के अनेक मुलाक़ातें हुई। उन दिनों सुभाष चंद्र बोस सहित कई भारतीयों का मानना था कि अंग्रेजों का साथ किसी भी कार्य में नहीं देना चाहिए। लेकिन गांधीजी ने इंग्लैंड में रह रहे भारतीयों से अपील की कि वे रेड क्रॉस सोसाइटी के सदस्य बने।

इस से प्रेरित होकर वी वी गिरी ने रेड क्रोस को सप्ताह में एक दिन अपना सेवाएं देने आरंभ कर दिया। लेकिन तभी उनके दिमाग में यह उथल-पुथल मचाने लगी कि वह गांधी जी के विचारों पर विश्वास रखें या अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुरूप चले लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रही। उन्होंने आयरलैंड में भारतीय विद्यार्थी संघ की स्थापना कर दी फिर वो आयरलैंड में रहने तक उसके सेक्रेटरी बने रहें।

प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ होने के कारण वी वी गिरी 10 सितंबर 1916 को भारत लौट आए। 22 वर्ष की कम उम्र में उन्होंने बलरामपुर में वकालत आरंभ कर दिया और राष्ट्रीय गतिविधियों में भाग लेने लगे। 1916 में वी वी गिरी ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली और स्वदेशी शासन का आंदोलन से जुड़ गए जो श्रीमती एनी बेसेंट द्वारा चलाया जा रहा था।

वर्ष 1922 तक वी.वी. गिरि श्रमिकों के हित में काम करने वाले एन.एम. जोशी के एक विश्वसनीय सहयोगी बन गए थे और अपने गुरु (जोशी) के समर्थन से उन्होंने मजदूर वर्ग की भलाई के लिए कार्य कर रहे संगठनों के साथ खुद को जोड़ा। ट्रेड यूनियन आंदोलन के लिए अपनी प्रतिबद्धता और मेहनत के कारण वे ‘आल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन’ के अध्यक्ष निर्वाचित किये गए। उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन की दिशा में विभिन्न ट्रेड यूनियनों में अपनी पहुंच के कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वर्ष 1931-1932 में एक प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। वे वर्ष 1934 में ‘इम्पीरियल लेजिस्लेटिव असेंबली’ के सदस्य के रूप में चुने गए। वे कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में वर्ष 1936 के आम चुनाव (ब्रिटिश कालीन) में खड़े हुए और इसके साथ ही राजनीति से उनका वास्ता शुरू हुआ। उन्होंने चुनाव जीता और अगले वर्ष मद्रास प्रेसीडेंसी में उन्हें श्रम और उद्योग मंत्री बना दिया।

जब ब्रिटिश शासन में कांग्रेस सरकार ने वर्ष 1942 में इस्तीफा दे दिया, तो वी.वी. गिरि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के लिए श्रमिक आंदोलन में लौट आए। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इसके बाद वर्ष 1946 के आम चुनाव के बाद वे श्रम मंत्री बनाए गए। वी.वी. गिरी का व्यक्तित्व बेहद गंभीर इंसान का था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बन वह पूर्ण रूप से स्वतंत्रता के लिए सक्रिय हो गए थे।

भारत की स्वतंत्रता के बाद वी.वी. गिरि को उच्चायुक्त के रूप में सीलोन (श्रीलंका) भेजा गया था। वहाँ से अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वे भारत लौट आए और पहली लोकसभा के लिए वर्ष 1952 में चुने गए तथा वर्ष 1957 तक कार्य किया। इस दौरान गिरि को केंद्रीय मंत्रिमंडल का सदस्य बनाया गया और वे भारत के श्रम मंत्री बने। वे इस मंत्रालय में वर्ष 1952 से 1954 तक बने रहे।

लोकसभा में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्हें प्रतिष्ठित शिक्षाविदों के समूह का नेतृत्व करने, श्रम एवं औद्योगों से संबंधित मामलों के अध्ययन और प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने का कार्य सौंपा गया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1957 में ‘द इंडियन सोसाइटी ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स’ की स्थापना की गयी।

वे उत्तर प्रदेश, केरल, मैसूर में राज्यपाल भी नियुक्त किए गए। वी.वी. गिरी सन 1967 में ज़ाकिर हुसैन के काल में भारत के उप राष्ट्रपति एवं जब ज़ाकिर हुसैन के निधन के समय भारत के राष्ट्रपति का पद खाली रह गया था, तो उनको कार्यवाहक राष्ट्रपति का स्थान दिया गया। इसके बाद निर्वाचन हुआ और सन 1969 में वी.वी. गिरी देश के चौथे राष्ट्रपति बने।

वी.वी. गिरि का निधन – V. V. Giri Died 

85 वर्ष की आयु में वी.वी. गिरी का 23 जून, 1980 को मद्रास में निधन हो गया। उनको श्रमिकों के उत्थान और देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। वी.वी गिरी एक अच्छे वक्ता होने के साथ-साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। उनमें लेखन क्षमता भी बहुत अधिक और उच्च कोटि की थी। देश के लिए उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें सदैव याद किया जायेगा।


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