सम्राट मिहिर भोज का इतिहास | Samrat Mihir Bhoj History in Hindi

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Mihir Bhoj / मिहिर भोज अथवा भोज प्रथम गुर्जर प्रतिहार वंश का सबसे महान शासक था। इन्होने लगभग 49 साल (836 से 885 ई.) तक राज किया था। उनका साम्राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सतलुज तक विस्तृत था, जिसे सही अर्थों में साम्राज्य कहा जा सकता है। मिहिरभोज विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार का उपासक थे, अत: उन्होंने अपने सिक्कों पर आदि-वराह को उत्कीर्ण कराया था। दिल्ली के मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी। इसके आलावा राष्ट्रीय महामार्ग 24 का कुछ हिस्सा गुर्जर साम्राट मिहिरभोज मार्ग नाम से जाना जाता है।

सम्राट मिहिर भोज का इतिहास | Samrat Mihir Bhoj History in Hindiमिहिर भोज की जीवनी – Mihir Bhoj Biography in Hindi

मिहिर भोज (Mihira Bhoja) के बारे में प्रारंभिक जीवन का कोई लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं। इस कारण हम प्रारम्भिक जानकारी उपलब्ध नहीं करा पाए। सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार अथवा परिहार वंश के क्षत्रिय थे। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। मिहिरभोज गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा नागभट्ट द्वितीय का पौत्र थे। जो की गुर्जर प्रतिहार वंश के सबसे प्रतापी राजा थे।

मिहिर भोज का इतिहास – Samrat Mihir Bhoj History in Hindi

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। उन्होंने 836 ई. के लगभग कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जो आगामी सौ वर्षो तक प्रतिहारों की राजधानी बनी रही। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल में गुर्जरपुर तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था। मिहिर भोज के साम्राज्य को तब गुर्जर देश के नाम से जाना जाता था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। 50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्र पाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।

सम्राट मिहिर भोज के मित्र काबुल का ललिया शाही राजा कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन तथा नैपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिर भोज के उस समय शत्रु, पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज आमोधवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे।

मिहिरभोज ने जब पूर्व दिशा की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहा, तो उन्हें बंगाल के पाल शासक धर्मपाल से पराजित होना पड़ा। 842 से 860 ई. के बीच उन्हें राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भी पराजित किया। पाल वंश के शासक देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी नारायण को भोज प्रथम ने परास्त कर पाल राज्य के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया। दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोधवर्ष को भी पराजित करके उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे।

सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध गुर्जर साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने गुर्जर सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे। सम्राट मिहिर भोज गुर्जर नहीं चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने इसलिए उसने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर गुर्जर साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इसी प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची व आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी।

अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिर भोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिर भोज की महान सेना की तारीफ भी की है साथ ही मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है 915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिर भोज की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिर भोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाई लड़ी।

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज द्वारा चलाये गये सिक्के अरब यात्री सुलेमान और मसूदी ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है ’गुर्जर सम्राट जिनका नाम बराह (मिहिर भोज) है। उसके राज्य में चोर डाकू का भय कतई नहीं है। उसकी राजधानी कन्नौज भारत का प्रमुख नगर है जिसमें 7 किले और दस हजार मंदिर है।

मिहिर भोज अपने जीवन के पचास वर्ष युद्ध के मैदान में घोड़े की पीठ पर युद्धों में व्यस्त रहा। उसकी चार सेना थी उनमें से एक सेना कनकपाल परमार के नेतृत्व में गढ़वाल नेपाल के राघवदेव की तिब्बत के आक्रमणों से रक्षा करती थी। इसी प्रकार एक सेना अल्कान देव के नेतृत्व में पंजाब के वर्तमान गुजराज नगर के समीप नियुक्त थी जो काबुल के ललियाशाही राजाओं को तुर्किस्तान की तरफ से होने वाले आक्रमणों से रक्षा करती थी। इसकी पश्चिम की सेना मुलतान के मुसलमान शासक पर नियंत्रण करती थी। दक्षिण की सेना मानकि के राजा बल्हारा से  तथा अन्य दो सेना दो दिशाओं में युद्धरत रहती थी। सम्राट मिहिर भेाज इन चारों सेनाओं का संचालन, मार्गदर्शन तथा नियंत्रण स्वयं करता था।

मिहिर भोज एक पराक्रमी शासक होने के साथ ही विद्वान एवं विद्या तथा कला का उदार संरक्षक था। अपनी विद्वता के कारण ही उसने ‘कविराज’ की उपाधि धारण की थी। अपने पूर्वज गुर्जर प्रतिहार सम्राट नागभट् प्रथम की तरह सम्राट मिहिर भोज ने अपने पूर्वजों की भांति स्थायी सेना खड़ी की जोकि अरब आक्रान्ताओं से टक्कर लेने के लिए आवश्यक थी। यदि नागभट् प्रथम के पश्चात के अन्य सम्राटों ने भी स्थायी, प्रशिक्षित व कुशल तथा देश भक्त सेना न रखी होती तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता तथा भारतीय संस्कृति व सभ्यता नाम की कोई चीज बची नहीं होती।

मिहिरभोज का एक चुम्बिकिय व्यक्तित्व था, उनकी बहुत बड़ी भुजाये थी, और विशाल नयन थे। उनका लोगों पर एक विचित्र सा प्रभाव पड़ता था। वो हर शेत्र में निपुण थे, कहा जाता है की वो एक प्रबल पराक्रमी, महानधार्मिक, राजनीती में निपुण, और एक महान सम्राट थे। हम यह कह सकते हैं की वो भारत के एक निष्ठावान शासक थे। उनका राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली था। उनके राज्य में चोर और डाकुओं से कोई भय नहीं था। सब लोग आर्थिक सम्पन्नता से खुश थे। आप को यह जानकर ख़ुशी होगी की इनके राज्यकाल में ही भारत को सोने की चिड़िया कहा जात था।

निर्माण कार्य –

भोज प्रथम ने अपनी राजधानी धार को विद्या एवं कला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया था। यहां पर भोज ने अनेक महल एवं मन्दिरों का निर्माण करवाया, जिनमें ‘सरस्वती मंदिर’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके अन्य निर्माण कार्य ‘केदारेश्वर’, ‘रामेश्वर’, ‘सोमनाथ सुडार’ आदि मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त भोज प्रथम ने भोजपुर नगर एवं भोजसेन नामक तालाब का भी निर्माण करवाया था। उसने ‘त्रिभुवन नारायण’, ‘सार्वभौम’, ‘मालवा चक्रवर्ती’ जैसे विरुद्ध धारण किए थे।

नाम –

भोज प्रथम ने ‘आदिवराह’ एवं ‘प्रभास’ की उपाधियाँ धारण की थीं। उसने कई नामों से, जैसे- ‘मिहिरभोज’ (ग्वालियर अभिलेख में), ‘प्रभास’ (दौलतपुर अभिलेख में), ‘आदिवराह’ (ग्वालियर चतुर्भुज अभिलेखों), चांदी के ‘द्रम्म’ सिक्के चलवाए थे। सिक्कों पर निर्मित सूर्यचन्द्र उसके चक्रवर्तिन का प्रमाण है।

सम्मान – 

राष्ट्रीय राजमार्ग 24 जो दिल्ली से लखनऊ को जोड़ता है का नाम भी दिल्ली सरकार ने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के नाम पर रखा है और दिल्ली में निजामुद्दिन पुल है जहां से यह राजमार्ग शुरू होता है। वहां पर दिल्ली सरकार ने एक बड़ा सा पत्थर लगाया है जिस पर लिखा है गुर्जर सम्राट मिहिर भोज राष्ट्रीय राजमार्ग। इसी राजमार्ग पर स्थित स्वामी नारायण संप्रदाय का अक्षरधाम मंदिर है। अक्षरधाम मंदिर में स्थित भारत उपवन में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज महान की धातू की प्रतिमा लगी है और उस पर लिखा है महाराजा गुर्जर मिहिर भोज महान।


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