रणकपुर जैन मंदिर का इतिहास | Ranakpur Jain Temple History in Hindi

Ranakpur Jain Temple / राजस्थान में अरावली पर्वत की घाटियों के मध्य स्थित रणकपुर में ऋषभदेव का चतुर्मुखी जैन मंदिर है। यह मंदिर, जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। चारों ओर जंगलों से घिरे इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। रणकपुर झीलों की खूबसूरत नगरी उदयपुर से 96 कि0मी0 की दूरी पर स्थित है। किंवदंतियों के अनुसार, एक जैन व्यापारी सेठ धरना शाह और मेवाड़ के शासक राणा कुम्भा द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया था। मन्दिर के मुख्य परिसर चमुखा में कई अन्य जैन मंदिर शामिल हैं।

रणकपुर जैन मंदिर का इतिहास | Ranakpur Jain Temple History in Hindi

रणकपुर जैन मंदिर  – Ranakpur ka Jain Mandir in Hindi

रणकपुर का जैन मंदिर खूबसूरत नक्काशी और अपनी प्राचीनता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यह जैन तीर्थंकर आदिनाथ जी को समर्पित है। इसकी गणना भारत के सबसे विशाल और खूबसूरत जैन मंदिरों में होती है। मंदिर परिसर के आसपास ही नेमीनाथ और पार्श्वनाथ को समर्पित 2 मंदिर हैं, जो हमें खजुराहो की याद दिलाते हैं। यहां निर्मित सूर्य मंदिर की दीवारों पर योद्धाओं और घोड़ों के चित्र उकेरे गए हैं, जो अपने आप में एक उत्कृष्ट उदाहरण के समान है। यहां से लगभग 1 किलोमीटर दूरी पर माता अम्बा का मंदिर भी है।

रणकपुर जैन मंदिर का इतिहास – History of Ranakpur Jain Mandir in Hindi

आज से करीब 600 वर्ष पूर्व 1446 विक्रम संवत में इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था, जो 50 वर्षों से अधिक समय तक चला। कहा जाता है कि उस समय में इसके निर्माण में करीब 99 लाख रुपए का खर्च आया था। विक्रम संवत 1953 में इस मंदिर के रखरखाव की जिम्मेदारी एक ट्रस्ट को दे दी गई थी। उसने मंदिर के पुनरुद्धार कार्य को कुशलतापूर्वक कर इसे एक नया रूप दिया।

इस मंदिर का निर्माण 4 श्रद्धालुओं- आचार्य श्यामसुंदरजी, धरन शाह, कुंभा राणा तथा देपा ने कराया था। आचार्य सोमसुंदर एक धार्मिक नेता थे जबकि कुंभा राणा मलगढ़ के राजा तथा धरन शाह उनके मंत्री थे। धरन शाह ने धार्मिक प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर भगवान ऋषभदेव का मंदिर बनवाने का निर्णय लिया था।

कहा जाता है कि एक रात उन्हें स्वप्न में ‘नलिनीगुल्मा विमान’ के दर्शन हुए, जो पवित्र विमानों में सर्वाधिक सुंदर माना जाता है। इसी विमान की तर्ज पर धरन शाह ने मंदिर बनवाने का निर्णय लिया। मंदिर निर्माण के लिए धरन शाह ने कई वास्तुकारों को आमंत्रित किया। इनके द्वारा प्रस्तुत कोई भी योजना उन्हें पसंद नहीं आई। अंततः मुंदारा से आए एक साधारण से वास्तुकार दीपक की योजना से वे संतुष्ट हो गए।

मंदिर निर्माण के लिए धरन शाह को मलगढ़ नरेश कुंभा राणा ने जमीन दी। उन्होंने मंदिर के समीप एक नगर बसाने का भी सुझाव दिया। मंदिर के समीप मदगी नामक गांव को इसके लिए चुना गया तथा मंदिर एवं नगर का निर्माण साथ ही प्रारंभ हुआ। राजा कुंभा राणा के नाम पर इसे ‘रणपुर’ कहा गया, जो बाद में ‘रणकपुर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज का रणकपुर पुरानी विरासत और इसे सहेजकर रखने वालों के बारे में भी संदेश देता है जिनके कारण रणकपुर मात्र एक विचार से वास्तविकता में बदल सका।

मंदिर की बनावट – 

इस मंदिर की इमारत लगभग 40,000 वर्गफीट में फैली है। इस मंदिर में 4 कलात्मक प्रवेश द्वार हैं। मंदिर के मुख्य गृह में तीर्थंकर आदिनाथ की संगमरमर से बनी 4 विशाल मूर्तियां हैं। करीब 72 इंच ऊंची ये मूतियां 4 अलग दिशाओं की ओर उन्मुख हैं। इसी कारण इसे ‘चतुर्मुख मंदिर’ (Chaturmukha Jain Temple) कहा जाता है। इसके अलावा मंदिर में 76 छोटे गुम्बदनुमा पवित्र स्थान, 4 बड़े प्रार्थना कक्ष तथा 4 बड़े पूजन स्थल हैं। ये मनुष्य को जीवन-मृत्यु की 84 योनियों से मुक्ति प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस मंदिर की प्रमुख विशेषता इसके सैकड़ों खंभे हैं जिनकी संख्या करीब 1,444 है। यहां आप जिस तरफ भी नजर घुमाएंगे आपको छोटे-बड़े आकारों के खंभे दिखाई देते हैं, परंतु ये खंभे इस प्रकार बनाए गए हैं कि कहीं से भी देखने पर मुख्य पवित्र स्थल के ‘दर्शन’ में बाधा नहीं पहुंचती है। इन खंभों पर अतिसुंदर नक्काशी की गई है। इन खंभों की खास विशेषता यह है कि ये सभी अनोखे और अलग-अलग कलाकृतियों से निर्मित हैं। मंदिर की छत पर की गई नक्काशी इसकी उत्कृष्टता का प्रतीक है।

मंदिर के निर्माताओं ने जहां कलात्मक दोमंजिला भवन का निर्माण किया है, वहीं भविष्य में किसी संकट का अनुमान लगाते हुए कई तहखाने भी बनाए गए हैं। इन तहखानों में पवित्र मूर्तियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। ये तहखाने मंदिर के निर्माताओं की निर्माण संबंधी दूरदर्शिता का परिचय देते हैं।

पत्थरों पर की गई नक्काशी इतनी भव्य है कि कई विख्यात शिल्पकार इसे विश्व के आश्चर्यों में से एक बताते हैं। हर वर्ष हजारों कलाप्रेमी इस मंदिर को देखने आते हैं। इसके अलावा यहां संगमरमर के टुकड़े पर भगवान ऋषभदेव के पदचिह्न भी हैं। ये भगवान ऋषभदेव तथा शत्रुंजय की शिक्षाओं की याद दिलाते हैं।

मान्यता 

मंदिर की मान्यता है कि मंदिर में प्रवेश करने से मनुष्य जीवन-मृत्यु की 84 योनियों से मुक्ति प्राप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। यहाँ पर जैन उत्सवों में प्रति वर्ष दूर-दूर से बड़ी संख्या में श्रद्धालू जमा होते है तथा इस दौरान भक्ति रस में डूबकर अपना सुध-बुध भूल जाते है।


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