जैन धर्म का इतिहास व जानकारी | History Of Jain Dharma in Hindi

Jain Dharma History in Hindi / अहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। ‘जैन’ उन्हें कहते हैं, जो ‘जिन’ के अनुयायी हों। ‘जिन’ शब्द बना है ‘जि’ धातु से। ‘जि’ यानी जीतना। ‘जिन’ अर्थात् जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं ‘जिन’। जैन धर्म अर्थात् ‘जिन’ भगवान का धर्म। वस्त्र-हीन बदन, शुद्ध शाकाहारी भोजन और निर्मल वाणी एक जैन-अनुयायी की पहली पहचान है। यहाँ तक कि जैन धर्म के अन्य लोग भी शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करते हैं तथा अपने धर्म के प्रति बड़े सचेत रहते हैं।

bhagwan mahavirजैन धर्म का इतिहास – History & Story Of Jain Dharma In Hindi 

दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म. को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव का उल्लेख मिलता है। जो की भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। उन्हे जैन धर्म की संस्थापक माना जाता है। वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे। मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है। जैन धर्म का मूल भारत की प्राचीन परंपराओं में रहा है। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे।

जैन धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि उनका धर्म ‘अनादि’ और सनातन है। सामान्यत: लोगों में यह मान्यता है कि जैन सम्प्रदाय का मूल उन प्राचीन पंरपराओं में रहा होगा, जो आर्यों के आगमन से पूर्व इस देश में प्रचलित थीं। किंतु यदि आर्यों के आगमन के बाद से भी देखा जाये तो ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा वेदों तक पहुँचती है।

जैन धर्म में श्रमण संप्रदाय का पहला संगठन पार्श्वनाथ ने किया था। ये श्रमण वैदिक परंपरा के विरुद्ध थे। महावीर तथा बुद्ध के काल में ये श्रमण कुछ बौद्ध तथा कुछ जैन हो गए थे। इन दोनों ने अलग-अलग अपनी शाखाएँ बना लीं। भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, जिनका जन्म लगभग ई. पू. 599 में हुआ और जिन्होंने 72 वर्ष की आयु में देहत्याग किया। महावीर स्वामी ने शरीर छोडऩे से पूर्व जैन धर्म की नींव काफ़ी मजबूत कर दी थी। अहिंसा को उन्होंने जैन धर्म में अच्छी तरह स्थापित कर दिया था। सांसारिकता पर विजयी होने के कारण वे ‘जिन’ (जयी) कहलाये। उन्हीं के समय से इस संप्रदाय का नाम ‘जैन’ हो गया।

धर्म जैन की जानकारी – Jainism Information in Hindi

सम्राट अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उसके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था। लगभग इसी समय मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियाँ कपड़े पहनाकर रखी जाएँ या नग्न अवस्था में। इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं। आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया। ईसा की पहली सदी में आकर जैन मतावलंबी मुनि दो दलों में बंट गए। एक दल ‘श्वेताम्बर’ और दूसरा दल ‘दिगम्बर’ कहलाया।

‘श्वेताम्बर’ और ‘दिगम्बर’ इन दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से अधिक चरित्र को लेकर है। दिगम्बर आचरण पालन में अधिक कठोर माने जाते हैं, जबकि श्वेताम्बर कुछ उदार हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जबकि दिगम्बर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं। ‘दिग्‌’ अर्थात् दिशा। दिशा ही अंबर है, जिसका वह ‘दिगम्बर’। वेदों में भी इन्हें ‘वातरशना’ कहा गया है।

यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है। दिगम्बर संप्रदाय यह मानता है कि मूल आगम ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं, ‘कैवल्य ज्ञान’ प्राप्त होने पर सिद्ध को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती और स्त्री शरीर से ‘कैवल्य ज्ञान’ संभव नहीं है; किंतु श्वेताम्बर संप्रदाय ऐसा नहीं मानते हैं।

जैन धर्म ग्रंथ पर आधारित धर्म नहीं है। भगवान महावीर ने सिर्फ़ प्रवचन ही दिए थे। उन्होंने किसी ग्रंथ की रचना नहीं की थी, लेकिन बाद में उनके गणधरों ने उनके अमृत वचन और प्रवचनों का संग्रह कर लिया। यह संग्रह मूलत: प्राकृत भाषा में है, विशेष रूप से मागधी में।

शाखाएँ –

जैन धर्म की दिगम्बर शाखा में तीन शाखाएँ हैं –
  1. मंदिरमार्गी
  2. मूर्तिपूजक
  3. तेरापंथी
श्वेताम्बर की दो शाखाएं हैं – 
  1. मंदिरमार्गी
  2. स्थानकवासी

जैनियों की अन्य शाखाओं में ‘तेरहपंथी’, ‘बीसपंथी’, ‘तारणपंथी’ और ‘यापनीय’ आदि कुछ और भी उप-शाखाएँ हैं। जैन धर्म की सभी शाखाओं में थोड़ा-बहुत मतभेद होने के बावजूद भगवान महावीर तथा अहिंसा, संयम और अनेकांतवाद में सबका समान विश्वास है। लगभत तीन सौ वर्षों पहले श्वेताम्बरों में ही एक अन्य शाखा और निकली ‘स्थानकवासी’। ये लोग मूर्तियों की पूजा नहीं करते हैं।

जैन धर्म – इतिहास की नजर में – General Knowledge of Jain Dharma 

• जैन धर्म के संस्थापक तथा प्रथम तीर्थकर ऋषिभदेव थे। जैन धर्म के तेईसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ थे।

• महावीर स्वामी चौबीसवे एवं अन्तिम तीर्थकर थे।

• जैन धर्म दो पंथो-श्वेताम्बर एवं दिगंबर मे बाँट गया था श्वेताम्बर श्वेत वस्त्र धारण करते है, जबकि दिगंबर पन्थ को मानने वाले वस्त्रो पारित्याग करते है।

• दिगंबर संप्रदाय मानता है कि मूल आगम ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं, कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने पर सिद्ध को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती और स्त्री शरीर से कैवल्य ज्ञान संभव नहीं; किंतु श्वेतांबर संप्रदाय ऐसा नहीं मानते हैं।

महावीर स्वामी का जन्म 540 ई. पू. पहले वैशाली के पास कुंडग्राम में हुआ था, बचपन का नाम वर्द्धमान था।

• इनके पिता राजा सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छिवी राजा चेटक की बहन थीं। महावीर स्वामी की पत्नीथ का नाम यशोदा और पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शनी था।

• जैन धर्म में ईश्वार नहीं आत्मा की मान्यता है।

• जैन धर्म के अधिकांश ग्रंथ प्राकृत भाषा मे रचित है।

ज्ञान की प्राप्ति – 

•  महावीर का साधना काल 12 साल 6 महीने और 15 दिन का रहा. इस अवधि में भगवान ने तप, संयम और साम्यभाव की विलक्षण साधना की। इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य), निर्ग्रंध (बंधनहीन) कहलाए.

•  स्थान – जंभिकग्राम के समीप

•  नदी – त्रिजूपलिका नदी के तट

•  वृक्ष – साल

•  जैन संघ – पावापुरी मे स्थापना

•  शिष्य – जमाली, चंदना सुधर्मण, महासयग, कूंदकोलिया, नन्दिनिपिय, कामदेव,
जैन महा संगिति

•  प्रथम संगिति 322 से 298 ई. पु. पाटलिपुत्र मे स्थुलभद्र की अध्यक्षयता मे हुई
•  दितीय संगिति 512 ई. पु. वल्लभी मे देवव्र्दी क्षमश्रवण की अध्यक्षयता मे हुई.


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