हिरोशिमा-नागासाकी परमाणु बम हमले की जानकारी Hiroshima Nagasaki

आज से 71 वर्ष (1945) पहले अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी (Hiroshima Nagasaki) शहरों में परमाणु बम गिराए थे। इस बमबारी के पहले दो से चार महीनों के भीतर हिरोशिमा में 90 हजार से 1 लाख 60 हजार और नागासाकी में 60 हजार से 80 लोग मारे गए थे। आज इस अटैक को 71 वर्ष हो गए हैं लेकिन जापान का ये हिस्सा आज भी उस हमले से प्रभावित है। आज भी यहाँ पर उत्पन्न हो रही संतानों पर इस हमले का असर साफ देखा जा सकता है। इस घटना को मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक माना जाता हैं जो की कुछ ही समय में एक पुरे शहर को निगल लिया था। यह हमला अमेरिका ने जापान को द्वितीय विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण कराने के लिए किया था।

हिरोशिमा-नागासाकी परमाणु बम हमले की जानकारी Hiroshima Nagasakiहिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम हमले की जानकारी – Hiroshima Nagasaki Bomb Blast Details Information in Hindi

द्वितिय विश्वयुद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा शहर पर 6 अगस्त 1945 को सवा आठ बजे अमेरिका ने यूरेनियम बम गिराया था। इस बम का नाम ‘लिटल ब्वॉय’ था जो की अमेरीका पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट के सन्दर्भ में था। इस हमले के तीन दिन बाद 9 अगस्‍त को नागासाकी शहर पर दूसरा यूरेनियम बम फेंका था। इस बम का नाम ‘फ़ैट मैन’ था। जो की विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में था।

यह परमाणु हमला जापान को दूसरे विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण कराने के लिए किया गया था। जापान दूसरे विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्र के साथ था और अमेरिका मित्र राष्ट्रों के साथ। यह दुनिया का पहला और अंतिम परमाणु हमला हैं। इस समय अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन (Harry S. Truman) थे। इस हमले के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया था।

परमाणु बम के इस्तेमाल से अमेरिका ने न सिर्फ अपने उन्नत तकनीकी कौशल का प्रदर्शन किया, बल्कि वैश्विक राजनीति में अपनी निर्णायक भूमिका की शुरुआत भी की।

जानकारों के मुताबिक अमेरिका हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर किसी शहर के ऊपर इस बम का टेस्ट करना चाहता था। उसने जापान की राजधानी टोक्यो पर हमला इसलिए नहीं किया क्योंकि वहां वह पहले ही काफी बमबारी हो चुकी थी। ऐसे में परमाणु बम से होने वाली तबाही और पहले से हुई तबाही में अंतर कर पाना मुश्किल होता। एक और जापानी शहर क्योटो पर भी परमाणु बम गिराने की योजना इसलिए टाली गई क्योंकि वहां एक टॉप अमेरिका अधिकारी, सेक्रेटरी ऑफ वॉर हेनरी स्टिमसन ने अपना हनीमून मनाया था और वे नहीं चाहते थे कि शहर की सांस्कृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाया जाए। इसलिए हिरोशिमा और नागासाकी को चुना गया।

1945 की गर्मियों के अंतिम महीने में पॉट्सडैम शांति सम्मेलन के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इस बात का ऐलान किया कि अमरीका के पास एक नया सुपर हथियार है। कहा जा रहा था कि ट्रूमन इस जुमले को कहकर सोवियत नेता जोसेफ़ स्टालिन की आँखों में डर और ख़ौफ़ को देखना चाहते थे। लेकिन स्टालिन ने ऐसा प्रभाव दिया जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ है। और इसके कुछ ही दिनों के बाद हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया।

इस बम के कारण जमीनी स्तर पर लगभग 4,000 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी और 1005 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली आंधी पैदा हुई। इस बम में 6.4 किलोग्राम प्‍लूटोनियम था। यह परमाणु बम तकरीबन 4000 किलोग्राम का था। कहा जाता हैं अगर जापान 14 अगस्‍त को सरेंडर नहीं करता तो अमेरिका ने 19 अगस्‍त को एक और शहर पर परमाणु बम गिराने की योजना बनाई थी।

हिरोशिमा पर परमाणु हमला –

परमाणु बम गिराने के लिए हिरोशिमा को इसलिए निशाना बनाया गया था क्योंकि अमरीकी वायुसेना के हमलों में इसे टारगेट नहीं किया गया था। ऐसे में परमाणु बम की विध्वंस क्षमता का पता लगाना आसान होता। यह जापान का अहम सैन्य ठिकाना भी था। इसके अलावा ज़्यादा आबादी वाले द्वीपों को निशाना बनाने से परहेज किया गया था।

हिरोशिमा में कैसे गिराया गया था परमाणु बम: 

6 अगस्त, 1945 को अमरीकी बी-29 बमवर्षक विमान ने हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था। बम को पैराशूट के ज़रिए गिराया गया और जमीन से 580 मीटर की ऊंचाई पर विस्फोट किया गया। इस विस्फोट के चलते 10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में गहरे गड्ढे बन गए। बी-29 बमवर्षक विमान (एनोला गे) के चालकदल में शामिल 12 लोगों में पॉल डब्लू तिब्बेत्स, सहचालक थियोडोर, जे वॉन किर्क और शस्त्र अधिकारी मॉरिस जैप्सन थे। मॉरिस जैप्सन वो व्यक्ति थे जिनके हाथ में आखिरी बार ‘लिटिल बॉय’ था। इस मिशन का कमान पायलट कर्नल पॉल डब्लू तिब्बेत्स के हाथ में थी। वो कहते हैं, ‘कुछ ऐसा था जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्या कहूं बम गिराने के बाद चंद सेकेंड के लिए मैंने पलट कर उसे देखा और आगे चल दिया।’

विस्फोट के बाद का मंज़र कैसा था? 

विस्फोट के बाद हिरोशिमा में जगह-जगह आग लग गई थी. ये आग तीन दिनों तक जारी रही। विस्फोट होते ही 60 हज़ार से 80 हज़ार लोगों की मौत तुरंत हो गई। बम धमाके के बाद इतनी गर्मी थी कि लोग सीधे जल गए। इसके बाद हज़ारों लोग परमाणु विकिरण संबंधी बीमारियों के चलते मारे गए। इस विस्फोट में कुल 1,35,000 लोगों की मौत हुई थी।

हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने घोषणा करते हुए कहा, ‘अब से कुछ देर पहले एक अमेरिकी जहाज ने हिरोशिमा पर एक बम गिराकर दुश्मन के यहां भारी तबाही मचाई है। यह बम 20 हजार टन टीएनटी क्षमता का था और अब तक इस्तेमाल में लाए गए सबसे बड़े बम से दो हजार गुना अधिक शक्तिशाली था, ये परमाणु बम हैं जिनमें ब्रहमांड की शक्ति है।’

बम हिरोशिमा के तय जगह पर नहीं गिराया जा सका था, यह हिरोशिमा के आइयो ब्रिज के पास गिरने वाला था मगर उल्टी दिशा में बह रहे हवा के कारण यह अपने लक्ष्य से हटकर शीमा सर्जीकल क्लिनीक पर गिरा। कनेर (ओलियंडर) नाम का फूल इस हमले के बाद सबसे पहले खिला था. यह हिरोशिमा का ऑफिशियल फूल है।

इस परमाणु हमले में कुछ पुलिसवालों ने अपनी जान एटॉमिक चमक दिखने के बाद खास तरीके से छुपकर बचाई थी। इस प्रक्रिया को ‘डक एंड कवर’ कहा जाता है. इन पुलिसवालों ने नागासाकी जाकर बचाव के इस तरीके की जानकारी दी. जिससे नागासाकी परमाणु हमले में काफी लोगों ने अपनी जान बचाई।

नागासाकी पर परमाणु हमला –

अमेरिका द्वारा फिर एक बार दूसरा परमाणु 9 अगस्त 1945 को किया गया। इस समय निशाना था जापान का कोकुरा शहर, लेकिन कुछ कारण इस बम का शिकार नागासाकी बना। यह बमवर्षक बी-29 सुपरफोर्ट्रेस बॉक्स पर लदा हुआ था। यह बम किसी भीमकाय तरबूज-सा था और वज़न था 4050 किलो। बम का नाम विंस्टन चर्चिल के सन्दर्भ में ‘फैट मैन’ रखा गया।

नागासाकी शहर के पहाड़ों से घिरे होने के कारण केवल 6.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही तबाही फैल पाई। लगभग 74 हजार लोग इस हमले में मारे गए थे और इतनी ही संख्या में लोग घायल हुए थे।

इसी रात अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने घोषणा की, ‘जापानियों को अब पता चल चुका होगा कि परमाणु बम क्या कर सकता है।’ उन्होंने कहा, ‘अगर जापान ने अभी भी आत्मसमर्पण नहीं किया तो उसके अन्य युद्ध प्रतिष्ठानों पर हमला किया जाएगा और दुर्भाग्य से इसमें हजारों नागरिक मारे जाएंगे।’

दो परमाणु हमलों और 8 अगस्त 1945 को सोवियत संघ द्वारा जापान के विरुद्ध मोर्चा खोल देने पर, जापान के पास कोई और रास्ता नहीं बचा था। जापान के युद्ध मंत्री और सेना के अधिकारी आत्मसमर्पण के पक्ष में फिर भी नहीं थे, लेकिन प्रधानमंत्री बारोन कांतारो सुजुकी ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई और इसके छह दिन बाद जापान ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

हालाँकि कई मुल्कों द्वारा अमेरिका की इस हरकत पर कड़े शब्दों में उसकी निंदा की गयी थी। लेकिन आजतक अमेरिका ने इस हमले के लिए माफ़ी नहीं मांगी। इसकी वजह ये है कि अमेरिका और वहां के लोगों का मानना है कि अमेरिका ने जापान पर परमाणु हमला करके अपने लाखों नागरिकों की जानें बचाई और अपने नागरिकों की रक्षा के लिए उठाया गया यह कदम सही था। उनका ये भी मानना है कि अगर अमेरिका ये कदम नहीं उठाता तो जापान द्वितीय विश्व युद्ध की इस जंग को जारी रखता और इससे दोनों ही देशों के और भी ज्यादा नागरिक मारे जाते।

लेकिन ये तर्क खोखले नजर आते हैं। क्यूंकि इस हमले में जितने लोग मरे गए थे, शायद लड़ाई आगे जारी रहती तो भी इतने लोग नहीं मरे जाते। और अमेरिका सेना का दुश्मनी जापानी सेनाओ से था न की मासूम लोगो से..


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