ई श्रीधरन की जीवनी | E. Sreedharan Biography in Hindi

E. Sreedharan / ई श्रीधरन पेशे से सिविल इंजीनियर हैं। भारत में उन्हें ‘मेट्रो मैन’ (Metro Man) के नाम से भी जाना जाता है। वे 1995 से 2012 तक दिल्ली मेट्रो के निदेशक रहे। दिल्ली मेट्रो के पहले उन्होंने कोंकण रेलवे जैसी कठिन और चुनौतीपूर्ण परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अलावा भारत के पहले मेट्रो प्रोजेक्ट कोलकाता मेट्रो के निर्माण में भी उनकी भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। देश और समाज के प्रति उनके महत्वपूर्ण कार्यों और योगदान के मद्देनजर भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ (2001) और ‘पद्म विभूषण’ (2008) जैसे नागरिक पुरस्कारों से सम्मानित किया।

ई श्रीधरन की जीवनी | E. Sreedharan Biography in Hindi

ई श्रीधरन – E. Sreedharan Biography & Life History in Hindi

शुरुआती जीवन

ई श्रीधरन जिनका पूर्ण नाम एलाट्टूवलपिल श्रीधरन (Elattuvalapil Sreedharan) का जन्म 12 जून 1932 को केरल के पलक्कड़ में पत्ताम्बी नामक स्थान पर हुआ था। उनके परिवार का सम्बन्ध पलक्कड़ के ‘करुकपुथुर’ से है। इनके पिता का नाम के. नीलकांतन मूसद और माता का नाम अम्मालु अम्मा हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पलक्कड़ के ‘बेसल इवैंजेलिकल मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल’ से हुई जिसके बाद उन्होंने पालघाट के विक्टोरिया कॉलेज में दाखिला लिया। उसके पश्चात उन्होंने आन्ध्र प्रदेश के काकीनाडा स्थित ‘गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज’ में दाखिला लिया जहाँ से उन्होंने ‘सिविल इंजीनियरिंग’ में डिग्री प्राप्त की।

विवाह

इ. श्रीधरन का विवाह राधा श्रीधरन से हुआ। इनकी चार संतानें हैं – उनके बड़े पुत्र रमेश, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं और पुत्री शांति मेनन बैंगलोर में एक स्कूल चलाती हैं, उनका एक और पुत्र अच्युत मेनन यूनाइटेड किंगडम में डॉक्टर है और उनका सबसे छोटा पुत्र एम. कृष्णदास COWI में कार्यरत है।

करियर 

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद कुछ समय तक श्रीधरन ने कोझीकोड स्थित ‘गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक’ में सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाया। उसके बाद लगभग एक साल तक उन्होंने बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट में बतौर प्रसिक्षु कार्य किया। इसके पश्चात सन 1953 में वे भारतीय लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित ‘इंडियन इंजीनियरिंग सर्विसेज एग्जाम’ में बैठे और उत्तीर्ण हो गए। उनकी पहली नियुक्ति दक्षिण रेलवे में ‘प्रोबेशनरी असिस्टेंट इंजिनियर’ के तौर पर दिसम्बर 1954 में हुई।

पम्बन ब्रिज

दक्षिण रेलवे में अपनी पोस्टिंग के दौरान 1964 में एक चक्रवात ने पम्बन ब्रिज को गंभीर रूप से क्षति पहुंचाई थी। इसी ब्रिज के माध्यम से रामेश्वरम तमिलनाडु से जुड़ा था। ये एक बड़ा नुकसान था। रेलवे ने पुल की मरम्मत के लिए छह महीने का लक्ष्य निर्धारित किया। उस दौरान श्रीधरन को इस कार्य के लिए 90 दिन का समय दिया गया और वे उस समय लगभग 32 साल के थे। 90 दिनों की इस अवधि के कार्य को उन्होंने कुल 46 दिनों के भीतर पूरा कर लिया। इसके चलते उन्हें रेलवे मिनिस्टर की ओर से सम्मानित भी किया गया।

कोलकाता मेट्रो

1970 में इ. श्रीधरन को भारत के पहले मेट्रो रेल ‘कोलकाता मेट्रो’ की योजना, डिजाईन और कार्यान्वन की जिम्मेदारी सौंपी गयी। श्रीधरन ने न सिर्फ इस अग्रगामी परियोजना को पूरा किया बल्कि इसके द्वारा भारत में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग की आधारशिला भी रखी।

कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड

इसके बाद श्रीधरन ने अक्टूबर 1979 में कोचीन शिपयार्ड ज्वाइन किया। इस समय यह अनुत्पादकता के दौर से गुजर रही थी। शिपयार्ड का पहला जहाज़ ‘एम.वी. रानी पद्मिनी’ अपने लक्ष्य से बहुत अधिक विलंबित था पर उन्होंने अपने अनुभव, कार्यकुशलता और अनुशासन से शिपयार्ड का कायाकल्प कर दिया और यह सुनिश्चित किया कि उनके नेतृत्व में ही यहाँ का पहला जहाज़ बनकर निकले। सन 1981 में उनके नेतृत्व में ही कोचीन शिपयार्ड का पहला जहाज़ ‘एम.वी. रानी पद्मिनी’ बनकर बाहर निकला।

कोंकण रेलवे

जुलाई 1987 में उन्हें पदोन्नत कर पश्चिमी रेलवे में जनरल मैंनेजर बना दिया गया और जुलाई 1989 में वे रेलवे बोर्ड का सदस्य बना दिए गए। सन 1990 में उन्हें कॉन्ट्रैक्ट पर लेकर कोंकण रेलवे का चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया। उनके नेतृत्व में कंपनी ने अपना कार्य साथ वर्षों में पूरा किया। कोंकण रेलवे परियोजना कई मामलों में अनोखी रही। यह देश की पहली बड़ी परियोजना थी जिसे BOT (ब्युल्ट-ऑपरेट-ट्रान्सफर) पद्धति पर कार्यान्वित किया गया था। इस संगठन का स्वरुप भी रेलवे की किसी और परियोजना से भिन्न था। लगभग 82 किलोमीटर के एक स्ट्रेच में इसमें 93 टनल खोदे गए थे। परियोजना की कुल लम्बाई 760 किलोमीटर थी जिसमें 150 पुलों का निर्माण किया गया था। कई लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात थी कि एक सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजना बिना बिलंभ और बजट बढ़ाये लगभग अपने नियत समय पर पूरी हो गयी थी।

दिल्ली मेट्रो, कोच्ची मेट्रो, लखनऊ मेट्रो

E. Sreedharan – इ. श्रीधरन को दिल्ली मेट्रो का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया और सन 1997 के मध्य तक परियोजना के हर पहलू को समय सीमा के अंतर्गत ही पूरा कर लिया गया। दिल्ली मेट्रो से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें कोच्ची मेट्रो रेल प्रोजेक्ट का मुख्य सलाहकार नियुक्त किया गया। सन 2013 में उन्होंने कहा कि कोच्ची मेट्रो अपने निर्धारित समय लगभग तीन साल में पूरी हो जाएगी। लखनऊ मेट्रो रेल के वे मुख्य सलाहकार है। उन्होंने जयपुर मेट्रो को भी अपना बहुमूल्य सलाह दी और देश में बनने वाले दूसरे मेट्रो रेल परियोजनाओं के साथ भी वे जुड़े हुए हैं। विशाखापत्तनम और विजयवाड़ा की मेट्रो परियोजनाएं भी इनके देख रेख में ही हुई हैं। ये कहना गलत नहीं होगा कि देश में कही भी मेट्रो बने उसमें मेट्रो मैन श्रीधरन का सहयोग ज़रूर होगा।

ई. श्रीधरन की सफलता के मंत्र

श्रीधरन काम करने वालों की पेशेवर योग्यता को लेकर कोई समझौता नहीं करते, लिहाजा उनके द्वारा हाथ में लिया गया कोई भी प्रोजेक्ट असफल या कम गुणवत्ता वाला साबित नहीं हुआ। जब भी जरूरत पड़ी, उन्होंने कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण दिलाया। उन्होंने दिल्ली मेट्रो के निर्माण कार्य में लगे लोगों को बेहतर प्रशिक्षण के लिए विदेश भी भेजा, क्योंकि उनका मानना है कि किसी भी काम की सफलता अंतत: उसे करने वाले लोगों की योग्यता पर ही निर्भर करती है।

श्रीधरन की कामयाबी की सबसे बड़ी वजहों में से एक है उनकी ईमानदारी। उनका मानना है कि काम केवल समय पर पूरा होना ही काफी नहीं है, बल्कि वह स्तरीय भी होना चाहिए और इसके लिए ईमानदारी बहुत जरूरी है, तभी पूर्ण रूप से सफलता मिलेगी। वह कहते हैं, ‘हम पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के मामले में कभी समझौता नहीं करते।’

श्रीधरन का कहना है, ‘हम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि केवल सर्वश्रेष्ठ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ही काफी नहीं है। पारदर्शिता, कार्यक्षमता, जवाबदेही, सर्विस-ओरिएंटेशन और सभी घटकों की सहभागिता भी उतनी ही महवपूर्ण है।’ इस बात को वह सिर्फ कहते ही नहीं, अमल में भी लाते हैं। उन्होंने अब तक के अपने सभी प्रोजेक्टों में उससे जुड़े सभी पक्षों की सहभागिता को सुनिश्चित किया है और बेहतर काम करने के लिए प्रेरित किया है। यह भी उनकी कामयाबी का एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है।

सम्मान और पुरस्कार

  • रेलवे मंत्री का पुरस्कार, 1963
  • भारत सरकार द्वारा पद्म श्री, 2001
  • ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ द्वारा ‘मैन ऑफ़ द इयर’, 2002
  • श्री ओम प्रकाश भसीन अवार्ड फॉर प्रोफेशनल एक्सीलेंस इन इंजीनियरिंग, 2002
  • सी.आई.आई. ज्युरर्स अवार्ड फॉर लीडरशिप इन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, 2002-2003
  • टाइम पत्रिका द्वारा ‘ओने ऑफ़ एसिआज हीरोज’, 2003
  • आल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन अवार्ड फॉर पब्लिक एक्सीलेंस, 2003
  • आई.आई.टी दिल्ली द्वारा ‘डॉक्टर ऑफ़ साइंस’
  • भारत शिरोमणि अवार्ड, 2005
  • नाइट ऑफ़ द लीजन ऑफ़ हॉनर, 2005
  • सी.एन.एन-आई.बी.एन. द्वारा ‘इंडियन ऑफ़ द इयर 2007’, 2008
  • भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण, 2008
  • राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी कोटा द्वारा ‘डी लिट.’ की उपाधि, 2009
  • आई.आई.टी रूरकी द्वारा ‘डॉक्टर ऑफ़ फिलोसोफी’, 2009
  • श्री चित्र थिरूनल नेशनल अवार्ड, 2012
  • एस.आर जिंदल प्राइज, 2012
  • टी.के.एम. 60 प्लस अवार्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट, 2013
  • महामाया टेक्निकल यूनिवर्सिटी द्वारा ‘डॉक्टर ऑफ़ साइंस’, 2013
  • रोटरी इंटरनेशनल द्वारा ‘फॉर द सके ऑफ़ हॉनर’ पुरस्कार, 2013
  • ग्रिफ्ल्स द्वारा ‘लाइफटाइम अचीवमेंट गवर्नेंस अवार्ड’, 2013

और अधिक लेख –

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