बृहदेश्वर मन्दिर का इतिहास और रोचक बातें | Brihadeeswarar Temple History Hindi

तमिलनाडु के तंजौर ज़िले में स्थित बृहदेश्वर मन्दिर (Brihadeeswarar Mandir) एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है जो की भगवान शिव को समर्पित हैं। तमिल भाषा में इसे बृहदीश्वर के नाम से संबोधीत किया जाता है तथा अन्य भाषा में इसे राज-राजेश्वर, राज-राजेश्वरम के नाम से जाना जाता हैं।

यह मंदिर विश्व के प्रमुख ग्रेनाइट मंदिरों मे से एक है। इस मंदिर का निर्माण ग्यारहवीं सदी में राजराज चोला प्रथम के द्वारा किया गया था। यह मंदिर UNESCO “वर्ल्ड हेरिटेज साईट” के “द ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल” के 3 मंदिरों में से एक है। बाकी के 2 मंदिर गंगईकोंडा चोलपुरम और ऐरावटेश्वर मंदिर हैं। यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है एवं चोला वंश की वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है।

बृहदेश्वर मन्दिर का इतिहास और रोचक बातें | Brihadeeswarar Temple History In Hindi

बृहदेश्वर मन्दिर की जानकारी – Brihadeeswarar Temple Information 

भगवान शिव की आराधना को समर्पित इस मंदिर में भगवान के गण सवारी नंदी की एक बहुत बड़ी मूर्ति भी स्थापित है। राजराज प्रथम ने शैव मत के अनुयायी थे उन्हें शिवपादशेखर की उपाधि भी प्राप्त थी। अपनी धार्मिक सहिष्णुता के अनुरूप उन्होंने तंजौर के राजराजेश्वर मंदिर या बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया व उन पर अनेक बौद्ध प्रतिमाओं का निर्माण भी कराया था। चोल शासकों ने इस मंदिर को राजराजेश्वर नाम दिया था परंतु तंजौर पर हमला करने वाले मराठा शासकों ने इस मंदिर को बृहदीश्वर नाम दे दिया था।

बृहदेश्वर मंदिर तंजौर के किसी भी कोने से देखा जा सकता है। इसका विशाल परिसर मुख्य केन्द्र है। मंदिर के तेरह मंज़िले भवन सभी को अचंभित करते हैं क्योंकि हिंदू अधि-स्थापनाओं में मंज़िलों की संख्या सम होती है परंतु यहां ऐसा नहीं है। इस मंदिर के चारों ओर सुंदर अक्षरों में नक्‍काशी द्वारा लिखे गए शिला लेखों की एक लंबी शृंखला शासक के व्‍यक्तित्‍व की अपार महानता को दर्शाते हैं। इस मंदिर के निर्माण कला की प्रमुख विशेषता यह पाई गई है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। जो सभी को चकित करती है इसके शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। मंदिर में स्थापित भव्य शिवलिंग देखने पर वृहदेश्वर नाम को सार्थक करती प्रतीत होती है।

बृहदेश्वर मंदिर में उत्कीर्ण लेखों के अनुसार मंदिर के मुख्य वास्तुविद कुंजर मल्लन राजा राजा पेरुन्थचन थे, जिनके घर के लोग आज भी वास्तुशास्त्र, आर्किटेक्चर का कार्य करते हैं। कहा जाता है कि बृहदेश्वर मंदिर में जलने वाले दीयों के लिए घी की अबाधित पूर्ति के हेतु सम्राट राजा राजा ने मंदिर को 4000 गायें, 7000 बकरियाँ, 30 भैंसे व 2500 एकड़ जमीन दान की थी। मंदिर व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए 192 कर्मचारी रखे गये थे।

बृहदेश्वर मन्दिर का इतिहास – Brihadeeswarar Temple History Hindi

बृहदेश्वर मंदिर चोल वास्‍तुकला का शानदार उदाहरण है, जिनका निर्माण चोल शासक महाराजा राजराज प्रथम के राज्‍य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 ई. और 1009 ई. के दौरान) निर्मित किया गया था। उनके नाम पर ही इसे राजराजेश्वर मन्दिर नाम भी दिया गया है। राजाराजा प्रथम भगवान शिव के परम भक्त थे जिस कारण उन्होंने अनेक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया था जिनमें से एक बृहदेश्वर मंदिर भी है। कहा जाता हैं राजराज चोला ने इस मंदिर का निर्माण अपने साम्राज्य को इश्वर का आशीर्वाद दिलाने के लिए बनवाया था। यह विशाल मंदिर अपने समय की विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था।

स्थापत्य कला – Brihadeeswarar Temple Structure 

यह मंदिर ग्रेनाइट से निर्मित है और अधिकांशत: पत्‍थर के बड़े खण्‍ड इसमें इस्‍तेमाल किए गए हैं, ये शिलाखण्‍ड आस पास उपलब्‍ध नहीं है इसलिए इन्‍हें किसी दूर के स्‍थान से लाया गया था। यह मंदिर एक फैले हुए अंदरुनी प्रकार में बनाया गया है जो 240.90 मीटर लम्‍बा (पूर्व – पश्चिम) और 122 मीटर चौड़ा (उत्तर – दक्षिण) है और इसमें पूर्व दिशा में गोपुरम के साथ अन्‍य तीन साधारण तोरण प्रवेश द्वार प्रत्‍येक पार्श्‍व पर और तीसरा पिछले सिरे पर है। प्रकार के चारों ओर परिवारालय के साथ दो मंजिला मालिका है।

यह मंदिर विशाल गुम्‍बद के आकार का शिखर अष्‍टभुजा वाला है और यह ग्रेनाइट के एक शिला खण्‍ड पर रखा हुआ है तथा इसका घेरा 7.8 मीटर और वज़न 80 टन है। 198 फीट का विमानं खम्बा दुनिया के सब से ऊंचे खम्बों में से एक है। उप पित और अदिष्‍ठानम अक्षीय रूप से रखी गई सभी इकाइयों के लिए सामान्‍य है जैसे कि अर्धमाह और मुख मंडपम तथा ये मुख्‍य गर्भ गृह से जुड़े हैं किन्‍तु यहां पहुंचने के रास्‍ता उत्तर – दक्षिण दिशा से अर्ध मंडपम से होकर निकलता है, जिसमें विशाल सोपान हैं।

ढलाई वाला प्लिंथ विस्‍तृत रूप से निर्माता शासक के शिलालेखों से भरपूर है जो उनकी अनेक उपलब्धियों का वर्णन करता है, पवित्र कार्यों और मंदिर से जुड़ी संगठनात्‍मक घटनों का वर्णन करता है। गर्भ गृह के अंदर बृहत लिंग 8.7 मीटर ऊंचा है। दीवारों पर विशाल आकार में इनका चित्रात्‍मक प्रस्‍तुतिकरण है और अंदर के मार्ग में दुर्गा, लक्ष्‍मी, सरस्‍वती और भिक्षाटन, वीरभद्र कालांतक, नटेश, अर्धनारीश्‍वर और अलिंगाना रूप में शिव को दर्शाया गया है। अंदर की ओर दीवार के निचले हिस्‍से में भित्ति चित्र चोल तथा उनके बाद की अवधि के उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है।

मंदिर में प्रवेश करने पर गोपुरम्‌ के भीतर एक चौकोर मंडप है। वहां चबूतरे पर नन्दी जी विराजमान हैं। नन्दी जी की यह प्रतिमा 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी तथा 3.7 मीटर ऊंची है। भारतवर्ष में एक ही पत्थर से निर्मित नन्दी जी की यह दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है। तंजौर में अन्य दर्शनीय मंदिर हैं- तिरुवोरिर्युर, गंगैकोंडचोलपुरम तथा दारासुरम्‌।

संस्कृति – Brihadeeswarar Temple Festival

ब्रिहदिश्वरर मंदिर का उल्लेख मूवर उला औरकलिंगथूपारणी में भी किया गया है। ऐसा माना जाता है की यह मंदिर सामाजी, वित्तीय एवं राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मंदिर में संगीत, नृत्य और कला को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न आयोजन किये जाते थे। विशेषज्ञों के राय में यह मंदिर द्रविड़ियन वस्तुशिप के चरमोत्कर्ष की कहानी बयान करते हैं। मंदिर को एक धरोहर के रूप में भारतीय पुरातात्विक विभाग के द्वारा अन्रक्षित किया गया है। तमिलनाडू के सबसे ज्यादा पर्यटक यहां आते हैं। ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल की लिस्ट में इस मंदिर को 2004 में जोड़ा गाया था।

बृहदेश्वर मंदिर से जुड़े रोचक बातें – Interesting Facts About Brihadeeswarar Temple

1). अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए यह मंदिर जाना जाता है। 1,30,000 टन ग्रेनाइट से इसका निर्माण किया गया। ग्रेनाइट इस इलाके के आसपास नहीं पाया जाता और यह रहस्य अब तक रहस्य ही है कि इतनी भारी मात्रा में ग्रेनाइट कहां से लाया गया।

2). इस मंदिर के निर्माण कला की प्रमुख विशेषता यह पाई गई है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। जो सभी को चकित करती है इसके शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है।

3). रिजर्व बैंक ने 01 अप्रैल 1954 को एक हजार रुपये का नोट जारी किया था। जिस पर बृहदेश्वर मंदिर की भव्य तस्वीर है। संग्राहकों में यह नोट लोकप्रिय हुआ। इस मंदिर के एक हजार साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में आयोजित मिलेनियम उत्सव के दौरान एक हजार रुपये का स्‍मारक सिक्का भारत सरकार ने जारी किया। 35 ग्राम वज़न का यह सिक्का 80 प्रतिशत चाँदी और 20 प्रतिशत तांबे से बना है।

4). पहली बार मंदिर के रथ को विपरीत दिशा में स्थित रामार मंदिर से 20 अप्रैल 2015 को निकाला गया। हज़ारों लोगों ने इस रथ यात्रा में हिस्सा लिया। नौ दिनों के बाद 29 अप्रैल 2015 को रथ के ऊपर देवताओं की मूर्तियाँ रख कर इसे फिर घुमाया गाया। यह रथ यात्रा सौ सालों के बाद निकाली गयी है।


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