वृन्दावन का इतिहास, रहस्य, मन्दिरे, लीलास्थली | About Vrindavan In Hindi

Vrindavan / वृन्दावन भगवान कृष्ण की लीला से जुडा हुआ है। यह स्थान श्री कृष्ण भगवान के बाललीलाओं का स्थान माना जाता है। यह भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में मथुरा से 12 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में यमुना तट पर स्थित है। हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण आदि में वृन्दावन की महिमा का वर्णन किया गया है।

वृन्दावन का इतिहास, रहस्य, मन्दिरे, लीलास्थली | About Vrindavan In Hindiवृन्दावन वह जगह है जहा श्री कृष्ण ने महारस किया था। यहाँ के कण कण में राधा कृष्ण के प्रेम की आध्यात्मिक धरा बहती है। वृन्दावन में जन्माष्टमी मथुरा से अगले दिन मनाई जाती है तथा छप्पन भोग लगाया जाता है। यहाँ लगने वाले छप्पन भोग को देखने दूर दूर से श्रुधालू आते है।

वृंदावन की निधि वन – Mysterious Nidhivan Story & History in Hindi

वृंदावन स्तिथ निधि वन जिसके बारे में मान्यता है की यहाँ आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है। यही कारण है की सुबह खुलने वाले निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है। उसके बाद वहां कोई नहीं रहता है यहाँ तक की निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधि वन को छोड़कर चले जाते है।

क्योंकि यदि कोई छुपकर रासलीला देखने की कोशिश करता है तो पागल हो जाता है। ऐसे ही एक पागल बाबा जिनकी समाधि निधि वन में बनी हुई है। उनके बारे में भी कहा जाता है की उन्होंने एक बार निधि वन में छुपकर रास लीला देखने की कोशिश की थी। जिससे की वो पागल ही गए थे। चुकी वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात मंदिर कमेटी ने निधि वन में ही उनकी समाधि बनवा दी।

निधि वन के अंदर ही है ‘रंग महल’ जिसके बारे में मान्यता है की रोज़ रात यहाँ पर राधा और कन्हैया आते है। रंग महल में राधा और कन्हैया के लिए रखे गए चंदन की पलंग को शाम सात बजे के पहले सजा दिया जाता है। पलंग के बगल में एक लोटा पानी, राधाजी के श्रृंगार का सामान और दातुन संग पान रख दिया जाता है। सुबह पांच बजे जब ‘रंग महल’ का पट खुलता है तो बिस्तर अस्त-व्यस्त, लोटे का पानी खाली, दातुन कुची हुई और पान खाया हुआ मिलता है। रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है।

निधि वन की एक अन्य खासियत यहाँ के तुलसी के पेड़ है।  निधि वन में तुलसी का हर पेड़ जोड़े में है।  इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं। साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगे जोड़े की वन तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता है। लोग बताते हैं कि‍ जो लोग भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता।

वृन्दावन का इतिहास – Vrindavan History In Hindi

कालिदास ने इसका उल्लेख रघुवंश में इंदुमती-स्वयंवर के प्रसंग में शूरसेनाधिपति सुषेण का परिचय देते हुए किया है इससे कालिदास के समय में वृन्दावन के मनोहारी उद्यानों की स्थिति का ज्ञान होता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार गोकुल से कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातीयों के साथ वृन्दावन निवास के लिए आये थे। विष्णु पुराण में इसी प्रसंग का उल्लेख है। विष्णुपुराण में अन्यत्र वृन्दावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है।

कहते है कि वर्तमान वृन्दावन असली या प्राचीन वृन्दावन नहीं है। श्रीमद्भागवत के वर्णन तथा अन्य उल्लेखों से जान पड़ता है कि प्राचीन वृन्दावन गोवर्धन के निकट था। गोवर्धन-धारण की प्रसिद्ध कथा की स्थली वृन्दावन पारसौली (परम रासस्थली) के निकट था। अष्टछाप कवि महाकवि सूरदास इसी ग्राम में दीर्घकाल तक रहे थे।

वृन्दावन का नामकरण –

वृन्दावन पावन स्थली का नामकरण वृन्दावन कैसे हुआ इसके बारे में अनेक मत है। वुन्दा तुलसी को कहते है- पहले यह तुलसी का घना वन था इसलिए वृन्दावन कहा जाने लगा। वृन्दावन की अधिष्ठात्री देवी वृंदा अर्थात राधा है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्री राधा रानी के सोलह नामो में से एक नाम वृंदा भी है।

ब्रज का हृदय –

वृन्दावन को ब्रज का हृदय कहते है जहाँ श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलाएँ की हैं। इस पावन भूमि को पृथ्वी का अति उत्तम तथा परम गुप्त भाग कहा गया है। पद्म पुराण में इसे भगवान का साक्षात शरीर, पूर्ण ब्रह्म से सम्पर्क का स्थान तथा सुख का आश्रय बताया गया है। इसी कारण से यह अनादि काल से भक्तों की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। चैतन्य महाप्रभु, स्वामी हरिदास, श्री हितहरिवंश, महाप्रभु वल्लभाचार्य आदि अनेक गोस्वामी भक्तों ने इसके वैभव को सजाने और संसार को अनश्वर सम्पति के रूप में प्रस्तुत करने में जीवन लगाया है। यहाँ आनन्दप्रद युगलकिशोर श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा की अद्भुत नित्य विहार लीला होती रहती है।

प्राकृतिक छटा –

वृन्दावन की प्राकृतिक छटा देखने योग्य है। यमुना जी ने इसको तीन ओर से घेरे रखा है। यहाँ के सघन कुंजो में भाँति-भाँति के पुष्पों से शोभित लता तथा ऊँचे-ऊँचे घने वृक्ष मन में उल्लास भरते हैं। बसंत ॠतु के आगमन पर यहाँ की छटा और सावन-भादों की हरियाली आँखों को शीतलता प्रदान करती है, वह श्रीराधा-माधव के प्रतिबिम्बों के दर्शनों का ही प्रतिफल है। वृन्दावन का कण-कण रसमय है। यहाँ प्रेम-भक्ति का ही साम्राज्य है। वृन्दावन में श्रीयमुना के तट पर अनेक घाट हैं। वृन्दावन की गलिया बड़ी प्रसिद्ध है और इन गलियों को कुंज गलिया कहते है।

वृन्दावन की प्रमुख मंदिर – About Vrindavan Temple In Hindi

बांके बिहारी का मन्दिर

वृन्दावन का प्रमुख दर्शनीय मन्दिर श्री बांके बिहारी मन्दिर है। स्वामी हरिदास जी द्वारा निर्मित यह मन्दिर अति प्राचीन है। मन्दिर की स्थापित श्री विग्रह निधिवन से प्रकट हुए थे जिसे स्वामी हरिदास ने यहा स्थापित किया था। श्री बिहारी की चरण दर्शन केवल अक्षय तीज को ही होते है तथा सावन में हिंडोले के दर्शन होते है।

गोविन्दं देव जी का मन्दिर 

गोविन्द देव जी का मंदिर वृंदावन में स्थित वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। मंदिर का निर्माण ई. 1590 में हुआ तथा इसे बनाने में 5 से 10 वर्ष लगे। आततायियो ने इसकी उपरी मंजिले नष्ट कर दी थी | कहते है कि यह पहले यह सात मंजिला था अब केवल चार मंजिला ही रह गया है।

रंग जी का मन्दिर 

रंग जी मन्दिर दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुद नमूना है। यह मन्दिर अपनी भव्यता तथा मन्दिर प्रांगण में खड़ा 6 फुट सोने के खम्भे के लिए प्रसिद्ध है। मन्दिर का प्रांगण भी विशाल है। रंग जी मन्दिर का रथ उत्सव, बैकुंठ उत्सव तथा जन्माष्टमी उत्सव देखने योग्य होता है।

शाह जी का मन्दिर

यमुना तट पर बना शाह जी का मन्दिर अपने संगमरमर के खम्भों के लिए प्रसिद्ध है। इसे टेढ़े मेढ़े खम्भों के लिए प्रसिद्ध है। वास्तव में इसका नाम ललित कुंज है। बसंत पंचमी को यहा मेला लगता है।

 

सेवा कुंज 

सेवा कुंज को निकुंजवन भी कहते है यहा ताल और कदम्ब का पेड़ है, कोने में एक छोटा सा मन्दिर है। कहा जाता है कि रात्रि में यहा राधा जी के साथ भगवान श्रीकृष्ण विहार करते है। यहा रात्रि में रहना वर्जित है। शाम ढलते ही मन्दिर से सभी जीव जन्तु स्वत: ही अपने आप चले जाते है यह अपने आप में अचरज की बात है।

इस्कॉन मन्दिर 

वृन्दावन के आधुनिक मन्दिरों में यह एक भव्य मन्दिर है। इसे अंग्रेज़ों का मन्दिर भी कहते हैं। केसरिया वस्त्रों में हरे रामा–हरे कृष्णा की धुन में तमाम विदेशी महिला–पुरुष यहाँ देखे जाते हैं। मन्दिर में राधा कृष्ण की भव्य प्रतिमायें हैं और अत्याधुनिक सभी सुविधायें हैं।

मदन मोहन मन्दिर

श्रीकृष्ण भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदनमोहन भी है। इसी नाम से एक मंदिर मथुरा ज़िले के वृंदावन धाम में विद्यमान है। विशाल कायिक नाग के फन पर भगवान चरणाघात कर रहे हैं। पुरातनता में यह मंदिर गोविन्द देव जी के मंदिर के बाद आता है

वंशी चोर राधा रानी का भी है मंदिर

निधि वन में ही वंशी चोर राधा रानी का भी मंदिर है। यहां के महंत बताते हैं कि जब राधा जी को लगने लगा कि कन्हैया हर समय वंशी ही बजाते रहते हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं देते, तो उन्होंने उनकी वंशी चुरा ली। इस मंदिर में कृष्ण जी की सबसे प्रिय गोपी ललिता जी की भी मूर्ति राधा जी के साथ है।

Good News

वृंदावन में दुनिया का सबसे ऊंचा श्रीकृष्ण मंदिर बनने जा रहा है। अगले 5 साल में 300 करोड़ रुपये की लागत से इसका निर्माण होने का अनुमान है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर की ऊंचाई 700 फुट अथवा 210 मीटर होगी। दिल्ली में 72.5 मीटर के कुतुबमीनार से इस इसकी ऊंचाई तीन गुना ज्यादा होगी। ISKCON, बेंगलुरु के श्रद्धालुओं ने इस मंदिर की परिकल्पना की है।


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