ज्वालामुखी क्या हैं? ज्वालामुखी के प्रकार व महत्वपूर्ण जानकारी Jwalamukhi

Volcano /Jwalamukhi / ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर उपस्थित ऐसी स्थान, दरार या मुख होता है जिससे पृथ्वी के भीतर का पिघली चट्टान, गर्म लावा, गैस, राख आदि बाहर आते हैं। ज्वालामुखी से निकलने वाले चीज को मैग्मा कहा जाता हैं जोकि बाहर आने के बाद लावा में तब्दील हो जाता हैं। बाहर हवा में उड़ा हुआ लावा शीघ्र ही ठंडा होकर छोटे ठोस टुकड़ों में बदल जाता है, जिसे ‘सिंडर’ कहते हैं। आज पृथ्वी पर हजारो सक्रीय ज्वालामुखी मौजूद हैं जो इंसानी जान के लिए सबसे घातक हैं। पृथ्वी पर जितने भी ज्वालामुखी मौजूद हैं, उनमें से ज़्यादातर दस हज़ार से एक लाख साल पुराने हैं। वक्त के साथ-साथ इनकी ऊँचाई भी बढ जाती है।

ज्वालामुखी क्या हैं - Jwalamukhi Kya hai - What is a Volcano in Hindi

ज्वालामुखी क्या हैं – Jwalamukhi Kya hai – What is a Volcano in Hindi

सिंपल भाषा में कहे तो ज्वालामुखी एक पहाड़ होता है जिसके नीचे पिघले लावा की तालाब होती है। पृथ्वी के नीचे ऊर्जा यानि जियोथर्मल एनर्जी से पत्थर पिघलते हैं। जब जमीन के नीचे से ऊपर की ओर दबाव बढ़ता है तो पहाड़ ऊपर से फटता है और ज्वालामुखी कहलाता है।

ज्वालामुखी के नीचे पिघले हुए पत्थरों और गैसों को मैग्मा कहते हैं। ज्वालामुखी के फटने के बाद जब यह निकलता है तो इसे लावा कहते हैं। ज्वालामुखी के फटने से गैस और पत्थर ऊपर की ओर निकलते हैं। इसके फटने से लावा तो बहता है ही, साथ ही गर्म राख भी हवा के साथ बहने लगती है। जमीन के नीचे हलचल मचने से भूस्खलन और बाढ़ भी आती है।

ज्वालामुखी कैसे बनता हैं और विस्फोट कैसे होता हैं? 

ज्वालामुखी का उद्गार एक केन्द्र या छिद्र द्वारा अथवा दरार से होता है। केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी प्रायः भयंकर और तीव्र वेग वाले होते हैं, जबकि दरारी उद्गार में लावा प्रायः धीरे-धीरे निकल कर जमीन पर फैल जाता है। केन्द्रीय उद्गार में निःसृत लावा तथा अन्य पदार्थ अधिक ऊँचाई तक आकाश में पहुँच जाते हैं तथा आकाश में प्रायः बादल छा जाते हैं और विखंडित पदार्थ पुनः जल्दी से नीचे गिरते हैं। ये ज्वालामुखी अधिक भयंकर तथा विनाशकारी होते हैं। केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी उद्गार की अवधि, अंतराल तथा प्रकृति के अनुसार कई प्रकार के होते हैं, जिन्हें विशिष्ट ज्वालामुखी के आधार पर कई वर्गों में विभक्त किया जाता है। इनमें प्रमुख प्रकार हैः हवाई, स्ट्राम्बोली, वल्कैनो, पीलियन, तथा विसूवियस तुल्य ज्वालामुखी।

किसी ज्वालामुखी की विस्फोटकता, मैग्मा के उत्सर्जन गति, और मैग्मा में निहित गैस की उत्सर्जन गति पर निर्भर करती है। मैग्मा में बहुत अधिक मात्र में जल और कार्बनडाइऑक्साइड मौजूद होता है। एक सक्रिय ज्वालामुखी से मैग्मा निकलते हुए देखने पर पता चलता है कि इसकी गैस उत्सर्जन की क्रिया किसी कार्बोनेटेड पेय से गैस निष्काषन की क्रिया से मिलती जुलती है।

ज्वालामुखी से निकलने वाली चीज़ों में मैग्मा के साथ कई तरह की विषैली गैसें भी होती हैं। ये गैसें आस-पास बसे लोगों के लिए काफ़ी घातक होती हैं। इन पर्वतों से निकला मैग्मा एक बहती हुई आग के समान होता है। यह अपने सामने आई हर चीज़ को पूरी तरह से समाप्त कर देता है।

मैग्मा भू परत से बहुत जल्द ऊपर आता है और अपने मूल आकार से हज़ार गुणा बड़ा हो जाता है। ज्वालामुखी कई आकर का हो सकता है। कुछ ज्वालामुखी एक सही कोन की आकार के होते हैं तो कुछ ज्वालामुखी बहुत गहरे पानी से भरे हुए होते हैं। ज्वालामुखी की अलग अलग आकृतियों के आधार पर इसे तीन अलग नामों से जाना जाता है।

ज्वालामुखी विस्फोट से पूर्व के संकेत

किसी भी ज्वालामुखी के आग उगलने से पहले कुछ परिवर्तन सामान्य रूप से देखे जाते हैं। इनमें उस जगह के आस-पास मौजूद पानी का स्तर अचानक बढने लगता है। ज्वालामुखी फटने से पहले भूकम्प के कुछ हल्के झटके भी आते हैं। इन तमाम बातों के अलावा ज्वालामुखी क्या-क्या तबाही लाने वाला है, इसका संकेत वह खुद ही देता है। जो ज्वालामुखी पर्वत फटने वाला होता है, उस पर्वत में से गैसों का रिसाव शुरू हो जाता है। गैसों का यह रिसाव इसके मुहाने (मुख) या फिर ‘क्रेटर’ से होता है। इसके अलावा, पर्वत में कई जगह पैदा हुई दरारों से भी इन गैसों का रिसाव होता है। यह इस बात का संकेत है कि अब इसके आग उगलने का समय आ गया है। इन गैसों में सल्फ़र-डाई-ऑक्साइड, कॉर्बन-डाई-ऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड आदि प्रमुख गैसें होती हैं। इनमें से हाइड्रोजन-क्लोराइड और कॉर्बन-डाई-ऑक्साइड बेहद ख़तरनाक होती है।

सक्रीय और निष्क्रिय ज्वालामुखी – Volcano Information in Hindi

किसी भी ज्वालामुखी को तब तक जीवित माना जाता है जब तक उसमे से लावा, गैस आदि बाहर आता है। यदि ज्वालामुखी से लावा नहीं निकलता है तो उसे निष्क्रिय ज्वालामुखी कहते हैं। निष्क्रिय ज्वालामुखी भविष्य में सक्रीय हो सकती है। यदि कोई ज्वालामुखी 10,000 वर्षों तक निष्क्रिय रहती है तो उसे मृत ज्वालामुखी कहा जाता है।

ज्वालामुखी के प्रकार – Types of Volcano in Hindi

एक अनुमान के मुताबिक अभी तक पूरी दुनिया में क़रीब 1500 जीवित ज्वालामुखी पर्वत हैं। हिमालय एक मृत ज्वालामुखी है, इसलिए इससे किसी भी प्रकार का ख़तरा होने की आशंका नहीं है। मगर दूसरी तरफ ‘माउंट एटना’ समेत कई अन्य जीवित ज्वालामुखी हैं, क्योंकि इनसे समय-समय पर लावा और गैस निकलती रहती हैं। ज्वालामुखी मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं। इन तीनों प्रकार के ज्वालामुखी का वर्णन नीचे दिया जा रहा है।

1). ढाल ज्वालामुखी (Shield Volcano)

यदि मेग्मा बहुत गर्म हो और बहुत तेज़ गति में भूमि से बाहर आ रहा हो तो विस्फोटन सामान्य होता है। इससे निकलने वाला मैग्मा बहुत अधिक मात्रा में होता है। लावा बहुत आराम से बहने की वजह से ये ज्वालामुखी के मुख पर एक निश्चित तरह से जमता जाता है, और ज्वालामुखी के उद्गम द्वार से दूर जाने पर इसका स्लोप कम होता जाता है। इस तरह के ज्वालामुखी के मैग्मा का तामपान लगभग 800 से 1200 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य होता है।

2). सम्मिश्रित ज्वालामुखी (Composite Volcano)

इस तरह के ज्वालामुखी में एक विशेष तरह का विस्फोट होता है। जब मैग्मा का तामपान थोडा कम हो जाता है तो ये जमने लगता है और गैस को फ़ैल कर बाहर निकलने में दिक्क़त पेश आती है। फलस्वरूप भूमि के नीचे से आने वाला मैगमा बहुत अधिक बल के साथ बहार निकलता है और विस्फोट होता है। इस तरह के ज्वालामुखी में एक निश्चित तरह से लावा बहता है जिसे लहर कहा जाता है। इस ज्वालामुखी के लावा का तामपान 800 से 1000 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य होता है।

3). काल्डेरा ज्वालामुखी (Caldera Volcano)

इस तरह के ज्वालामुखी में ऐसा विस्फोट होता है कि लावा का अधिकांश हिस्सा ज्वालामुखी के मुख पर जम जाता है, और ज्वालामुखी का आकार एक बेसिन की तरह हो जाता है। इस ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा बहुत ही चिपचिपा होता है। इसका लावा बाक़ी ज्वालामुखी के लावा से अपेक्षाकृत अधिक ठंडा होता है। इसके मैग्मा का तापमान 650 से 800 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य होता है।

ज्वालामुखी की जगह किस तरह की होती हैं?

ज्वालामुखी की जगह तीन प्रकार के होते हैं। पहली तरह का ज्वालामुखी एक खोखली पहाड़ी जैसा होता है जिससे लावा निकलती है। दूसरी श्रेणी वाले ज्वालामुखी ऊंचे पर्वत होते हैं जिनमें कई सुरंगें होती हैं जिनसे लावा निकलता है. तीसरी तरह के ज्वालामुखी हवाई में पाए जाते हैं। यह समतल पहाड़ियों जैसे होते हैं। एक चौथी तरह के ज्वालामुखी को लावा डोम कहते हैं। यह एक जगह में जमा हुआ लावा होता है जो वक्त के साथ ठंडा पड़ जाता है लेकिन कई बार ऐसे डोम फट भी जाते हैं।

ज्वालामुखी का अस्तित्त्व – Jwalamukhi History in Hindi

पृथ्वी की सतह का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ज्वालामुखियों के फटने का नतीजा है। इनसे निकला लावा करोड़ों साल पहले जम गया होगा और इससे जमीन की सतह बनी होगी। समुद्र तल और कई पहाड़ भी ज्वालामुखी के लावा की देन हैं। ज्वालामुखी से निकली गैसों से वायुमंडल की रचना हुई।

ज्वालामुखी न सिर्फ़ पृथ्वी पर ही मौजूद हैं, बल्कि इनका अस्तित्व महासागरों में भी है। समुद्र में क़रीब दस हज़ार ज्वालामुखी मौजूद हैं। आज भी कई ज्वालामुखी वैज्ञानिकों की निगाह से बचे हुए हैं। विनाशकारी सुनामी लहरों का निर्माण भी समुद्र के भीतर ज्वालामुखी विस्फोट से ही होता है। सबसे बड़ा ज्वालामुखी पर्वत हवाई में है। इसका नाम ‘मोना लो’ है। यह क़रीब 13000 फ़ीट ऊँचा है। यदि इसको समुद्र की गहराई से नापा जाए, तो यह क़रीब 29000 फ़ीट ऊँचा है। इसका अर्थ है कि यह माउंट एवरेस्ट से भी ऊँचा है। इसके बाद सिसली के ‘माउंट ऐटना’ का नंबर आता है। यह विश्व का एकमात्र सबसे पुराना ज्वालामुखी है। यह 3,5000 साल पुराना है। ज्वालामुखी ‘स्ट्रोमबोली’ को तो ‘लाइटहाउस ऑफ़ मैडिटैरियन’ कहा जाता है। इसकी वजह है कि यह हर वक्त सुलगता ही रहता है।

क्या ज्वालामुखी से खनिज पदार्थ निकलते हैं?

ज्वालामुखी से निकले लावे में कई तरह के खनिज भी होते हैं। ज्वालामुखी पर्वत कई तरह की चट्टानों से बने होते हैं। इनमें काली, सफ़ेद, भूरी चट्टानें आदि शामिल हैं। अमेरिका में एण्डिज पर्वतमाला को ज्वालामुखी पर्वत शृंखला के तौर पर लिया जाता है। हवाई (अमेरिका) में मौजूद कई टापू अपने काली मिट्टी से बने तटों के लिए बेहद प्रसिद्ध हैं। ये तट और कुछ नहीं, बल्कि इन पर्वतों से निकले खनिज ही हैं। ज्वालामुखी ज़मीन की अथाह गहराई में छिपे खनिजों को एक ही बार में बाहर फेंक देता है।

ज्वालामुखी की तीव्रता माप

1982 में ज्वालामुखी की तीव्रता मापने के लिए शून्य से आठ के स्केल वाला वीईआई इंडेक्स बनाया गया। शून्य से दो के स्कोर वाले रोजाना फटने वाले ज्वालामुखी होते हैं। तीसरी श्रेणी के ज्वालामुखी का फटना घातक होता है और यह हर साल होते हैं। चार और पांच की श्रेणी के ज्वालामुखी दशक या एक सदी में एक बार फटते हैं और इनके लावा 25 किलोमीटर ऊंचे हो सकते हैं। छह और सात की श्रेणी वाले ज्वालामुखियों से सुनामी आते हैं या भूकंप होता है। आठवीं श्रेणी के कम ही ज्वालामुखी हैं। पिछला विस्फोट ईसा से 24,000 बरस पहले हुआ।

शक्तिशाली ज्वालामुखी – World’s Most Powerful Volcano

वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती पर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक ज्वालामुखी ‘तंबोरा’ है। जो इंडोनेशिया में मौजूद है। हिन्द महासागर में सबसे ज़्यादा ताकतवर ज्वालामुखी ‘पिटों दे ला फॉर्नेस’ है, तो पृथ्वी का सबसे बड़ा ज्वालामुखी ‘मौना लोआ’ को माना जाता है। जो हवाई द्वीप में है। इनके अलावा भी सैकड़ों ऐसे ज्वालामुखी हैं, जो भूकम्प के हालात पैदा होने पर ख़तरा बन जाते हैं।

भारत में ज्वालामुखी – Volcano in India in Hindi

भारत के दो सबसे ख़तरनाक ज्वालामुखी अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह पर हैं। इनमें से एक बैरन द्वीप है। 2004 में आई सुनामी के दौरान बैरन फट गया था। इस दौरान इसके 500 मीटर ऊँचे क्रेटर से लावा निकलने लगा था। अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से क़रीब 135 किलोमीटर दूर बैरन द्वीप में इससे पहले 1996 में विस्फोट हुआ था। इसी के मिलते जुलते नाम वाला ज्वालामुखी है, ‘बैरन आयलैंड’। गोल आकार वाले इस ज्वालामुखी में 1994-95 में कई विस्फोट हो चुके हैं। इससे निकले लावे के निशान आज भी मौजूद हैं। अंडमान में ही तीसरा बड़ा ज्वालामुखी है, ‘नारकोंडम’। जिसे पहले समाप्त मान लिया गया था। जून 2005 में इस ज्वालामुखी से कीचड़ और धुआँ निकलता देखा गया था। इससे पहले 100 साल तक इसमें कोई गतिविधि नहीं हुई थी। कहा जाता है कि 2004 में सुमात्रा में आए भूकम्प की वजह से इसमें विस्फोट हुआ।


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