कवी सुमित्रानंदन पंत की जीवनी | Sumitranandan Pant Biography in Hindi

Sumitranandan Pant / सुमित्रानंदन पंत एक महान कवी, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक हैं। सुमित्रानंदन पंत नये युग के प्रवर्तक के रूप में आधुनिक हिन्दी साहित्य में उदित हुए। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था।

कवी सुमित्रानंदन पंत की जीवनी | Sumitranandan Pant Biography in Hindiसुमित्रानंदन पंत का परिचय – Sumitranandan Pant Biography in Hindi

आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनके बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं कि ‘पंत अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।

सुमित्रानंदन पंत अपनी रचना के माध्यम से भाषा में निखार लाने के साथ ही भाषा को संस्कार देने का भी प्रयास किया। इन्होंने अपने लेखन के जादू से जिस प्रकार नैसर्गिक सौंदर्य को शब्दों में ढ़ाला, इससे उन्हें हिंदी साहित्य का ‘वर्डस्वर्थ’ कहा गया। पंत की रचनाओं पर रविंद्रनाथ टैगोर के अलावा शैली, कीट्स, टेनिसन आदि जैसे अंग्रेजी कवियों की कृतियों का भी प्रभाव रहा है। पंत हालाँकि प्रकृति के कवि माने जाते हैं, परंतु वास्तविकता में वह मानव सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के भी कुशल कवि थे।

पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएँ लिख डालीं। इस कवि ने महानायक अमिताभ बच्चन को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था। हरिवंश राय ‘बच्चन’ और श्री अरविंदो के साथ उनकी ज़िंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकाल में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है।

प्रारंभिक जीवन –

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 में कौसानी, उत्तराखण्ड, भारत में हुआ था। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनके पिता ‘गंगादत्त’ कौसानी चाय बग़ीचे के मैनेजर थे। वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनका वास्तविक नाम गुसाई दत्त रखा गया था। लेकिन उनको अपना नाम पसंद नहीं था सो उन्होंने अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया।

इन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूल की पढाई अल्मोड़ा से पूरी की और 18 साल की उम्र अपने भाई के पास बनारस चले गए। यहाँ से इन्होंने जयनारायण हाईस्कूल से हाई स्कूल की परीक्षा पास की। हाई स्कूल पास करने के बाद सुमित्रा नंदन पंत स्नात्तक की पढाई करने के लिए इलाहाबाद चले गए और वहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। परंतु स्नात्तक की पढाई बीच में ही छोड़कर वे महात्मा गाँधी का साथ देने के लिए सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद अकादमिक पढाई तो सुमित्रा नंदन पंत नहीं कर सके, परंतु घर पर ही उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और बंगाली साहित्य का अध्ययन करते हुए अपनी पढाई को जारी रखा।

कार्य क्षेत्र – करियर –

पंत को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था। क्योंकि जन्म के छ: घण्टे बाद ही इनकी माँ का निधन हो गया था, इसीलिए प्रकृति की यही रमणीयता इनकी माँ बन गयी। प्रकृति के इसी ममतामयी छांव में बालक गुसाईं दत्त धीरे- धीरे यहां के सौन्दर्य को शब्दों के माध्यम से काग़ज़ में उकेरने लगा। इन्होने सात साल की उम्र में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था, जब वे चौथी कक्षा में पढ़ते थे। इस दौरान पहाड़ों का नैसर्गिक सौंदर्य ही उनका प्रेरणा स्त्रोत बना।

1907-1918 का यह वह समय था, जब पंत पहाड़ की वादियों में अपनी रचनाशीलता को सींच रहे थे। इस दौरान इन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य को जितना अनुभव किया और समझा, उसे छोटी-छोटी कविताओं में ढ़ालने का प्रयास किया। उस दौर की पंत की कविताओं को संकलित कर 1927 में “वीणा” नाम से प्रकाशित किया गया। इससे पूर्व वर्ष 1922 में सुमित्रा नंदन पंत की पहली पुस्तक “उच्छावास” और दूसरी “पल्लव” नाम से प्रकाशित हुई। फिर “ज्योत्स्ना” और “गुंजन” का प्रकाशन हुआ। पंत की इन तीनों कृतियों को कला साधना एवं सौंदर्य की अनुपम कृति माना जाता है। हिंदी साहित्य में इस काल को पंत का स्वर्णिम काल भी कहा जाता है।

कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। अल्मोड़ा में तब कई साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियां होती रहती थीं जिसमें पंत अक्सर भाग लेते रहते। स्वामी सत्यदेव जी के प्रयासों से नगर में ‘शुद्ध साहित्य समिति‘ नाम से एक पुस्तकालय चलता था। इस पुस्तकालय से पंत जी को उच्च कोटि के विद्वानों का साहित्य पढ़ने को मिलता था। कौसानी में साहित्य के प्रति पंत जी में जो अनुराग पैदा हुआ वह यहां के साहित्यिक वातावरण में अब अंकुरित होने लगा। कविता का प्रयोग वे सगे सम्बन्धियों को पत्र लिखने में करने लगे।

शुरुआती दौर में उन्होंने ‘बागेश्वर के मेले’, ‘वकीलों के धनलोलुप स्वभाव’ व ‘तम्बाकू का धुंआ’ जैसी कुछ छुटपुट कविताएं लिखी। आठवीं कक्षा के दौरान ही उनका परिचय प्रख्यात नाटककार गोविन्द बल्लभ पंत, श्यामाचरण दत्त पंत, इलाचन्द्र जोशी व हेमचन्द्र जोशी से हो गया था। अल्मोड़ा से तब हस्तलिखित पत्रिका ‘सुधाकर‘ व ‘अल्मोड़ा अखबार‘ नामक पत्र निकलता था जिसमें वे कविताएं लिखते रहते। अल्मोड़ा में पंत जी के घर के ठीक उपर स्थित गिरजाघर की घण्टियों की आवाज़ उन्हें अत्यधिक सम्मोहित करती थीं। अक़्सर प्रत्येक रविवार को वे इस पर एक कविता लिखते। ‘गिरजे का घण्टा‘ शीर्षक से उनकी यह कविता सम्भवतः पहली रचना है।

दुबले पतले व सुन्दर काया के कारण पंत जी को स्कूल के नाटकों में अधिकतर स्त्री पात्रों का अभिनय करने को मिलता। 1916 में जब वे जाड़ों की छुट्टियों में कौसानी गये तो उन्होंने ‘हार‘ शीर्षक से 200 पृष्ठों का ‘एक खिलौना’ उपन्यास लिख डाला। जिसमें उनके किशोर मन की कल्पना के नायक नायिकाओं व अन्य पात्रों की मौजूदगी थी। कवि पंत का किशोर कवि जीवन कौसानी व अल्मोड़ा में ही बीता था। इन दोनों जगहों का वर्णन भी उनकी कविताओं में मिलता है।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान –

1921 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया था, पर देश के स्वतंत्रता संग्राम की गंभीरता के प्रति उनका ध्यान 1930 के नमक सत्याग्रह के समय से अधिक केंद्रित होने लगा, इन्हीं दिनों संयोगवश उन्हें कालाकांकर में ग्राम जीवन के अधिक निकट संपर्क में आने का अवसर मिला। उस ग्राम जीवन की पृष्ठभूमि में जो संवेदन उनके हृदय में अंकित होने लगे, उन्हें वाणी देने का प्रयत्न उन्होंने युगवाणी (1938) और ग्राम्या (1940) में किया। यहाँ से उनका काव्य, युग का जीवन-संघर्ष तथा नई चेतना का दर्पण बन जाता है।

सुमित्रा नंदन पंत ने अपनी रचना के माध्यम से केवल प्रकृति के सौंदर्य का ही गुणगान नहीं किया, वरन् उन्होंने प्रकृति के माध्यम से मानव जीवन के उन्नत भविष्य की भी कामना की है।

पंत की भाव-चेतना महाकवि रबींद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी और श्री अरबिंदो घोष की रचनाओं से प्रभावित हुई। साथ ही कुछ मित्रों ने मार्क्सवाद के अध्ययन की ओर भी उन्हें प्रवृत किया और उसके विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पक्षों को उन्होंने गहराई से देखा व समझा। 1950 में रेडियो विभाग से जुड़ने से उनके जीवन में एक ओर मोड़ आया। सात वर्ष उन्होंने ‘हिन्दी चीफ़ प्रोड्यूसर’ के पद पर कार्य किया और उसके बाद साहित्य सलाहकार के रूप में कार्यरत रहे।

सुमित्रानंदन पंत आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक युग प्रवर्तक कवि हैं। उन्होंने भाषा को निखार और संस्कार देने, उसकी सामर्थ्य को उद्घाटित करने के अतिरिक्त नवीन विचार व भावों की समृद्धि दी। पंत सदा ही अत्यंत सशक्त और ऊर्जावान कवि रहे हैं। सुमित्रानंदन पंत को मुख्यत: प्रकृति का कवि माना जाने लगा। लेकिन पंत वास्तव में मानव-सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के भी कुशल कवि थे।

निधन –

महाकवि सुमित्रानंदन पंत की मृत्यु 28 दिसम्बर, 1977 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुई। उन्हें मधुमेह हो गया था।

प्रमुख कृतियां :

वीणा, उच्छावास, पल्लव, ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन पल्लवणी, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युग पथ, सत्यकाम।

पुरस्कार/सम्मान :

“चिदम्बरा” के लिये भारतीय ज्ञानपीठ, लोकायतन के लिये सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार और हिन्दी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिये उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।


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