सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की जीवनी | Suryakant Tripathi Nirala

Suryakant Tripathi Nirala  / सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ एक महान कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे। उन्हें हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये।

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' की जीवनी | Suryakant Tripathi Niralaसूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का परिचय – Suryakant Tripathi Nirala Biography in Hindi

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। वे हिन्दी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। उनका व्यक्तित्व अतिशय विद्रोही और क्रान्तिकारी तत्त्वों से निर्मित हुआ है। उसके कारण वे एक ओर जहाँ अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तनों के सृष्टा हुए, वहाँ दूसरी ओर परम्पराभ्यासी हिन्दी काव्य प्रेमियों द्वारा अरसे तक सबसे अधिक ग़लत भी समझे गये। उनके विविध प्रयोगों- छन्द, भाषा, शैली, भावसम्बन्धी नव्यतर दृष्टियों ने नवीन काव्य को दिशा देने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए घिसी-पिटी परम्पराओं को छोड़कर नवीन शैली के विधायक कवि का पुरातनतापोषक पीढ़ी द्वारा स्वागत का न होना स्वाभाविक था। लेकिन प्रतिभा का प्रकाश उपेक्षा और अज्ञान के कुहासे से बहुत देर तक आच्छन्न नहीं रह सकता।

1930 में प्रकाशित अपने काव्य संग्रह परिमल की भूमिका में वे लिखते हैं- “मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है। जिस तरह मुक्त मनुष्य कभी किसी तरह दूसरों के प्रतिकूल आचरण नहीं करता, उसके तमाम कार्य औरों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं फिर भी स्वतंत्र। इसी तरह कविता का भी हाल है।”

महाकवि, महामानव और महाप्राण जैसे विरुदों से सम्मानित सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ वास्तव में अपने नाम के ही अनुरूप निराले रचनाकार थे। वे हिन्दी साहित्याकाश के सबसे देदीप्यमान नक्षत्रों में से एक थे।

प्रारंभिक जीवन –

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी, 1896 महिषादल, मेदनीपुर, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उनके पिता पंण्डित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का गढ़कोला नामक गाँव के निवासी थे। हालाँकि उनके जन्म की तिथि को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं। निराला जी के कहानी संग्रह ‘लिली’ में उनकी जन्मतिथि 21 फरवरी 1899 प्रकाशित है। ‘निराला’ अपना जन्म-दिवस वसंत पंचमी को ही मानते थे।

निराला की शिक्षा बंगाली माध्यम से शुरू हुई। हाईस्कूल पास करने के बाद उन्होंने घर पर ही हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया। हाईस्कूल करने के पश्चात वे लखनऊ और उसके बाद गढकोला (उन्नाव) आ गये। प्रारम्भ से ही रामचरितमानस उन्हें बहुत प्रिय था। वे हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा में निपुण हो गए थे और श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे। 10वी कक्षा में पहुँचते-पहुँचते इनकी दार्शनिक रुचि का परिचय मिलने लगा। निराला स्वच्छन्द प्रकृति के थे और स्कूल में पढने से अधिक उनकी रुचि घूमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लड़ने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन में उनका विशेष मन नहीं लगता था। इस कारण उनके पिता कभी-कभी उनसे कठोर व्यवहार करते थे, जबकि उनके हृदय में अपने एकमात्र पुत्र के लिये विशेष प्यार था।

पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में निराला का विवाह मनोहरा देवी से हो गया। रायबरेली ज़िले में डलमऊ के पं. रामदयाल की पुत्री मनोहरा देवी सुन्दर और शिक्षित थीं, उनको संगीत का अभ्यास भी था। पत्नी के ज़ोर देने पर ही उन्होंने हिन्दी सीखी। इसके बाद अतिशीघ्र ही उन्होंने बंगला के बजाय हिन्दी में कविता लिखना शुरू कर दिया। बचपन के नैराश्य और एकाकी जीवन के पश्चात उन्होंने कुछ वर्ष अपनी पत्नी के साथ सुख से बिताये, किन्तु यह सुख ज़्यादा दिनों तक नहीं टिका और उनकी पत्नी की मृत्यु उनकी 20 वर्ष की अवस्था में ही हो गयी। वे आर्थिक विषमताओं से भी घिरे रहे। ऐसे समय में उन्होंने विभिन्न प्रकाशकों के साथ प्रूफ रीडर के रूप मॆं काम किया, उन्होंने ‘समन्वय’ का भी सम्पादन किया।

उनका जीवन कठिनमय रहा, तीन वर्ष की बालावस्था में माँ की ममता छीन गई व युवा अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते पिताजी भी साथ छोड़ गए। प्रथम विश्वयुध्द के बाद फैली महामारी में उन्होंने अपनी पत्नी मनोहरा देवी, चाचा, भाई तथा भाभी को गँवा दिया। विषम परिस्थितियों में भी आपने जीवन से समझौता न करते हुए अपने तरीक़े से ही जीवन जीना बेहतर समझा।

कार्यक्षेत्र – करियर

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘वरुला’ की पहली नियुक्ति मेषाधध राज्य में ही हुआ था। उन्होंने 1918 से 1922 तक यह नौकरी की उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुआ 1922 से 1923 के बीच में कोलकाता से प्रकाशित समन्वय का संपादन किया गया, से अगस्त 1923 का मण्णा के संपादक मंडल में कार्य किया। इसके बाद लखनऊ में गंगा किताब माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई जहां उन्होंने संस्था के मासिक पत्रिका सुधा से 1935 के मध्य तक संबद्ध किया था। 1935 से 1940 तक कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया।

इसके बाद 1942 से मृत्यु के समय में इलाहाबाद में स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया था। उनकी पहली कविता जन्मभूमि प्रभात नामक मासिक पत्र में जून 1920 में, पहला कविता संग्रह 1923 में अनामिका नाम से, और प्रथम निबंध बांग भाषा का उच्चारण अक्टूबर 1920 में मासिक पत्रिका में सरस्वती प्रकाशित हुई। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।

सन् 1916 ई. में ‘निराला’ की अत्यधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचना ‘जुही की कली’ लिखी गयी। यह उनकी प्राप्त रचनाओं में पहली रचना है। यह उस कवि की रचना है, जिसने ‘सरस्वती’ और ‘मर्यादा’ की फ़ाइलों से हिन्दी सीखी, उन पत्रिकाओं के एक-एक वाक्य को संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी व्याकरण के सहारे समझने का प्रयास किया। इस समय वे महिषादल में ही थे। ‘रवीन्द्र कविता कानन’ के लिखने का समय यही है। सन् 1916 में इनका ‘हिन्दी-बंग्ला का तुलनात्मक व्याकरण’ ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ।

निराला वास्तव में ओज, औदात्य एवं विद्रोह के कवि हैं। उनपर वेदांत और रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानंद के दर्शन का प्रभाव रहा है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में रहस्यवाद भी मिलता है। निराला अकुंठ एवं वयस्क श्रंगार दृष्टि तथा तृप्ति के कवि हैं। वे सु:ख और दु:ख दोनों को भरपूर देख कर तथा उससे ऊपर उठ कर चित्रण करने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविता में बौद्धिकता का भरपूर दबाव और तर्क संगति है। अपने युग का विषय, यथार्थ और उससे उबरने की साधना उनकी तीन प्रबंधात्मक दीर्घ कविताओं – तुलसीदास, सरोजस्मृति और राम की शक्तिपूजा में प्रकट हुई हैं।

निधन –

इलाहाबाद से सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का विशेष अनुराग लम्बे समय तक बना रहा। इसी शहर के दारागंज मुहल्ले में अपने एक मित्र, ‘रायसाहब’ के घर के पीछे बने एक कमरे में 15 अक्टूबर 1971 को इन्होने अपने प्राण त्याग इस संसार से विदा ली।

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की कविताए –

  • परिमल
  • अनामिका
  • गीतिका
  • कुकुरमुत्ता
  • आदिमा
  • बेला
  • नये पत्त्ते
  • अर्चना
  • आराधना
  • तुलसीदास
  • जन्मभूमि।

उपन्यास –

  • अप्सरा
  • अल्का
  • प्रभावती
  • निरूपमा
  • चमेली
  • उच्च्श्रंखलता
  • काले कारनामे।

कहानी संग्रह –

  • चतुरी चमार
  • शुकुल की बीवी
  • सखी
  • लिली
  • देवी।

और अधिक लेख –

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