वैज्ञानिक हरगोविन्द खुराना जीवनी Hargobind Khorana Biography In Hindi

Dr Hargobind Khorana / प्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लिटाइड की भूमिका का प्रदर्शन करने वाले पहले व्यक्ति डॉ हरगोविंद खुराना एक भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक थे जिन्हें सन 1968 चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें यह पुरस्कार साझा तौर पर दो और अमेरिकी वैज्ञानिकों मार्शल डब्ल्यू. नीरेनबर्ग और डॉ. रॉबर्ट डब्‍लू. रैले के साथ दिया गया। इस अनुसंधान से पता लगाने में मदद मिली कि कोशिका के आनुवंशिक कूट (Code) को ले जाने वाले न्यूक्लिक अम्ल (Acid) न्यूक्लिओटाइड्स कैसे कोशिका के प्रोटीन संश्लेषण (सिंथेसिस) को नियंत्रित करते हैं। सन 1968 में ही डॉ॰ निरेनबर्ग के साथ डॉ खुराना को लूशिया ग्रौट्ज हॉर्विट्ज पुरस्कार भी दिया गया।

Dr Hargovind Khorana Biography In Hindi,

डॉ हरगोविन्द खुराना का परिचय – Dr Hargobind Khorana Biography in Hindi 

नामडॉ. हरगोविंद खुराना. (Har Gobind Khorana)
जन्म दिनांक9 फरवरी, 1922.
जन्म स्थानरायपूर जि.मुल्तान, पंजाब (अब पाकिस्तान).
मृत्यु9 नवम्बर, 2011, कॉनकॉर्ड, मैसाचूसिट्स, अमरीका
पिता का नामलाला गणपतराय.
माता का नामकृष्णा देवी खुराना
पत्नीएस्थर
शिक्षास्नातक (ऑनर्स)
नागरिकताभारत, अमेरिका
पुरस्कार-उपाधिनोबेल पुरस्कार, पद्म विभूषण.
विशेष योगदानप्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लिटाइड की भूमिका का प्रदर्शन करने वाले वह पहले थे

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय मूल के वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना को उनकी 96वीं जयंती (9 जनवरी, 2018) पर गूगल ने एक डूडल बनाकर याद किया है। डूडल में एक रंगीन और ब्लैक एंड व्हाइट चित्र बनाया गया है, जिसमें प्रोफेसर खुराना वैज्ञानिक प्रयोग करते हुए दिखाई दे रहे हैं और साथ में उनकी एक बड़ी-सी तस्वीर भी बनाई गई है।

प्रारंभिक जीवन  

हरगोविंद खुराना का जन्म अविभाजित भारत के रायपुर (जिला मुल्तान, पंजाब) नामक स्थान पर 9 जनवरी 1922 में हुआ था। उनके पिता लाला गणपतराय गाँव के पटवारी थे। अपने माता-पिता के चार पुत्रों में हरगोविंद सबसे छोटे थे। गरीबी होने के बावजूद हरगोविंद के पिता ने अपने बच्चो की पढ़ाई पर ध्यान दिया जिसके कारण खुराना ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया। उनके माता-पिता उन्हें बचपन से ही यह शिक्षा दे रहे थे कि लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और प्यार से पेश आओ। हरगोविंद आजीवन उनकी इन बातों पर अमल करते रहे। वे जब मात्र 12 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया और ऐसी परिस्थिति में उनके बड़े भाई नंदलाल ने उनकी पढ़ाई-लिखाई का जिम्‍मा संभाला।

शिक्षा 

हरगोविंद की प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्‍कूल में हुई। उन्‍होंने मिडिल की परीक्षा खालेवाल से दी, जिसमें उन्‍हें पूरे जिले में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त हुआ। इससे उन्‍हें छात्रवृत्ति भी प्राप्‍त हुई। उसके बाद उन्‍होंने डी.ए.वी हाईस्‍कूल, मुल्‍तान में प्रवेश लिया। वे प्रारम्‍भ से मेधावी विद्यार्थी थे और अक्‍सर पढ़ाई में इतने मगन हो जाते थे कि भूख-प्‍यास तक भुला देते थे। हरगोविंद को बचपन से ही गणित में विशेष रूचि थे।

जब हाईस्‍कूल का रिजल्‍ट निकला, उनका नाम मेरिट सूची में शामिल था। उसे देखकर वे जोर-जोर से रोने लगे। यह देखकर सभी बच्‍चे आश्‍चर्यचकित रहे गये। किसी को उनके रोने का कारण समझ में नहीं आ रहा था। आखिर एक बच्‍चे ने रोने का कारण पूछा- ‘गोविन्‍द (प्‍यार से लोग उन्‍हें गाविन्‍द भी कहते थे), तुम रो क्‍यों रहे हो। तुम्‍हारा नाम तो मेरिट लिस्‍ट में आया है।’ यह सुनकर हरगोविंद ने सुबकते हुए जवाब दिया, ‘हाँ, पर मेरा नाम मेरिट लिस्‍ट में दूसरे स्‍थान पर है।’

सन 1939 में हरगोविंद ने लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज में प्रवेश लिया। उन दिनों यहां देश के क्रांतिकारियों और राजनीतिज्ञों का जमघट लगा हुआ था। इस माहौल में देश-भक्तों के साथ रहना और पढाई करना उनके लिए बड़े गर्व की बात थी। 21 वर्ष की आयु में हरगोविंद ने बी. एससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। अध्यापकों उनकी प्रतिभा पर आश्चर्य होता था। हरगोविंद ने कॉलेज की प्रयोगशाला में जितने भी प्रयोग किए, वे सभी अन्य छात्रों के प्रयोगों से अधिक अच्छे साबित हुए। उसके बाद उन्‍होंने रसायन विज्ञान से एम.एस-सी. की। यह परीक्षा भी उन्‍होंने प्रथम श्रेणी में पास की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्‍हें छात्रवृत्ति भी प्राप्‍त हुई। उन‍ दिनों शोध कार्य के लिए भारत में अच्‍छी सुविधा उपलबध नहीं थी, इसलिए वे इंग्‍लैण्‍ड चले गये।

करियर की शुरुआत 

यह बात सन 1946 की है. उन दिनों विज्ञान की दुनिया में तरह-तरह के शोध हो रहे थे। भारतीय नौजवानों को विज्ञान के प्रति जागरुक बनाने के लिए बहुत तेजी से प्रयास किए जा रहे थे। हरगोविंद ने लिवरपूल विश्‍वविद्यालय (Liverpool University) में प्रवेश लिया। वहाँ पर उन्‍हें नोबेल पुरस्‍कार विजेता प्रो. अलेक्‍जेंडर टॉड (Prop. Alexander Todd) के साथ काम करने का मौका मिला। उन्‍होंने जैव रसायन के अन्‍तर्गत ‘न्‍यूक्लिओटाइड’ (Nucleotide) विषय में शोधकार्य किया। सन 1948 में उनका शोधकार्य पूरा हुआ। उसी दौरान उन्‍हें भारत सरकार से एक और छात्रवृत्ति मिली, जिससे वे आगे के अध्‍ययन के लिए स्विटजरलैण्‍ड चले गये। वहाँ पर उन्‍होंने प्रो. प्रिलॉग (Prop. Prologue) के साथ रहकर काम किया।

हरगोविंद अपनी पढाई पूरी करके अपने भाई के पास आ गये। उन्‍होंने दिल्‍ली बंगलौर सहित कई प्रयोगशालाओं में नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन संयोग से उनको मनचाही नौकरी नहीं मिल सकी। इससे हरगोविंद थोड़ा खिन्‍न हो गये और वापस इंग्‍लैण्‍ड चले गये। और केंब्रिज विश्वविद्यालय में लार्ड टाड के साथ कार्य किया। वे सन 1950 से 1952 तक कैंब्रिज में रहे। इसके बाद उन्होंने के प्रख्यात विश्वविद्यालयों में पढ़ने और पढ़ाने दोनों का कार्य किया।

1952 में उन्हें वैंकोवर (कैनाडा) की कोलम्बिया विश्‍विद्यालय (Columbia University) से बुलावा आया जिसके उपरान्त वे वहाँ चले गये और जैव रसायन विभाग के अध्‍यक्ष बना दिए गये। इस संस्थान में रहकर उन्‍होंने आनुवाँशिकी के क्षेत्र में शोध कार्य प्रारंभ किया और धीरे-धीरे उनके शोधपत्र अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और शोध जर्नलों में प्रकाशित होने लगे। इसके फलस्वरूप वे काफी चर्चित हो गये और उन्‍हें अनेक सम्मान और पुरस्‍कार भी प्राप्‍त हुए। सन 1960 में उन्हें ‘प्रोफेसर इंस्टीट्युट ऑफ पब्लिक सर्विस’ कनाडा में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया और उन्हें ‘मर्क एवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया। इसके पश्चात डॉ. खुराना अमेरिका चले गये। वहाँ पर वे विस्‍काँसिन विश्‍वविद्यालय (Wisconsin University) के एंजाइम शोध संस्‍थान (Engine Research Institute) के सहायक निर्देशक नियुक्‍त हुए। आगे चलकर वे संस्‍थान के महानिदेश भी बने।

डॉ. हरगोविन्द खुराना को नोबेल पुरस्कार कब मिला? Har Gobind Khorana Nobel Prize in Hindi

डॉ. खुराना ने एंजाइम शोध संस्‍थान में रहते हुए जेनेटिक कोड (Genetic Code) पर शोध कार्य किया। उनके इस शोध में अमेरिकी वैज्ञानिक मार्शल निरेनबर्ग (Marshall Nirenberg) और डॉ. रॉबर्ट डब्‍लू. रैले (Robert W. Railey) ने सहयोग दिया। उनका यह शोध बहुत महत्‍वपूर्ण सिद्ध हुआ, जिसपर उन्‍हें वर्ष 1968 का चिकित्‍सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) प्राप्‍त हुआ। डॉ हरगोविंद खुराना नोबेल पुरस्कार पाने वाले भारतीय मूल के तीसरे व्यक्ति थे।

सन 1970 में डॉ खुराना मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी.) में रसायन और जीव विज्ञान के अल्फ्रेड स्लोअन प्रोफेसर नियुक्त हुए। तब से लेकर सन 2007 वे इस संस्थान से जुड़े रहे और बहुत ख्याति अर्जित की। डॉक्टर खुराना ने अमेरिका में अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान कार्य जारी रखा और देश-विदेश के तमान छात्रों ने उनके सानिध्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

निजी जीवन 

डॉ. खुराना वर्ष 1952 में ही स्विटजरलैण्‍ड के एक संसद सदस्‍य की पुत्री से विवाह कर चुके थे। डॉक्टर खुराना को अपनी पत्नी से पूर्ण सहयोग मिला। उनकी पत्नी भी एक वैज्ञानिक थीं और अपने पति के मनोभावों को समझती थीं। खुराना दंपत्ति की तीन संताने हुईं – जूलिया एलिज़ाबेथ (1953), एमिली एन्न (1954) और डेव रॉय (1958). ऐसे में डॉ. खुराना का मन वहीं लग गया और उन्‍होंने सन 1966 में अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली।

पुरूस्कार और सम्मान – Har Gobind Khorana Awards in Hindi

 सन 1968 में चिकित्सा विज्ञानं का नोबेल पुरस्कार मिला।
 सन 1958 में उन्हें कनाडा का मर्क मैडल प्रदान किया गया।
 सन 1960 में कैनेडियन पब्लिक सर्विस ने उन्हें स्‍वर्ण पदक दिया।
 सन 1967 में डैनी हैनमैन पुरस्‍कार मिला।
 सन 1968 में लॉस्‍कर फेडरेशन पुरस्‍कार और लूसिया ग्रास हारी विट्ज पुरस्‍कार से सम्मानित किये गए।
 सन 1969 में भारत सरकार ने डॉ. खुराना को पद्म भूषण से अलंकृत किया।
 पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ ने डी.एस-सी. की मानद उपाधि दी।

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