आयुर्वेद-चिकित्सक महर्षि वाग्भट की कहानी | History of Vagbhata in Hindi

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Vagbhata Biography & History in Hindi / प्राचीन भारतीय चिकित्सा-विज्ञान अथवा आयुर्वेद चिकित्सा-जगत मे महान आचार्य आत्रेय, सुत्रुत और वाग्भट ‘व्रध्द्त्रय’ के नाम से विख्यात है। इनके ग्रंथ आज भी आयुर्वेद के छात्रो को पढ़ाया जाता है। आर्वचिन काल मे यूरोपियन चिकित्सक गेलें के समान ही वाग्भट का प्राचीन भारत के चिकित्सा जगत मे सम्मान और महत्व था। उन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अष्टांगसंग्रह’ तथा ‘अष्टांगहृदयम्’ की रचना की थी।

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महर्षि वाग्भट की जीवनी – History Of Vagbhata In Hindi

वाग्भट का जन्म सिंधु नदी के तटवर्ती किसी जनपद मे हुआ था, उनके पिता सिन्ह्गुप्त वैदिक ब्राह्मण थे। उनके अध्यापक अवलोकिता बौद्ध थे। उनके जीवन मे बौद्ध धर्म का प्रभाव था। वाग्भट ने आयुर्वेद के दो महत्वपूर्ण ग्रंथो अष्टांग संग्रह और अष्टांग ह्रदया सहीनता की रचना की, उनके ये ग्रंथ आज भी बड़े उपयोगी है और वैद लोग आज भी उनका सम्मान करते है।

ये दोनो ग्रंथ प्राचीन काल के दो प्रमुख चिकित्सा-पद्धतियो के आधार थे। वाग्भट ने अपने उपर बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण अपने ग्रंथ ‘अष्टांग ह्रदया’ को बौद्ध प्राथना से प्रारंभ किया।

चीनी यात्री इत्सिंग ने लिखा है कि उससे एक सौ वर्ष पूर्व एक व्यक्ति ने ऐसी संहिता बनाई, जिसमें आयुर्वेद के आठों अंगों का समावेश हो गया है। ‘अष्टांगहृदयम्’ का तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ था। आज भी अष्टांगहृदयम् ही ऐसा ग्रंथ है, जिसका जर्मन भाषा में भी अनुवाद हुआ है।

वाग्भट की भाषा में कालिदास जैसा लालित्य मिलता है। वाग्भट का समय पाँचवीं शती के लगभग है। ये बौद्ध थे, यह बात ग्रंथों से स्पष्ट है। रसशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ रसरत्नसमुच्चय का कर्ता भी वाग्भट कहा जाता है।

अपने इस ग्रंथ मे ‘अष्टांग हृद्या संहिता’ के प्रथम भाग मे वाग्भट ने प्राचीन आयुर्वेदिक औषधिया, विधार्थियो के लिए आवश्यक निर्देश, दैनिक और मौसमी निरीक्षण, रोगो की उत्पति और उपचार, व्यक्तिगत सफाई, औषधि और उनके विभाग तथा उनके लाभ आदि का वर्णन किया है।

इस ग्रंथ के दूसरे भाग मे उन्होने मानव शरीर की रचना, शरीर के प्रमुख अंगो, मनुष्य स्वभाव, मनुष्य के विभिन्न रूप और उनके आचार्नो की व्याख्या की है।

इसके तीसरे भाग मे उन्होने ज्वर, मिर्गी, उल्टी, दमा, चर्म रोग आदि बीमारियो के कारण और उपचार, चौथे भाग मे वमन और स्वच्छता के विषय मे, पाँचवे और अंतिम भाग मे बच्चो और उनसे संबंधित रोगो, साथ ही पागलपन, आँख, कान, नाक, मुख आदि के रोग और घाव आदि के उपचार, विभिन्न जानवरो और किडो के काटने के उपचार का वर्णन किया है।

साथ ही वाग्भट ने इस पुस्तक मे आपने पूर्ववर्ती चिकित्सको के विषय मे भी प्रकाश डाला है। इस प्रकार यह ग्रंथ आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह ग्रंथ इस बात को सिद्ध करता है की मध्य युग मे भारत का आयुर्विज्ञान उन्नत था और वाग्भट भारत के महान चिकित्सक थे।


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