जिंक्यात्रा क़िला, सतारा का इतिहास और जानकारी | Ajinkyatara Fort History in Hindi

Ajinkyatara Fort / जिंक्यात्रा क़िला महाराष्ट्र के ऐतिहासिक नगर सतारा में जिंक्यात्रा पहाड़ी पर स्थित है। इस क़िले का निर्माण शिलर राजवंश के राजा भोज ने करवाया था। यह 3000 फीट की ऊँचाई पर है और समुद्र तल से 1006 मीटर की ऊंचाई पर है। यह सांगली जिले में है। इसे “सप्त ऋषि” किले के नाम से भी जाना जाता है।

जिंक्यात्रा क़िला, सतारा का इतिहास और जानकारी | Ajinkyatara Fort History in Hindi

जिंक्यात्रा क़िला सतारा – Ajinkyatara Fort Satara History in Hindi 

यह किला एक पहाड़ी पर स्थित हैं जिस कारण इसे सतारा शहर में कहीं से भी देखा जा सकता है। अजिंक्यतारा पर्वत “बामनोली” पर्वत श्रृंखला पर बसा है जो कि प्रतापगढ़ से शुरू होती है। इन सभी किलों की भौगोलिक महत्व यह है कि, यहाँ पर एक किले से दूसरे किले तक सीधे यात्रा कर पहुँचाना असंभव है। इस क्षेत्र में स्तिथ बाकी सभी किले अजिंक्यतारा के अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर हैं। अजिंक्यतारा मराठों की चौथी राजधानी था।

यह किला दुश्मन से रक्षा प्रदान करता था। इस के भीतर मनमोहन करने वाला मंगलाई देवी का मंदिर है। यह किला 1857 के शहिदो की याद में बनाया गया है। इसका निर्माण राजा भोज ने किया था। इस किले पर पहले बहमानियों के द्वारा और फिर बीजापुर के आदिलशाह के द्वारा कब्जा हुआ।

सन 1580 में, आदिलशाह प्रथम की पत्नी चाँदबीबी को यहाँ कैद किया गया था। बजाजी निंबालकर को भी इसी जगह पर रखा गया था। स्वराज्य के विस्तार के दौरान शिवाजी महाराज ने जुलाई 1673 से इस किले पर शासन किया। स्वास्थ्य बिगड़ने पर शिवाजी महाराज यहाँ दो महीने रहे भी थे। परन्तु शिवाजी महाराज की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के बाद, औरंगजेब ने 1682 में महाराष्ट्र पर आक्रमण किया।

औरंगजेब ने 1699 में किले को घेर लिया। प्रयागजी प्रभु उस समय किले के प्रमुख थे। युद्ध आगे बढ़ा और सुभंजी ने 1700 को किला हाथों में ले लिया। फिर मुगलो को किले को हासिल करने में साढ़े चार महीने लग गए। किले पर कब्ज़ा करने पर उन्होंने किले को ‘आज़मतारा’ नाम दिया।

तारा – रानी सेना फिर से इस किले जीता और फिर से ‘अजिंक्यतारा’ नाम रख दिया। मुगलो ने फिर किले पर कब्ज़ा किया। 1708 में छत्रपति शाहू महाराज ने द्रऋह द्वारा किले को वापस ले लिया और खुद को किले का शासक घोषित कर दिया। 1719 में, छत्रपति शाहू महाराज की माता ‘मातोश्री येसूबाई ‘, को यहाँ पर लाया गया था। बाद में यह किला पेशवाओं को विरासत में मिला। शाहू – द्वितीय की मौत के बाद, ब्रिटिश सेना ने 11 फ़रवरी 1818 को इस किले पर कब्जा कर लिया।

इस किले को हम यातेश्वर पहाड़ी से भी देख सकते हैं, जो की यहाँ से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। इस किले की चोटी से हम पुरे सतारा शहर का नज़ारा देख सकते हैं। सतारा की तरफ से जाने पर किले के दो प्रवेश द्वार हैं। एक प्रवेश द्वार अच्छी अवस्था में है। दोनों गढ़ अभी भी मौजूद हैं। प्रवेश द्वार के दाईं ओर एक हनुमान मंदिर है।

किला शहर में स्थित होने के कारण किले तक पहुँचने के लिए कई तरीके हैं। सतारा स्टेशन से बस के माध्यम अदालत वाडा से गुजरने वाली बस लेने पर अदालत वडा उतर सकते है। सतारा शहर भी सदका मार्ग, से आसानी से पहुंचा जा सकता हैं।


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