भगवान धन्वंतरि |धनतेरस पूजा विधि |Lord Dhanvantari History In Hindi

भगवान धन्वंतरि Dhanvantari

धन्वंतरि (Dhanvantari) जो की संपूर्ण भारतवर्ष मे आयुर्वेद के देवता माने जाते है, उन्हे आरोग्य देवता के नाम से भी पुकारा गया है उन्होने मानव कल्याण के लिए मनुष्य के रूप मे धरती पर अवतार लिया, उनके औषधि-ज्ञान की प्रशंसा मे भी मिलती है, प्रतिवर्ष दीपावली से दो दिन पहले कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन उनकी समृीति मे ‘धन्वंतरि दिवस’ संपूर्ण भारत मे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, इस दिन केवल वैद समुदाय ही नही, अपितु जन-जन उनकी आराधना ‘आरोग्य-देव’ के रूप मे करता है,

धन्वंतरि के जन्म के विषय मे कई कथाएँ प्रचलित है, उनमे से प्रमुख दो कथाएँ इस प्रकार है।

प्रथम कथा के अनुसार देवताओ और दानव द्वारा मिलकर किए गए समुंद्र मंथन से निकले चौदह रत्नो मे एक रत्न धन्वंतरि भी थे, जो विष्णु और भगवान शिव के कृपापात्र माने जाते हैं तथा जिन्हे दो बातों का ज्ञान प्राप्त था

  1. स्वस्थ रहकर दीर्घ आयु प्राप्ति का ज्ञान और
  2. रोगो का रोकथाम और उनके उपचार का पूर्ण ज्ञान,

दूसरी कथा के अनुसार एक बार ऋषि गलवान पूजा के लिए एक विशेष प्रकार के कुशा (घास) को सारे वन मे ढूँढने के बाद असफल हो गए, अंत मे वे भूख-प्यास से बुरी तरह तक गए और प्यास बुझाने के लिए जल न मिलने पर उनका गला सूखने लगा, जंगल के बाहर आने पर संयोग से उन्हे वैश्य जाती की एक वीरभाद्रा नामक युवती जल से भरा घड़ा ले जाती हुई दिखाई दी, जिसने उनके माँगने पे उन्हे पिलाया, जल पीकर ऋषि प्रसन्न होकर उस युवती को आशीर्वाद दिया – ‘ भगवान तुम्हे ऐसा पुत्र देंगे, जिसके ज्ञान प्रकाश से समस्त संसार प्रकाशमान होगा’

इस आशीर्वाद से युवती बड़ी चिंतित हुई, क्यूंकी वो कुँवारी थी, उसने अपने चिंता का कारण ऋषि को बताया, तब ऋषि गलवान युवती वीरभाद्रा को अपने आश्रम मे ले गए, और आश्रम मे उन्होने घास का एक पुतला बनाकर उसकी गोद मे डाल दिया और आयुर्वेद के महान ग्याता धन्वंतरि का स्मरण कर मंत्र पड़ने लगे, कुछ समय बाद घास का पुतला एक बालक का रूप धारण कर लिया, इस प्रकार धन्वंतरि संसार मे आवर्तित हुए, ज़्यादातर पौराणिक एवं भागवत धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुंद्र से अवतीर्ण हुए थे, अन्य कई ग्रंथो के अनुसार देवराज इंद्र ने ब्रह्मा द्वारा विरचित आयुर्वेद का अश्विनो कुमारों से अध्ययन किया था व व्याधियो की रोकथाम के लए धन्व नामक देवता को पृथ्वी पर भेजा था, उन्होने आयुर्वेद विषय से संबंधित सफल अन्वेषन किए और पूर्व मे ग्यात आयुर्वेद ज्ञान को बोधगम्य बनाया, इसी कारण उन्हे आयुर्वेद का प्रवर्तक माना गया, भारत मे अवतरित होकर यह धन्व ही धन्वंतरि बन गए,

धन्वंतरि का स्थान हमारे काल्पनिक ईश्वर का है, कविराज रात्नकर शास्त्री ने लिखा है — ‘अपने ज्ञान और सकती द्वारा संसार की सेवा करना ही उनके वंश का अखंड वृत रहा, इस वृत को पूर्ण करने मे भगवान धन्वंतरि ने सिद्धि को प्रकस्ता तक पहुँचा दिया और इसलिए भारतीयो ने अपनी भावना का सबसे उच्च सम्मान किया, तब से लेकर आज तक वे भारतीयो के लिए भगवान समान पूजनीय हो गए हैं’

भगवान धन्वंतरी हर प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलाते हैं अत: धनतेरस के दिन किसी भी प्रकार की व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को धन्वंतरी स्तोत्र का पूरी श्रद्धा से पाठ करना चाहिए।

धन्वंतरी मंत्र

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधिदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढ़दावाग्निलीलम॥

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