विश्वनाथ प्रताप सिंह की जीवनी | V P Singh Biography In Hindi

V P Singh / श्री वी.पी सिंह एक भारतीय राजनेता और भारत के सातवे प्रधानमंत्री (Prime Minister) थे। उनका कार्यकाल 1989 से 1990 के बीच था। इससे पहले वे (1980-82) तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे थे।

विश्वनाथ प्रताप सिंह की जीवनी | V P Singh Biography In Hindiवी.पी सिंह की जीवनी – Vishwanath Pratap Singh Biography In Hindi 

श्री वी.पी सिंह का जन्म 25 जून 1931 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। वह राजपूत घराने से संबंध रखते थे। इनके पिता भगवती प्रसाद सिंह अथाह धन-संपदा वाले व्यक्ति थे। उन्होंने भी भारतीय राजनीति में सक्रिय रुप से भाग लिया। वी.पी सिंह का पूरा नाम विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) है। जब विश्वनाथ 5 वर्ष के हुए तो गोपाल सिंह नामक व्यक्ति ने उन्हें गोद ले लिया। विश्वनाथ 10 वर्ष के हुए तो गोपाल जी का स्वर्गवास हो गया इसलिए वे अपने घर वापस लौट आएं।

विश्वनाथ जी बचपन से ही बुद्धिमान, प्रतिभावान और संयमित प्रकृति के व्यक्ति थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा देहरादून, इलाहाबाद और बनारस के प्रसिद्ध स्कूलों में संपन्न हुई। मैट्रिक व इंटर की परीक्षा अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.ए की डिग्री प्राप्त की और फिर वहीं से बाद में उन्होंने L.L.B भी की। उस दौरान विज्ञान विषय अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर था। अतः परमाण्विक पदार्थ शास्त्रज्ञ बनने की दृढ़ इच्छा उन्हें पुणे की ओर खींच ले गई। पुणे जाने के बाद विश्वनाथ जी ने बी.एससी की परीक्षा प्रथम श्रेणी के अंको के साथ पास की।

विश्वनाथ जी की पढ़ाई के साथ-साथ अन्य विषयों जैसे साहित्य, कला आदि में भी विशेष रुचि थी। विद्यालय में भी वह अपने सहपाठियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उन्हें रंग-बिरंगी छठा बिखेरती चित्रकारी के साथ-साथ संगीत की स्वर लहरियों में भी सिद्धहस्त्ता हासिल थी। विश्वनाथ जी एक चित्रकार के साथ-साथ एक लेखक के रूप में भी काफी लोकप्रिय थे। वह वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज के स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने अपनी राजनीतिक जीवनी ‘दि लोनली प्रोफेट’ भी लिखी है, जो बहुत प्रसिद्ध है।

25 जून, 1955 को 24 वर्ष की आयु में विश्वनाथ प्रताप सिंह का विवाह सीता कुमारी नामक कन्या से हुआ। ईश्वरीय कृपा से उन्हें दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनके नाम अजय और अभय हैं। दोनों ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं और अपने-अपने क्षेत्रों बहुत लोकप्रिय भी है। श्रीमती सीता कुमारी भी शाही राजघराने से संबंध रखती थी। इसी वजह से पति विश्वनाथ से सामंजस्य स्थापित करने में उन्हें कोई कठिनाई पेश न आई। वह हमेशा पति की छाया बनकर उनके साथ-साथ रही। उन्होंने सुख-दुख में साथ दिया।

राजनैतिक जीवन –

मांडा के राजा विश्वनाथ जी जन्मजात नेता रहे। उन्हें राजघराने का शाही अंदाज कभी पसंद ही न आया। जब वह आचार्य विनोबा भावे भूदान हेतु एक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे तो उन्हें विश्वनाथ जी ने इलाहाबाद के पासना गांव की निजी भूमि दान स्वरूप में दे दी। सभी ने उन्हें बहुत समझाया, मगर वे अपने फैसले से हटे नहीं इतना तो वही व्यक्ति कर सकता है जो मोह-माया के बंधन में जकड़ा हुआ न हो। वह अपना सबकुछ दान करने के बाद ही मुस्कुराते रहें।

लाल बहादुर शास्त्री का विश्वनाथ जी से गहरा लगाव था। वे विश्वनाथ जी को अपने पुत्र की तरह ही स्नेह करते थे। 1969 में विश्वनाथ जी ने सोरन विधानसभा सीट के लिए चुनाव लड़ा जिसमें भारी मतों से विजई हुए। उनकी बहुमुखी प्रतिभा को देखते हुए 1970 में होने कांग्रेस विधान पार्टी का प्रमुख बनाया गया।

1971 में विश्वनाथ जी ने लोकसभा में प्रवेश किया और उन्हें वाणिज्य मंत्रालय में मंत्री बना दिया गया। 1977 का वर्ष काफी गहमी-गहमी वाला रहा। इस वर्ष हुए लोकसभा के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा क्योंकि कांग्रेस पर विरोधी बादल मंडरा रहे थे। उन बादलों की घटा में बड़े-बड़े दिग्गज नेताओं की लोकप्रियता सिमट कर रह गई।

1980 में वे फिर लोकसभा के लिए चुनाव लिए गए और इस दौरान उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद प्राप्त हुआ। अपने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए विश्वनाथ जी ने अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। अपने कार्यालय के दौरान उन्हे ऐसी विषम स्थिति का सामना करना पड़ा कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

1983 में विश्वनाथ जी को वाणिज्य मंत्रालय सौंप दिया गया। 1984 का वर्ष भारत वर्ष के लिए भारी उथल-पुथल वाला रहा। इस वर्ष देश के लोकप्रिय नेता इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षको ने मिलकर हत्या कर दी। उनकी हत्या से सारा देश स्तब्ध रह गया। इंदिराजी विश्वनाथजी पर बहुत विश्वास करती थी, लेकिन राजीव जी के आने के बाद यह विश्वसनीयता धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई। 1984 से लेकर 1987 तक विश्वनाथ जी ने राजीव जी के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त, वाणिज्य एवं रक्षा मंत्री के पदों पर कार्य किया।

11 अप्रैल, 1987 को उन्होंने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। राजीव जी व विश्वनाथ जी की लड़ाई अधिकारों की लड़ाई थी। विश्वनाथ जी के जन-जागरण आंदोलन ने लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

प्रधानमंत्री का पदभार –

कांग्रेस के विकल्प के रुप में कई विपक्षी दलों से मिलकर बने संघ ‘जनमोर्चा’ ने कमान थामी। इसके बाद 1989 के चुनाव में सिंह की वजह से ही बीजेपी राजीव गाँधी को गद्दी से हटाने में सफल रही थी।  राजीव जी की सरकार के गिरने के बाद विश्वनाथ जी को नया प्रधानमंत्री बनाया गया। 2 दिसंबर, 1989 को विश्वनाथ जी ने राष्ट्रपति भवन में स्वतंत्र भारत के सातवे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।  प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद राष्ट्र के नाम पर संदेश में उन्होंने कहा —
‘पंजाब, जम्मू-कश्मीर व राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद जैसी समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया जाएगा। बहुत सी अनुसूचित व जनजातियों के लोग निराश्रित है, उनको संपूर्ण जीवन जीने का अधिकार देना हमारा प्रमुख ध्येय होगा।

विश्वनाथ जी एक निडर राजनेता थे, दुसरे प्रधानमंत्रीयो की तरह वे कोई भी निर्णय लेने से पहले डरते नही थे बल्कि वे निडरता से कोई भी निर्णय लेते थे और ऐसा ही उन्होंने लालकृष्ण आडवानी के खिलाफ गिरफ़्तारी का आदेश देकर किया था। प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार का भी विरोध किया था।

निधन –

आज विश्वनाथ जी हमारे बीच नहीं है। 27 नवंबर, 2008 को 77 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हो चुका है। एक समाज सेवक के रूप में देश-सेवा के अपने कर्तव्य का उन्होंने भली-भांति निर्वाह किया। अपने देश-प्रेम की भावना के लिए वह हमेशा देशवासियों को याद आते रहेंगे।


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