फ्रांसिस ज़ेवियर या संत जेवियर का इतिहास | St Francis Xavier History in Hindi

Saint Francis Xavier / फ्रांसिस ज़ेवियर या संत जेवियर 15 सदी के कैथोलिक धर्म प्रचारक थे। कैथोलिक संप्रदाय के लोग संत फ्रांसिस जेवियर का नाम आदर और सम्मान से लेते हैं। अलौकिक चमत्कारी शक्तियों के कारण संत जेवियर विख्यात थे। संत जेवियर ने केवल दस वर्ष के अल्प मिशनरी समय में 52 भिन्न भिन्न राज्यों में यीशु मसीह का प्रचार किया। कहा जाता है, उन्होंने नौ हजार मील के क्षेत्र में घूम घूमकर प्रचार किया और लाखों लोगों को यीशु मसीह का शिष्य बनाया।

फ्रांसिस ज़ेवियर या संत जेवियर का इतिहास | St Francis Xavier History in Hindi

संत जेवियर का इतिहास – St Francis Xavier History & Biography in Hindi

फ्रांसिस ज़ेवियर का जन्म 7 अप्रैल, 1506 ई. को स्पेन के एक राजघराने में हुआ था। उनका वास्तविक नाम ‘फ्रांसिस्को द जेवियर जासूस था, लेकिन उन्होंने घर त्यागकर कैथोलिक धर्म का प्रचार करने का दृढ़ निश्चय कर लिया और धर्म प्रचारक होने के कारण उनका नाम संत फ्रांसिस हो गया।

संत फ्रांसिस जेवियर, संत से पहले एक सिपाही थे। वे इग्नाटियस लोयोला के छात्र थे। इग्नाटियस लोयोला जीसस के आदेशों के संस्थापक थे। बताया जाता है कि पुर्तगाल के राजा जॉन थर्ड और उस वक्त के पोप ने जेसुइट मिशनरी बनाकर फ्रांसिस जेवियर को धर्म के प्रचार के लिए भारत भेजा था। उस समय गोवा में पुर्तगाल का अधिकार था। उन्होंने पूर्व की जोखिम भरी समुद्री यात्रा 1551 से आरंभ की। इस यात्रा के दौरान वे मोजाविक, मालिंदी (केन्या), सोक्रेता होते हुए गोवा पहुंचे थे। ओल्ड गोवा को अपना स्थायी निवास स्थान बनाकर काफी समय तक आसपास के क्षेत्रों में धर्म प्रचार किया।

गोवा में मिशनरी कार्य करने के बाद वे मद्रास तथा त्रावणकोर गए। यहाँ मिशनरी कार्य करने के उपरांत वे 1545 ई. में मलाया प्रायद्वीप में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए रवना हो गए। उन्होंने तीन वर्ष तक धर्म प्रचारक (मिशनरी) कार्य किया। मलाया प्रायद्वीप में एक जापानी युवक से जिसका नाम हंजीरो था, उनकी मुलाकात हुई। सेंट जेवियर के उपदेश से यह युवक प्रभावित हुआ। 1549 ई. में सेंट ज़ेवियर इस युवक के साथ पहुँचे। जापानी भाषा न जानते हुए भी उन्होंने हंजीरों की सहायता से ढाई वर्ष तक प्रचार किया और बहुतों की खिष्टीय धर्म का अनुयायी बनाया।

जापान से वे 1552 ई. में गोवा लौटे और कुछ समय के उपरांत चीन पहुँचे। प्रचार के दौरान ही संत की मृत्यु 3 दिसंबर, 1552 को सांकियान द्वीप (चीन) में हो गई। बाद में मृत शरीर को कॉफिन में रखकर मलक्का ले जाया गया। ऐसा कहा जाता है कि जेवियर ने मृत्यु से पहले शिष्यों को उनका शव गोवा में दफनाने को कहा था। जिसके बाद फ्रांसिस जेवियर की इच्छा के मुताबिक उनका पार्थिव गोवा में दफनाया गया, लेकिन कुछ सालों बाद रोम से आए संतों के डेलिगेशन ने उनके शव को कब्र से बाहर निकालकर फ्रांसिस जेवियर चर्च में दोबारा दफनाया। ऐसा कहा जाता है कि कुल तीन बार उनके शव को दफनाया गया। पर हर बार संत का शरीर उसी ताजा अवस्था में था जैसे उन्हें पहले दफनाया गया था। यह कहानी भी प्रचलित है कि संत के शरीर में दिव्य शक्तियां हैं।

संत फ्रांसिस जेवियर से जुडी प्रचलित कथा और जानकारी – Saint Francis Xavier Story

संत फ्रांसिस जेवियर की डेड बॉडी आज भी बेसिलिका ऑफ बॉम (Bom Basilica Church) जीसस के चर्च में रखी है। गोवा के जर्नलिस्ट फ्रेडी अल्मेडा के मुताबिक, हर 10 साल में ये बॉडी दर्शन के लिए रखी जाती है। 2014 में आखिरी बार इस बॉडी को दर्शन के लिए निकाला गया था। बॉडी को कांच के एक ताबूत में रखा गया है। आज भी ये बॉडी सड़ी नहीं है।

संत की बॉडी को लेकर कहानी प्रचलित है कि मृत्यु के पहले संत फ्रांसिस जेवियर ने अपना हाथ अपनी दिव्य शक्तियों के जरिए शरीर से अलग किया था। यह हाथ उन्होंने अपनी पहचान के तौर पर रोम से आने वाले संतों के डेलिगेशन के लिए रखा था। इसके साथ उन्होंने एक चिट्ठी भी शिष्यों को दी थी। आज भी यह अलग हुआ हाथ चर्च में ही मौजूद है।

संत के मृत शरीर को कई बार अंग-भंग किया जा चुका है। 1553 में जब एक सेवक उनके मृत शरीर को सिंकियान से मलक्का ले जा रहा था तो जहाज के कप्तान को प्रमाण देने के लिए उनके घुटने का मांस नोंच लिया। 1554 में एक पुर्तगाली महिला यात्री ने उनकी एड़ी का मांस काटकर स्मृति के रूप में उनके पवित्र अवशेष अपने साथ पुर्तगाल ले गई। संत के पैर की एड़ी अलग हो गई, जिसे वेसिलिका के ‘ऐक्राइटी’ में एक क्रिस्टल पात्र में रखा गया। 1695 में संत की भुजा के भाग को रोम भेजा गया, जिसे ‘चर्च ऑफ गेसू’ में प्रतिष्ठित किया गया। बाएं हाथ का कुछ हिस्सा 1619 में जापान के ‘जेसुएट प्रॉविंस’ में प्रतिष्ठित किया गया। पेट का कुछ भाग निकालकर विभिन्न स्थानों पर स्मृति अवशेष के लिए भेजा गया।


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