संत नामदेव जी की जीवनी, इतिहास | Sant Namdev History in Hindi

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Sant Namdev / संत नामदेव जी भारत के प्रसिद्ध संत हैं। संत नामदेवजी का महाराष्ट्र में वही स्थान है, जो भक्त कबीरजी अथवा सूरदास का उत्तरी भारत में है। उनका सारा जीवन मधुर भक्ति-भाव से ओतप्रोत था। वह संप्रदाय भक्ति की अभिव्यक्ति एवं धार्मिक व्यवस्था में जाति बंधन से मुक्ति के लिए जाने जाते हैं। नामदेव ने कई अभंग लिखे, जिनमें भगवान के प्रति उनके समर्पण की अभिव्यक्ति है।

संत नामदेव जी की जीवनी, इतिहास | Sant Namdev History in Hindi

संत नामदेव का संक्षिप्त परिचय – Sant Namdev Information in Hindi

नाम संत नामदेव (Sant Namdev)
पिता का नाम दामा सेठ
माता का नाम गोनई
जन्म दिनांक 26 अक्टूबर, 1270
जन्म स्थान महाराष्ट्र
मृत्यु 1350 ई
दर्शन वारकरी संप्रदाय
पत्नी रजाई

कहा जाता है कि संत नामदेव जब बहुत छोटे थे तभी से भगवान की भक्ति में डूबे रहते थे। बाल -काल में ही एक बार उनकी माता ने उन्हें भगवान विठोबा को प्रसाद चढाने के लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ के आगे भगवान को स्वयं प्रसाद ग्रहण करने आना पड़ा।

संत नामदेव का संपूर्ण जीवन मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा। मूर्ति पूजा, कर्मकांड, जातपात के विषय में उनके स्पष्ट विचारों के कारण हिन्दी के विद्वानों ने उन्हें कबीरजी का आध्यात्मिक अग्रज माना है। संत नामदेवजी ने पंजाबी में पद्य रचना भी की। भक्त नामदेवजी की बाणी में सरलता है। वह ह्रदय को बाँधे रखती है। उनके प्रभु भक्ति भरे भावों एवं विचारों का प्रभाव पंजाब के लोगों पर आज भी है।

संत नामदेव जीवनी – Sant Namdev Life History & Biography in Hindi

श्री नामदेव का जन्म 26 अक्टूबर 1270 को हुआ। उनके पिता का नाम दामा सेठ और उनकी माता का नाम गोनई था। इतिहासकारो के अनुसार नामदेव का जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले के कराड के पास नरसी वामनी ग्राम या मराठवाडा के परभणी में हुआ था। जबकि कुछ लोगो का मानना है की उनका जन्म महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ, क्योकि उनके पिता भगवान विट्ठल के भक्त थे। पंढरपुर में भगवान कृष्णा को विट्ठल के रूप में पूजा जाता है।

नामदेवजी का विवाह कल्याण निवासी राजाई (राजा बाई) के साथ हुआ था और इनके चार पुत्र थे। श्री नामदेव जी की बड़ी बहन का नाम आऊबाई था। संत नामदेवजी ने विसोबा खेचर को गुरु के रूप में स्वीकार किया था। विसोबा खेचर का जन्म स्थान पैठण था, जो पंढरपुर से पचास कोस दूर “ओंढ्या नागनाथ” नामक प्राचीन शिव क्षेत्र में हैं। इसी मंदिर में इन्होंने संत शिरोमणि श्री नामदेवजी को शिक्षा दी और अपना शिष्य बनाया। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे और उम्र में उनसे 5 साल बड़े थे।

उन्होंने बह्मविद्या को लोक सुलभ बनाकर उसका महाराष्ट्र में प्रचार किया तो संत नामदेवजी ने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक उत्तर भारत में ‘हरिनाम’ की वर्षा की। कहा जाता है की पंजाब के गुरदासपुर जिले के घुमन ग्राम में उन्होंने 20 साल से भी ज्यादा समय व्यतीत किया था। पंजाब में सिक्ख समुदाय के लोग उन्हें नामदेव बाबा के नाम से जानते थे।

Bhagat Namdev – भक्त नामदेवजी के महाप्रयाण से तीन सौ साल बाद श्री गुरु अरजनदेवजी ने उनकी बाणी का संकलन श्री गुरु ग्रंथ साहिब में किया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 61 पद, 3 श्लोक, 18 रागों में संकलित है। वास्तव में श्री गुरु साहिब में नामदेवजी की वाणी अमृत का वह निरंतर बहता हुआ झरना है, जिसमें संपूर्ण मानवता को पवित्रता प्रदान करने का सामर्थ्य है।

संत नामदेव ने मुश्किल समय में महाराष्ट्र के लोगो को एकता के सूत्र में बांधने का भी काम किया है। पंजाब के शब्द कीर्तन और महाराष्ट्र के वारकरी कीर्तन में हमें बहुत से समानताये भी दिखाई देती है। पंजाब के घुमन में उनका शहीद स्मारक भी बनवाया गया है। उनकी याद में सिक्खों द्वारा राजस्थान में उनका मंदिर भी बनवाया गया है।

संत नामदेव में हिंदी भाषा में तक़रीबन 125 अभंगो की रचना की है। नामदेव ने भक्ति गीतों की परंपरा को प्रेरणा दी, जो महाराष्ट्र में चार सदी तक जारी तथा महान् भक्त कवि तुकाराम की रचनाओं में पराकाष्ठा तक पहुंची।

उन्होंने दो बार तीर्थ यात्रा की व साधू संतो से भ्रम दूर करते रहे। ज्यों ज्यों उनकी आयु बढती गई त्यों त्यों आपका यश फैलता गया। 50 साल की उम्र के आस-पास संत नामदेव पंढरपुर में आकर बस चुके थे, जहाँ उनके आस-पास उनके भक्त होते थे। उनके अभंग काफी प्रसिद्ध बन चुके थे और लोग दूर-दूर से उनके कीर्तन सुनने के लिए आते थे। नामदेव के तक़रीबन 2500 अभंगो को नामदेव वाची गाथा में शामिल किया गया है।

उनके गुरु देव ज्ञानेश्वर जी परलोक गमन कर गए तो कुछ समय उपराम रहने लग गए। अन्तिम दिनों में वे पंजाब आ गए। अन्त में उनकी अस्सी साल की आयु में जुलाई, 1350 को परलोक गमन कर गए।

कहा जाता है की संत नामदेव का ज्यादातर प्रभाव संत तुकाराम पर पड़ा। पंढरपुर के मंदिर में संत नामदेव को एक विशेष दर्जा दिया जाता है। हर साल लाखो भक्त पंढरपुर आकार विट्ठल भगवान और संत नामदेव के दर्शन करते है। संत नामदेव शुद्ध ह्रदय से की हुई प्रर्थना से उनके पास शक्तियाँ आ गई। वह भक्ति भव वाले हो गए और जो वचन मुँह निकलते वही सत्य होते।


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