महाराजा रणजीत सिंह की जीवनी | Maharaja Ranjit Singh History in Hindi

“शेर-ए पंजाब” नाम से प्रसिद्द महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh), सिक्ख साम्राज्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा थे। वे ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा, बल्कि अपने जीवित रहते हुए अंग्रेज़ों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं भटकने दिया। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। महाराजा रणजीत सिंह का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। 

महाराजा रणजीत सिंह की जीवनी | Maharaja Ranjit Singh History in Hindiमहाराजा रणजीत सिंह की जीवनी – Maharaja Ranjit Singh History in Hindi

12 अप्रैल, सन 1801 को रणजीत सिंह ने महाराजा की उपाधि ग्रहण की थी। गुरु नानक के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई थी। उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और 1802 में अमृतसर की ओर रूख किया। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी। ब्रिटिश इतिहासकार जे. टी. व्हीलर के अनुसार “अगर वह एक पीढ़ी पुराने होते, तो पूरे हिंदूस्तान को ही फ़तेह कर लेते।” महाराजा रणजीत सिंह पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को बहुत प्रोत्साहन दिया। उन्होंने पंजाब में क़ानून एवं व्यवस्था कायम की और कभी भी किसी को सज़ा-ए-मौत नहीं दी।

शुरुवाती जीवन – Early Life of Maharaja Ranjit Singh

Maharaja Ranjit Singh / रणजीत सिंह का जन्म 13 नवम्बर, सन 1780 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) के जट्ट सिख महाराजा महा सिंह के घर हुआ था। उन दिनों पंजाब पर सिखों और अफगानों का राज चलता था जिन्होंने पूरे इलाके को कई मिसलों में बांट रखा था। रणजीत के पिता महा सिंह सुकरचकिया मिसल के कमांडर थे। पश्चिमी पंजाब में स्थित इस इलाके का मुख्यालय गुजरांवाला में था। छोटी सी उम्र में चेचक की वजह से महाराजा रणजीत सिंह की एक आंख की रोशनी जाती रही। महज 12 वर्ष के थे जब पिता चल बसे और राजपाट का सारा बोझ इन्हीं के कंधों पर आ गया। खेलने -कूदने की उम्र में ही नन्हें रणजीत सिंह को मिसल का सरदार बना दिया गया था, और उस ज़िम्मेदारी को उन्होने बखूबी निभाया। रणजीत सिंह सिक्खों की बारह मिसलों में से एक ‘सुकर चाकिया’ से सम्बन्धित थे।

महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे। महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे।

15 वर्ष की आयु में ‘कन्हया मिसल’ के सरदार की बेटी से उनका विवाह हुआ और कई वर्ष तक उनके क्रिया-कलाप उनकी महत्त्वाकांक्षी विधवा सास सदाकौर द्वारा ही निर्देशित होते रहे। नक्कइयों की बेटी के साथ दूसरे विवाह ने रणजीत सिंह को सिक्ख रजवाड़ों (सामन्तों) के बीच महत्त्वपूर्ण बना दिया। ज़िन्दाँ रानी रणजीत सिंह की पाँचवी रानी तथा उनके सबसे छोटे बेटे दलीप सिंह की माँ थीं।

महाराजा रणजीत सिंह स्वभाव से अत्यंत सरल व्यक्ति थे। महाराजा की उपाधि प्राप्त कर लेने के बाद भी रणजीत सिंह अपने दरबारियों के साथ भूमि पर बिराजमान होते थे। वह अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता ओर समस्त धर्मों के प्रति समानता रखने की उच्च भावना के लिए प्रसिद्द थे। अपनी प्रजा के दुखों और तकलीफों को दूर करने के लिए वह हमेशा कार्यरत रहते थे। अपनी प्रजा की आर्थिक समृद्धि और उनकी रक्षा करना ही मानो उनका धर्म था। महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी  किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी।

शासन नीति – Maharaja Ranjit Singh in Hindi

आरम्भ में उनका शासन केवल एक छोटे-से भूखण्ड पर था और सैन्य बल भी सीमित था। 1793 ई. से 1798 ई. के बीच अफ़ग़ान शासक जमानशाह के निरन्तर आक्रमणों के फलस्वरूप पंजाब में इतनी अराजकता फैल गई कि उन्नीस वर्षीय रणजीत सिंह ने 1799 ई. के जुलाई मास में लाहौर पर अधिकार कर लिया और जमानशाह ने परिस्थितिवश उनको वहाँ का उपशासक स्वीकार करते हुए राजा की उपाधि प्रदान की। 1798 – 1799 ई. में अफ़ग़ानिस्तान के शासक ‘जमानशाह’ ने पंजाब पर आक्रमण किया। वापस जाते हुए उसकी कुछ तोपें चिनाब नदी में गिर गयीं। रणजीत सिंह ने उन्हें निकलवा कर उसके पास भिजवा दिया। इस सेवा के बदले जमानशाह ने रणजीत सिंह को लाहौर का शासक नियुक्त किया तथा राजा की उपाधि प्रदान की।

रणजीत सिंह ने कुछ सिक्ख मिसलों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयत्न किया। 1805 ई. में उन्होंने अमृतसर एवं जम्मू पर अधिकार कर लिया। अब पंजाब की राजनीतिक राजधानी (लाहौर) तथा धार्मिक राजधानी (अमृतसर), दोनों ही उनके अधीन आ गयी थीं। इस समय तक फ्राँस का नेपोलियन अपने चरमोत्कर्ष पर था, अतः उसका प्रभाव भारत पर न पड़े, इसके लिए तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड मिंटों ने पंजाब, ईरान व अफ़ग़ानिस्तान में अपने दूत भेजे। 25 अप्रैल, 1809 को ‘चार्ल्स मैटकॉफ़’ और महाराजा रणजीत सिंह के मध्य ‘अमृतसर की सन्धि’ सम्पन्न हुई। सन्धि की शर्तों के अनुसार सतलुज नदी के पूर्वी तट के क्षेत्र अंग्रेज़ों के अधिकार में आ गये। राजसभा में फ़्राँसीसी भाड़े के सैनिकों के साथ रणजीत सिंह चूंकि नेपोलियन की सत्ता कमज़ोर पड़ गयी थी, और ईरान के इंग्लैण्ड से सम्बन्ध सुधर गये थे। इसलिए इन स्थितियों में रणजीत सिंह के लिए अमृतसर की सन्धि आवश्यक हो गयी थी।

प्रशासन

रणजीत सिंह का प्रशासन भी महत्त्वपूर्ण रहा। वह निरंकुश होते हुए भी ‘खालसा’ के नाम पर शासन करते थे। उनकी सरकार को ‘सरकार खालसा’ कहा जाता था। उन्होंने गुरु नानक और गुरु गोविन्द सिंह के नाम के सिक्के चलाये, किन्तु उन्होंने गुरुमत को प्रोत्साहन नहीं दिया। उन्होंने डोगरों एवं मुसलमानों को उच्च पद प्रदान किये। फ़कीर ‘अजीजुद्दीन’ उनका विदेशमंत्री तथा दीवान ‘दीनानाथ’ उनका वितमंत्री था।

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु – Maharaja Ranjit Singh Death

भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन ७ जून, 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हे अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। सब से पहली सिख खालसा सेना संगठित करने का श्रेय भी महाराजा रणजीत सिंह को जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली।

कोहिनूर और रणजीत सिंह – Kohinoor and Maharaja Ranjit Singh

सन 1812 में जब पंजाब पर महाराजा रणजीत सिंह का शासन था, उस समय उन्होंने कश्मीर के सूबेदार अतामोहम्मद के शिकंजे से कश्मीर को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया। इस अभियान से भयभीत होकर अतामोहम्मद कश्मीर छोड़कर भाग गया। कश्मीर अभियान के पीछे सिर्फ यही एकमात्र कारण नहीं था। दरअसल इसके पीछे असली वजह तो था बेशकीमती ‘कोहिनूर’ हीरा। कोहिनूर हीरा अतामोहम्मद ने महमूद शाह द्वारा पराजित अफ़ग़ानिस्तान के शासक शाहशुजा को शेरगढ़ के क़िले में कैद कर रखा था। उसे कैद खाने से आज़ाद कराने के लिए उसकी बेगम वफा बेगम ने लाहौर आकर महाराजा रणजीत सिंह से प्रार्थना की और कहा कि- “मेहरबानी कर आप मेरे पति को अतामोहम्मद की कैद से रिहा करवा दें, इस अहसान के बदले बेशकीमती कोहिनूर हीरा आपको भेंट कर दूंगी।

” शाहशुजा के कैद हो जाने के बाद वफा बेगम ही उन दिनों अफ़ग़ानिस्तान की शासिका थी। महाराजा रणजीति सिंह स्वयं चाहते थे कि वे कश्मीर को अतामोहम्मद से मुक्त करवाएं। सही वक्त आने पर महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को आज़ाद करा लिया। उनके दीवान मोहकमचंद ने शेरगढ़ के क़िले को घेरकर वफा बेगम के पति शाहशुजा को रिहा कर वफा बेगम के पास लाहौर पहुंचा दिया और अपना वादा पूरा किया।

राजकुमार खड्गसिंह ने उन्हें मुबारक हवेली में ठहराया। पर वफा बेगम अपने वादे के अनुसार कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह को भेंट करने में विलम्ब करती रही। यहाँ तक कि कई महीने बीत गए। जब महाराजा ने शाहशुजा से कोहिनूर हीरे के बारे में पूछा तो वह और उसकी बेगम दोनों ही बहाने बनाने लगे। जब ज़्यादा ज़ोर दिया गया तो उन्होंने एक नकली हीरा महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया, जो जौहरियों के जाँच की कसौटी पर नकली साबित हुआ। रणजीत सिंह क्रोध से भर उठे और मुबारक हवेली घेर ली गई। दो दिन तक वहाँ खाना नहीं दिया गया। वर्ष 1813 ई. की पहली जून थी, जब महाराजा रणजीत सिंह शाहशुजा के पास आए और फिर कोहिनूर के विषय में पूछा। धूर्त शाहशुजा ने कोहिनूर अपनी पगड़ी में छिपा रखा था। किसी तरह महाराजा को इसका पता चल गया। उन्होंने शाहशुजा को काबुल की राजगद्दी दिलाने के लिए गुरुग्रंथ साहब पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा की। फिर उसे ‘पगड़ी-बदल भाई’ (एक रश्म) बनाने के लिए उससे पगड़ी बदल कर कोहिनूर प्राप्त कर लिया।

पर्दे की ओट में बैठी वफा बेगम महाराजा रणजीत सिंह की चतुराई समझ गई। अब कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंच गया था और वे संतुष्ट थे कि उन्होंने कश्मीर को आज़ाद करा लिया था। उनकी इच्छा थी कि वे कोहिनूर हीरे को जगन्नाथपुरी के मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ को अर्पित करें। हिन्दू मंदिरों को मनों सोना भेंट करने के लिए वे प्रसिद्ध थे। लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी ना हो सकी।

रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् अंग्रेज़ों ने सन 1845 में सिक्खों पर आक्रमण कर दिया। फ़िरोज़पुर क्षेत्र में सिक्ख सेना वीरतापूर्वक अंग्रेज़ों का मुकाबला कर रही थी, किन्तु सिक्ख सेना के ही सेनापति लालसिंह ने विश्वासघात किया और मोर्चा छोड़कर लाहौर पलायन कर गया। इस कारण सिक्ख सेना हार गई। अंग्रेज़ों ने सिक्खों से कोहिनूर हीरा ले लिया। कुछ लोगों का कथन है कि रणजीति सिंह के पुत्र दिलीप सिंह से ही अंग्रेज़ों ने लंदन में कोहिनूर हड़पा था। कोहिनूर को 1 माह 8 दिन तक जौहरियों ने तराशा और फिर उसे रानी विक्टोरिया ने अपने ताज में जड़वा लिया।

महाराजा रणजीत सिंह को रोचक बातें (Maharaja ranjit singh ki kahani)

  • महाराजा रंजीत सिंह “महाराजा” की उपाधि थी, लेकिन वे खुद को सिंह साहब कहलवाना ज़्यादा पसंद करते थे। रणजीत सिंह ने अपने नाम के सिक्के भी जारी नहीं किये बल्कि सिक्कों पर बाबा गुरु नानक का नाम था।
  • रणजीत सिंह ने अनपढ़ होने के बावजूद ज़बानी आदेश के बजाये लिखित आदेश जारी करने का चलन शुरू किया जिसके लिए पढ़े लिखे लोग नियुक्त किए।
  • रणजीत सिंह तख़्त पर बिराजमान नहीं होते थे बल्कि वो अपनी कुर्सी पर पालथी मार कर दरबार लगाते थे। उन्होंने अपनी पगड़ी या पोशाक में कोई असाधारण चीज़ नहीं लगाई।
  • अपने दरबारियों से कहते थे, “मैं एक किसान और एक सिपाही हूँ, मुझे किसी दिखावे की ज़रूरत नहीं। मेरी तलवार ही मुझमे वो फ़र्क पैदा कर देती है जिसकी मुझे ज़रूरत है।”

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