महाराजा अग्रसेन की जीवनी, इतिहास | Maharaja Agrasen History in Hindi

मान्यता है कि महाराजा अग्रसेन (Maharaja Agrasen) अग्रवाल जाति के पितामह थे। धार्मिक मान्यतानुसार इनका जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलियुग के प्रारम्भ में आज से 5000 वर्ष पूर्व हुआ था। उन्हें उत्तर भारत में व्यापारियों के नाम पर अग्रोहा का श्रेय दिया जाता है, और यज्ञों में जानवरों को मारने से इनकार करते हुए उनकी करुणा के लिए जाने जाते है। महाराजा अग्रसेन की कर्मभूमि रही अग्रोहा में बना, अग्रोहा धाम देश के पांचवें धाम के रूप में प्रसिद्ध है।

महाराजा अग्रसेन की जीवनी, इतिहास | Maharaja Agrasen History in Hindiमहाराजा अग्रसेन की जीवनी – Maharaja Agrasen Life History in Hindi

अग्रसेन सौर वंश के एक वैश्य राजा थे जिन्होंने अपने लोगों के लिए वनिका धर्म को अपनाया था। वस्तुतः, अग्रवाल का अर्थ है “अग्रसेन के बच्चों” या “अग्रसेन के लोग”, हरियाणा क्षेत्र के हिसार के पास प्राचीन कुरु पंचला में एक शहर, जिसे अग्रसेन ने स्थापित किया था।

महाराजा अग्रसेन का जन्म स्थान और प्रारंभिक शिक्षा – 

Maharaja Agrasen / महाराजा अग्रसेन जी का जन्म अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ, जिसे अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन का जन्म लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व प्रताप नगर के राजा वल्लभ के यहाँ सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में हुआ था। वर्तमान में राजस्थान व हरियाणा राज्य के बीच सरस्वती नदी के किनारे प्रतापनगर स्थित था। राजा वल्लभ के अग्रसेन और शूरसेन नामक दो पुत्र हुये। अग्रसेन महाराज वल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनकी माता का नाम भगवती था। महाराजा अग्रसेन के जन्म के समय गर्ग ॠषि ने महाराज वल्लभ से कहा था, कि यह बहुत बड़ा राजा बनेगा। इस के राज्य में एक नई शासन व्यवस्था उदय होगी और हज़ारों वर्ष बाद भी इनका नाम अमर होगा।

इतिहास के मुताबिक इनका जन्म कलियुग के प्रारम्भ और द्वापर युग के अंतिम चरण में हुआ था, उस समय राम राज्य हुआ करते थे अर्थात राजा प्रजा के हित में कार्य करते थे। यही सिधांत को राजा अग्रसेन ने भी बढ़ाया, जिनके कारण वे इतिहास में अमर हुए। इनकी नगरी का नाम प्रतापनगर था, बाद में इन्होने अग्रोहा नामक नगरी बसाई थी, जो आज एक प्रसिद्ध स्थान हैं।

महाराजा अग्रसेन की जन्म तिथि और समय 

महाराजा अग्रसेन की जन्म तिथि और समय के बारे में कोई सटीक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं, परन्तु कहा जाता हैं उनका जन्म 3130+ संवत 2073( विक्रम संवत शुरु होने से करीब 3130 साल पहले) हुआ था।

माधवी का वरण

महाराज अग्रसेन ने नाग लोक के राजा कुमद के यहाँ आयोजित स्वंयवर में राजकुमारी माधवी का वरण किया इस स्वंयवर में देव लोक से राजा इंद्र भी राजकुमारी माधवी से विवाह की इच्छा से उपस्थित थे, परन्तु माधवी द्वारा श्री अग्रसेन का वरण करने से इंद्र कुपित होकर स्वंयवर स्थल से चले गये इस विवाह से नाग एवं आर्य कुल का नया गठबंधन हुआ।

तपस्या

कुपित इंद्र ने अपने अनुचरो से प्रताप नगर में वर्षा नहीं करने का आदेश दिया जिससे भयंकर आकाल पड़ा। चारों तरफ त्राहि त्राहि मच गई तब अग्रसेन और शूरसेन ने अपने दिव्य शस्त्रों का संधान कर इन्द्र से युद्ध कर प्रतापनगर को विपत्ति से बचाया। लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं था। तब अग्रसेन ने भगवान शंकर एवं महालक्ष्मी माता की अराधना की, इन्द्र ने अग्रसेन की तपस्या में अनेक बाधाएँ उत्पन्न कीं परन्तु श्री अग्रसेन की अविचल तपस्या से महालक्ष्मी प्रकट हुई एवं वरदान दिया कि तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध होंगे। तुम्हारे द्वारा सबका मंगल होगा। माता को अग्रसेन ने इन्द्र की समस्या से अवगत कराया तो महालक्ष्मी ने कहा, इन्द्र को अनुभव प्राप्त है। आर्य एवं नागवंश की संधि और राजकुमारी माधवी के सौन्दर्य ने उसे दुखी कर दिया है, तुम्हें कूटनीति अपनानी होगी। कोलापुर के राजा भी नागवंशी है, यदि तुम उनकी पुत्री का वरण कर लेते हो तो कोलापुर नरेश महीरथ की शक्तियाँ तुम्हें प्राप्त हो जाएंगी, तब इन्द्र को तुम्हारे सामने आने के लिए अनेक बार सोचना पडेगा। तुम निडर होकर अपने नये राज्य की स्थापना करो।

सुन्दरावती का वरण

कोलापुर में नागराज महीरथ का शासन था। राजकुमारी सुन्दरावती के स्वयंवर में अनेक देशों के राजकुमार, वेश बदलकर अनेक गंधर्व व देवता उपस्थित थे, तब भगवान शंकर एवं माता लक्ष्मी की प्रेरणा से राजकुमारी ने श्री अग्रसेन को वरण किया। दो-दो नाग वंशों से संबंध स्थापित करने के बाद महाराजा वल्लभ के राज्य में अपार सुख समृद्धि व्याप्त हुई, इन्द्र भी श्री अग्रसेन से मैत्री के बाध्य हुये।

अग्रोहा का निर्माण – अग्रोहा का इतिहास

एक नए राज्य के लिए जगह चुनने के लिए अग्रसेन ने अपनी रानी के साथ पूरे भारत में यात्रा की। अपने छोटे भाई शूरसेन को प्रतापनगर का शासन सौंप दिया। अपनी यात्रा के दौरान एक समय में, उन्हें कुछ बाघ शावक और भेड़िया शावकों को एक साथ देखे। राजा अग्रसेन और रानी माधवी के लिए, यह एक शुभ संकेत था कि क्षेत्र वीराभूमि (बहादुरी की भूमि) था और उन्होंने उस स्थान पर अपना नया राज्य पाया। ॠषि मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। अग्रोहा हरियाणा वर्तमान दिन हिसार के पास स्थित है। वर्तमान में अग्रोहा कृषि के पवित्र स्टेशन के रूप में विकसित हो रहा है, जिसमें अग्रसेन और वैष्णव देवी का एक बड़ा मंदिर है।

अठारह यज्ञ – Maharaja Agrasen ki 18 Yag

माता लक्ष्मी की कृपा से श्री अग्रसेन के 18 पुत्र हुये। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई । यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी। प्रथम यज्ञ के पुरोहित स्वयं गर्ग ॠषि बने, राजकुमार विभु को दीक्षित कर उन्हें गर्ग गोत्र से मंत्रित किया। इसी प्रकार दूसरा यज्ञ गोभिल ॠषि ने करवाया और द्वितीय पुत्र को गोयल गोत्र दिया। तीसरा यज्ञ गौतम ॠषि ने गोइन गोत्र धारण करवाया, चौथे में वत्स ॠषि ने बंसल गोत्र, पाँचवे में कौशिक ॠषि ने कंसल गोत्र, छठे शांडिल्य ॠषि ने सिंघल गोत्र, सातवे में मंगल ॠषि ने मंगल गोत्र, आठवें में जैमिन ने जिंदल गोत्र, नवें में तांड्य ॠषि ने तिंगल गोत्र, दसवें में और्व ॠषि ने ऐरन गोत्र, ग्यारवें में धौम्य ॠषि ने धारण गोत्र, बारहवें में मुदगल ॠषि ने मन्दल गोत्र, तेरहवें में वसिष्ठ ॠषि ने बिंदल गोत्र, चौदहवें में मैत्रेय ॠषि ने मित्तल गोत्र, पंद्रहवें कश्यप ॠषि ने कुच्छल गोत्र दिया। 17 यज्ञ पूर्ण हो चुके थे।

जिस समय 18 वें यज्ञ में जीवित पशुओं की बलि दी जा रही थी, महाराज अग्रसेन को उस दृश्य को देखकर घृणा उत्पन्न हो गई। उन्होंने यज्ञ को बीच में ही रोक दिया और कहा कि भविष्य में मेरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा, न माँस खाएगा और राज्य का हर व्यक्ति प्राणीमात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने क्षत्रिय धर्म को अपना लिया। अठारवें यज्ञ में नगेन्द्र ॠषि द्वारा नांगल गोत्र से अभिमंत्रित किया।

ॠषियों द्वारा प्रदत्त अठारह गोत्रों को महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रों के साथ महाराजा द्वारा बसायी 18 बस्तियों के निवासियों ने भी धारण कर लिया एक बस्ती के साथ प्रेम भाव बनाये रखने के लिए एक सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि अपने पुत्र और पुत्री का विवाह अपनी बस्ती में नहीं दूसरी बस्ती में करेंगे। आगे चलकर यह व्यवस्था गोत्रों में बदल गई जो आज भी अग्रवाल समाज में प्रचलित है।

‘एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत

महाराजा अग्रसेन ‘एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत की घोषणा की। जिसके अनुसार नगर में आने वाले हर नए परिवार को नगर में रहनेवाले हर परिवार की ओर से एक ईट और एक रुपया दिया जाएं। ईटों से वो अपने घर का निर्माण करें एवं रुपयों से व्यापार करें। इस तरह महाराजा अग्रसेन जी को समाजवाद के प्रणेता के रुप में पहचान मिली।

दरअसल यह शिक्षा महाराजा अग्रसेन को एक घटना देखने के बाद मिली थी। हुवा यूँ था की एक बार अग्रोहा में अकाल पड़ने से चारों तरफ भूखमरी, महामारी जैसे विकट संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। वहीं इस विकट समस्या का हल निकालने के लिए जब अग्रसेन महाराज अपनी वेष-भूषा बदलकर नगर का भ्रमण कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। इसी दौरान उन्होंने देखा कि एक परिवार में सिर्फ 4 लोगों का भी खाना बना था, और उस परिवार में एक मेहमान के आने पर खाने की समस्या उत्पन्न हो गई, तब परिवार के सदस्यों ने एक हल निकाला और अपनी-अपनी थालियों से थोड़ा-थोड़ा खाना निकालकर आए मेहमान के लिए पांचवी थाली परोस दी। इस तरह मेहमान की भोजन की समस्या का समाधान हो गया। इससे प्रभावित होकर अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराजा अग्रसेन ने ‘एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत की घोषणा की।

महाराजा अग्रसेन का अंतिम क्षण –

महाराजा अग्रसेन समाजवाद के प्रर्वतक, युग पुरुष, राम राज्य के समर्थक एवं महादानी थे। महाराजा अग्रसेन उन महान विभूतियों में से थे जो सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखायः कृत्यों द्वारा युगों-युगों तक अमर रहेगें। यह एक प्रिय राजा की तरह प्रसिद्द थे। इन्होने महाभारत युद्ध में पांडवो के पक्ष में युद्ध किया था।

राजा अग्रसेन ने अपने जीवन कई महान कार्य किये और एक सकुशल राज्य की स्थापना की। जीवन के अंतिम क्षण में उन्होंने अपने कार्यभार अपने जेष्ठ पुत्र विभु को सौंप दिया। और स्वयं वन में चले गए। इन्होने लगभग 100 वर्षो तक शासन किया था। इन्हें न्यायप्रियता, दयालुता, कर्मठ एवम क्रियाशीलता के कारण इतिहास के पन्नो में एक भगवान के तुल्य स्थान दिय गया हैं।

महाराजा अग्रसेन राष्ट्रीय सम्मान

Maharaja Agrasen / अग्रसेन महाराज ने अपने विचारों एवम कर्मठता के बल पर समाज को एक नयी दिशा दी। उनके कारण समाजवाद एवम व्यापार का महत्व सभी ने समझा। इसी कारण भारत सरकार ने 24 सितम्बर 1976 को सम्मान के रूप में 25 पैसे के टिकिट पर महाराज अग्रसेन की आकृति डलवाई। भारत सरकार ने 1995 में जहाज लिया जिसका नाम अग्रसेन रखा गया था।

अग्रसेन जयंती – Maharaja Agrasen Jayanti in Hindi

अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराजा अग्रेसन जी के जन्मदिवस को जयंती के रुप में धूमधाम से मनाया जाता है। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा अर्थात नवरात्रि के पहले दिन अग्रसेन जयंती के रुप में मनाया जाता है। वैश्य समाज के अंतर्गत अग्रवाल समाज के साथ जैन, महेश्वरी, खंडेलवाल आदि भी आते हैं। पूरा समाज एकत्र होकर इस जयंती को मनाता हैं। इस शुभ दिन के औसर पर महा रैली निकाली जाती हैं। अग्रसेन जयंती के पंद्रह दिन पूर्व से समारोह शुरू हो जाता हैं। समाज में कई नाट्य नाटिका एवम प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता हैं।


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2 thoughts on “महाराजा अग्रसेन की जीवनी, इतिहास | Maharaja Agrasen History in Hindi”

  1. Jitendra agarwal

    सबसे पहले तोह आपको बहुत बहुत धन्यवाद

    आपकी ये पोस्ट पढ़ी मैने इसमें गोत्र 16 ओर 17 के बारे में नही बताया कृपया करके बताये।

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