हुमायूँ के मकबरे का इतिहास और जानकारी | Humayun Tomb History in Hindi

Humayun Tomb / मुगल सम्राट हुमायूँ का मकबरा दिल्ली के प्रसिद्ध दीनापनाह अर्थात् पुराने किले के पास स्थित है। इस मकबरे को हुमायूँ की याद में उनकी पत्नी हामिदा बानो बेगम द्वारा ने सन् 1571 में बनवाया था। 1993 में इस मकबरे को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया था और तभी से यह मकबरा पुरे विश्व में प्रसिद्ध है।

हुमायूँ के मकबरे का इतिहास और जानकारी | Humayun Tomb History In Hindiहुमायूँ के मकबरे का इतिहास – Humayun Tomb History in Hindi 

हुमायूँ का मकबरा (मकबरा ए हुमायूँ तुर्किश- हुमायूँ कबरी) इमारत परिसर मुगल वास्तुकला और फारसी स्थापत्य कला से प्रेरित मकबरा स्मारक है। यह नई दिल्ली के पुराने किले के निकट निज़ामुद्दीन पूर्व क्षेत्र में मथुरा मार्ग के निकट स्थित है। गुलाम वंश के समय में यह भूमि किलोकरी किले में हुआ करती थी और नसीरुद्दीन (1268-1287) के पुत्र तत्कालीन सुल्तान केकूबाद की राजधानी हुआ करती थी।

यहाँ मुख्य इमारत मुगल सम्राट हुमायूँ का मकबरा है और इसमें हुमायूँ की कब्र सहित कई अन्य राजसी लोगों की भी कब्रें हैं। यह समूह विश्व धरोहर घोषित है, एवं भारत में मुगल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है। इस मक़बरे में वही चारबाग शैली है, जिसने भविष्य में ताजमहल को जन्म दिया। यह मकबरा हुमायूँ की विधवा बेगम हमीदा बानो बेगम के आदेशानुसार और हुमायूँ के बेटे सम्राट अकबर की सहमति से 1572 में बना था।

इस धरोहर का निर्माण 1565 से 1572 ईसवी के बीच हुआ था। मक़बरा 12,000 वर्ग मीटर के चबूतरे पर बना है जिसकी उँचाई 47 मीटर है। उस समय इस मकबरे को बनाने में तक़रीबन 1.5 मिलियन रुपये लगे थे। हमायूँ मक़बरे के केन्द्रीय कक्ष की आंतरिक सज्जा बढ़िया कालीनों व गलीचों से परिपूर्ण है। मक़बरे में क़ब्रों के ऊपर एक शुद्ध श्वेत शामियाना लगा होता था और उनके सामने ही पवित्र ग्रंथ रखे रहते थे। इनके साथ ही हुमायूँ की पगड़ी, तलवार और जूते भी रखे रहते थे।

इस भवन के वास्तुकार सैयद मुबारक इब्न मिराक घियाथुद्दीन एवं उसके पिता मिराक घुइयाथुद्दीन थे जिन्हें अफगानिस्तान के हेरात शहर से विशेष रूप से बुलवाया गया था। मुख्य इमारत लगभग आठ वर्षों में बनकर तैयार हुई और भारतीय उपमहाद्वीप में चारबाग शैली का प्रथम उदाहरण बनी। यहां सर्वप्रथम लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था।

इस मकबरे में हुमायूँ की कब्र के अलावा उसकी बेगम हमीदा बानो तथा बाद के सम्राट शाहजहां के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह और कई उत्तराधिकारी मुगल सम्राट जहांदर शाह, फर्रुख्शियार, रफी उल-दर्जत, रफी उद-दौलत एवं आलमगीर द्वितीय आदि की कब्रें स्थित हैं। इसलिए इसे मुगलो का कब्रिस्तान के नाम से भी जाना जाता हैं।

इस इमारत में मुगल स्थापत्य में एक बड़ा बदलाव दिखा, जिसका प्रमुख अंग चारबाग शैली के उद्यान थे। ऐसे उद्यान भारत में इससे पूर्व कभी नहीं दिखे थे और इसके बाद अनेक इमारतों का अभिन्न अंग बनते गये। ये मकबरा मुगलों द्वारा इससे पूर्व निर्मित हुमायुं के पिता बाबर के काबुल स्थित मकबरे बाग ए बाबर से एकदम भिन्न था। बाबर के साथ ही सम्राटों को बाग में बने मकबरों में दफ़्न करने की परंपरा आरंभ हुई थी। अपने पूर्वज तैमूर लंग के समरकंद (उज़्बेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित ये इमारत भारत में आगे आने वाली मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ये स्थापत्य अपने चरम पर ताजमहल के साथ पहुंचा।

हुमायूँ को उसकी मृत्यु के बाद दिल्ली में ही दफ़नाया गया, और इसके बाद में हुमायूँ को 1558 में खंजरबेग द्वारा पंजाब के सरहिंद ले जाया गया। कालांतर में 1571 में मुग़ल सम्राट अकबर ने अपने पिता की समाधि के दर्शन किये थे।

20 वीं शताब्दी में लॉर्ड कर्ज़न ने इसमें कई सुधार करवाए। 1903 – 09 के बीच इस मकबरे के परिसर के जीर्णोद्धार के लिए एक परियोजना आयी। 1947 में भारत के विभाजन के समय शरणार्थियों ने दिल्ली का पुराना किला और हुमायूँ के मकबरे को अपना आश्रय समझ लिया था। बाद में भारत सरकार ने इस पर नियंत्रण किया। 2003 में इसे जीर्णोद्धार किया गया। समय – समय पर इस परिसर में बदलाव भी हुए।

हुमायूँ के मकबरे की बनावट – Humayun Tomb Architecture in Hindi

यह मक़बरा फ़ारसी वास्तुकला से प्रभावित है, यह 47 मीटर ऊँचा और 200 फीट चौड़ा है। इस इमारत पर फ़ारसी बल्बुअस गुम्बद बना है, जो सर्वप्रथम सिकन्दर लोदी के मक़बरे में देखा गया था। गुम्बद दोहरी पर्त में बना है, बाहरी पर्त के बाहर श्वेत संगमरमर का आवरण लगा है, और अंदरूनी पर्त गुफ़ा रूपी बनी है।

गुम्बद के शुद्ध और निर्मल श्वेत रूप से अलग शेष इमारत लाल बलुआ पत्थर की बनी है, जिस पर श्वेत और काले संगमरमर तथा पीले बलुआ पत्थर से पच्चीकारी का काम किया गया है। यह गुम्बद 42.5 मीटर के ऊँचे गर्दन रूपी बेलन पर बना है। गुम्बद के ऊपर 6 मीटर ऊँचा पीतल का किरीट कलश स्थापित है, और उसके ऊपर चंद्रमा लगा हुआ है, जो तैमूर वंश के मक़बरों में मिलता है। इन रंगों का संयोजन इमारत को एक ख़ूबसूरती देता है।

बाहर से सरल दिखने वाली इमारत की आंतरिक योजना कुछ जटिल है। इसमें मुख्य केन्द्रीय कक्ष सहित नौ वर्गाकार कक्ष बने हैं। इनमें बीच में बने मुख्य कक्ष को घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। मुख्य कक्ष गुम्बददार (हुज़रा) एवं दुगुनी ऊंचाई का एक-मंजिला है और इसमें गुम्बद के नीचे एकदम मध्य में आठ किनारे वाले एक जालीदार घेरे में द्वितीय मुगल सम्राट हुमायुं की कब्र बनी है। ये इमारत की मुख्य कब्र है। इसका प्रवेश दक्षिणी ओर एक ईवान से होता है, तथा अन्य दिशाओं के ईवानों में श्वेत संगमर्मर की जाली लगी हैं।

सम्राट की असली समाधि ठीक नीचे आंतरिक कक्ष में बनी है, जिसका रास्ता बाहर से जाता है। इसके ठीक ऊपर दिखावटी किन्तु सुन्दर प्रतिकृति बनायी हुई है। नीचे तक आम पर्यटकों को पहुंच नहीं दी गई है।

हुमायूँ के मकबरे के मुख्य पश्चिमी प्रवेशद्वार के रास्ते में अनेक अन्य स्मारक बने हैं। इनमें से प्रमुख स्मारक ईसा खां नियाज़ी का मकबरा है, जो मुख्य मकबरे से भी 20 वर्ष पूर्व 1547 में बना था। ईसा खां नियाज़ी मुगलों के विरुद्ध लड़ने वाला सूर वंश के शासक शेरशाह सूरी के दरबार का एक अफ़्गान नवाब था। यह मकबरा ईसा खां के जीवनकाल में ही बना था और उसके बाद उसके पूरे परिवार के लिये ही काम आया। मकबरे के पश्चिम में एक तीन आंगन चौड़ी लाल बलुआ पत्थर की मस्जिद है। यह अठमुखा मकबरा सूर वंश के लोधी मकबरे परिसर स्थित अन्य मकबरों से बहुत मेल खाता है।

हुमायूँ के मकबरे में हुमायूँ का शरीर दो अलग-अलग जगहों पर दफनाया गया है। एक इंग्लिश व्यापारी, विलियम फिंच 1611 में मकबरे को देखने आया था, उसने बाद में अपने लेख में मकबरे की आतंरिक सुन्दरता, शामियाने, कब्र और दीवारों पर की गयी कलाकृतियों के बारे में बताया। उसने लिखा है कि केन्द्रीय कक्ष की आंतरिक सज्जा आज के खालीपन से अलग बढ़िया कालीनों व गलीचों से परिपूर्ण थी। कब्रों के ऊपर एक शुद्ध श्वेत शामियाना लगा होता था और उनके सामने ही पवित्र ग्रंथ रखे रहते थे। इसके साथ ही हुमायूँ की पगड़ी, तलवार और जूते भी रखे रहते थे।

यहां पर स्थित बाग़ ज्यामिती के आधार पर बने हुए हैं। बीच से जाने वाली जल नाली मुख्य द्वार से मकबरे की तरफ जाती है। ये बाग़ ठीक उसी तरह बना हुआ है जैसे कुरान में ‘जन्नत के बाग’ के बारे में बताया गया है।

पर्यटक स्थल – Humayun Tomb Tourist Place in Hindi

अगर आप इतिहास में रूचि रखते हैं या कोई आकर्षण जगह देखना चाह रहे है तो ये प्लेस बिलकुल सही जगह हैं। हुमायूं मकबरे के पास सूफी संत निजामुद्दीन औलिया की कब्र भी बनी हुई है। हुमायूँ के मकबरे के पास बत्ताशेवाला मकबरा भी है। इन दोनों के बीच एक दीवार बनायीं गयी है। जहाँ से एक छोटा रास्ता भी निकलता है।

यह स्मारक दिन भर पर्यटकों के लिए खुला रहता है लेकिन हुमायु के मकबरे को देखने का सबसे सही समय दोपहर के बाद होता है। यहा पर जाने के लिए करीबी मेट्रो स्टेशन JLN स्टेडियम है |यहा पर भारतीयो के लिए प्रवेश शुल्क 10-20 रूपये और विदेशियों के लिए प्रवेश शुल्क 250 रूपये है। यहा पर फोटोग्राफी का कोई शुल्क नही है और वीडियोग्राफी का 25-30 रुपये शुल्क है।


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