गुंडिचा मन्दिर पूरी का इतिहास, जानकारी | Gundicha Temple History in Hindi

जगन्नाथ मंदिर के बाद, पुरी का श्री गुड़िचा मंदिर (Gundicha Temple) ही भगवान जगन्नाथ का दूसरा सबसे प्रमुख स्थान है। गुंडिचा मन्दिर को गुंडिचा घर के नाम से भी जाना जाता है, यह उड़ीसा राज्य के पुरी शहर का लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है।

गुंडिचा मन्दिर पूरी का इतिहास, जानकारी | Gundicha Temple History in Hindi

गुंडिचा मन्दिर पूरी का इतिहास – Puri Gundicha Temple History in Hindi

गुंडिचा मन्दिर भगवान जगन्नाथ मन्दिर से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कलिंग वास्तुकला में गुंडिचा मन्दिर को बनवाया गया था और भगवान जगन्नाथ की चाची गुंडिचा को समर्पित किया गया था, ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की चाची गुंडिचा का घर माना जाता है।

मान्यता है कि जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान भगवान यहाँ 9 दिन तक ठहरते हैं। जगन्नाथ मंदिर से आने वाली रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और सुभद्रा गुंडिचा मंदिर आते है, जहां उनकी चाची पादोपीठा खिलाकर उनका स्वागत करती हैं।

गुंडिचा मंदिर को जगन्नाथ स्वामी का “जन्मस्थान” भी कहा जाता है, क्योंकी यहाँ “महावेदी” नामक एक विशेष मंच पर दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने राजा इन्द्रध्युम्न की इच्छानुसार जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा के विग्रहों को दारु ब्रम्ह से प्रकट किया। यह मंदिर राजा इन्द्रध्युम्न की पत्नी, गुंडिचा महारानी के नाम पर है। इस क्षेत्र में राजा इन्द्रध्युम्न ने एक हजार अश्वमेध यज्ञ किया था।

गुंडिचा मंदिर जहां स्थित है उस स्थान कों “सुंदराचल” कहा जाता है। सुंदराचल, की तुलना वृन्दावन से की गयी है, और नीलाचल जहाँ श्री जगन्नाथ रहते हैं वह द्वारका माना जाता है। भक्त जन ब्रजवासिओं के भाव में रथयात्रा के समय प्रभु जगन्नाथ से लौटने की प्रार्थना करते हैं इसलिए प्रभु उन भक्तों के साथ वृन्दावन यानि गुंडिचा आते हैं॥

यह मंदिर रथ यात्रा महोत्सव के लिए जाना जाता है। हालांकि, इसे जगन्नाथ मंदिर के प्रशासन द्वारा अच्छी तरह रखा गया है। यह मंदिर कलिंग युग की विशिष्ट वास्तुकला को दर्शाता है। 75 फुट उच्चे और 430 फुट लंबे इस मंदिर को हल्के भूरे रंग के बलुआ पत्थर से बनाया गया है और यह मंदिर खूबसूरत उद्यान के बीच में तथा दीवारों से घिरा हुआ है।

त्योहार के दौरान, जब जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को गुंड़िचा मंदिर में लाया जाता है, तो उन्हें “रत्नवेदी” नामक सिंहासन पर बैठाया जाता है। मूर्तियां पश्चिमी द्वार से प्रवेश करती हैं और पूर्वी द्वार से बाहर जाती है।

गुंडिचा महोत्सव – Gundicha Mandir

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। यह यात्रा गुंडिचा मंदिर तक जाकर पुन: आती है। ऐसी मान्यता है कि इसी गुंडिचा मंदिर में देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्राजी की प्रतिमाओं का निर्माण किया था इसलिए गुंडिचा मंदिर को ब्रह्मलोक या जनकपुरी भी कहा जाता है। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ कुछ समय इस मंदिर में बिताते हैं। इस समय गुंडिचा मंदिर में भव्य महोत्सव मनाया जाता है। इसे गुंडिचा महोत्सव कहते हैं।


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