भद्राचला राम मंदिर और भद्राचलम का इतिहास Bhadrachalam Temple History In Hindi

Bhadrachalam / भद्राचलम भगवान श्रीराम से जुड़ा और हिन्दुओं की आस्था का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जो तेलंगाना (पूर्व आन्ध्र प्रदेश) के खम्मम ज़िले में स्थित है। यहां स्थित भद्रचला राम मंदिर जो भगवान राम और देवी सीता को समर्पित है यह भद्राचलम में लोकप्रिय स्‍थान है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार है. देवी सीता भगवान विष्णु की पत्नी, देवी लक्ष्मी का अवतार हैं।

भद्राचला राम मंदिर और भद्राचलम का इतिहास Bhadrachalam Temple History In Hindiभद्राचलम पुण्य क्षेत्र को “दक्षिण की अयोध्या” भी कहा जाता है। यह स्थान अगणित भक्तों का श्रद्धा केन्द्र है। मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहाँ राम ने पर्णकुटी बनाकर वनवास का लंबा समय व्यतीत किया था। भद्राचलम से कुछ ही दूरी पर स्थित ‘पर्णशाला’ में भगवान श्रीराम अपनी पर्णकुटी बनाकर रहे थे। यहीं पर कुछ ऐसे शिलाखंड भी हैं, जिनके बारे में यह विश्वास किया जाता है कि सीताजी ने वनवास के दौरान यहाँ वस्त्र सुखाए थे। एक विश्वास यह भी किया जाता है कि रावण द्वारा सीताजी का अपहरण भी यहीं से हुआ था।

 

पौराणिक कथाए –

किंवदंती है कि यह शहर कभी डांडाकरण्‍य जंगल का हिस्‍सा हुआ करता था। हिंदू कथाओं के अनुसार भगवान राम और देवी सीता अपने भाई लक्ष्‍मण के साथ वनवास के दौरान कुछ समय के लिए इस जंगल में रहे थे। बहुत से लोग मानते हैं कि भगवान राम के मंदिर के पास स्थित वन क्षेत्र वही है, जहां भगवान अपनी पत्‍नी और अपने भाई के साथ कुछ दिनों के लिये ठहरे थे। यह मंदिर से कुछ 32 किमी की दूरी पर है। भगवान राम ने अपने परिवार के लिए यहां एक निवास स्थान बनाया था। यह वही झोपड़ी है, जहां से रावण सीता का अपहरण करके उन्‍हें श्रीलंका ले गया था।

यहाँ के मंदिर के आविर्भाव के विषय में एक जनश्रुति वनवासियों से जुड़ी हुई है। इसके अनुसार, एक राम भक्त वनवासी महिला दम्मक्का भद्रिरेड्डीपालेम ग्राम में रहा करती थी। इस वृद्धा ने राम नामक एक लड़के को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया। एक दिन राम वन में गया और वापस नहीं लौटा। पुत्र को खोजते-खोजते दम्मक्का जंगल में पहुँच गई और “राम-राम” पुकारते हुए भटकने लगी। तभी उसे एक गुफ़ा के अंदर से आवाज़ आई कि “माँ, मैं यहाँ हूँ”। खोजने पर वहाँ सीता, राम और लक्ष्मण की प्रतिमाएँ मिलीं। उन्हें देखकर दम्मक्का भक्ति भाव से सराबोर हो गई। इतने में उसने अपने पुत्र को भी सामने खड़ा पाया। दम्मक्का ने उसी जगह पर देव प्रतिमाओं की स्थापना का संकल्प लिया और बाँस की छत बनाकर एक अस्थाई मंदिर बनाया। धीरे-धीरे स्थानीय वनवासी समुदाय ‘भद्रगिरि’ या ‘भद्राचलम’ नामक उस पहाड़ी पर श्रीराम की पूजा करने लगे। आगे चलकर भगवान ने भद्राचलम को वनवासियों-नगरवासियों के मिलन हेतु एक सेतु बना दिया।

दूसरी मान्‍यता भद्राचलम शहर से जुड़ी है, वह है भगवान विष्णु और उनके भक्त भद्रा की है। भद्रा भगवान राम के प्रबल भक्त थे जो एक ऋषि थे। सीता को बचाने के लिए श्रीलंका के लिए अपने रास्ते पर भगवान की मुलाकात बाबा से हुई।

ऋषि ने भगवान से अपने सिर पर बैठने के लिए प्रार्थना करी। हालांकि, अपनी पत्नी को बचाने के लिए जल्दी में प्रभु ने, बाबा से कहा कि, अपने वापसी के रास्ते पर वे उसकी इच्छा को पूरा करेंगे। हालांकि, यह हो नहीं सका, और ऋषि ने विष्णु के राम अवतार की एक झलक पाने के लिए भगवान विष्णु की पूजा जारी रखी।

ऐसा माना जाता है कि, भद्र की भक्ति और तपस्या से प्रभावित होकर, भगवान विष्णु पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ भगवान राम के अवतार में अपने भक्त को दिखाई दिये थे। भगवान ने अपने आने की घोषणा एक शंख को बजाते हुए दी थी।

भगवान भद्रगिरि के शीर्ष पर बैठे थे, उनकी पत्नी गोद के बाईं ओर और उनके भाई दाईं ओर। माना जाता है कि, यह घटना कई वर्ष पहले, ‘रामराज्य’ या राम के शासन के अंत के बाद हुई थी। शहर का नाम भगवान राम के इस भक्त के नाम से लिया गया है।

भद्राचला राम मंदिर का इतिहास – Bhadrachalam Temple History In Hindi

गोलकुंडा का क़ुतुबशाही नवाब अबुल हसन तानाशाह (1672-1687 ई.) था, किंतु उसकी ओर से भद्राचलम के तहसीलदार के नाते नियुक्त कंचली गोपन्ना ने कालांतर में उस बाँस के मंदिर के स्थान पर भव्य मंदिर बनाकर उस क्षेत्र को धार्मिक जागरण का महत्त्वपूर्ण केन्द्र बनाने का प्रयास किया। कर वसूली से प्राप्त धन से उसने एक विशाल परकोटे के भीतर भव्य राम मंदिर बनवाया, जो आज भी आस्था के अपूर्व केन्द्र के रूप में स्थित है। गोपन्ना ने भक्ति भाव से सीता, श्रीराम व लक्ष्मण जी के लिए कटिबंध, कंठमाला, माला एवं मुकुट मणि भी बनवा कर अर्पित की। उन्होंने राम की भक्ति में कई भqजन भी लिखे, इसी कारण लोग उन्हें रामदास कहने लगे।

रामदास विदेशी अक्रमण के ख़िलाफ़ देश में ‘भक्ति आंदोलन’ से जुड़े हुए थे। कबीर रामदास के आध्यात्मिक गुरु थे और उन्होंने रामदास को ‘रामानंदी संप्रदाय’ की दीक्षा दी थी। रामदास के कीर्तन घर-घर में गाए जाते थे और तानाशाही राज के विरोध में खड़े होने की प्रेरणा देते थे। आज भी हरिदास नामक घुमंतु प्रजाति भक्त रामदास के कीर्तन गाते हुए राम भक्ति का प्रचार करती दिखाई देती है। लेकिन रामदास का यह धर्म कार्य तानाशाह को नहीं भाया और उसने रामदास को गोलकुंडा क़िले में क़ैद कर दिया। आज भी हैदराबाद स्थित इस क़िले में वह कालकोठरी देखने को मिलती है, जहाँ रामदास को बन्दी बनाकर रखा गया था।

त्योहार –

मंदिर भद्राचलम के शहर से 35 किलोमीटर दूर स्थित है और भी अन्य हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। भगवान विष्णु, भगवान नरसिंह का दूसरा अवतार भी कहे जाते हैं और गवान शिव के साथ मंदिर में पूजा जाता है। यह मंदिर में भगवान राम के भक्तों के बीच बेहद लोकप्रिय है और हर साल इस जगह ‘रामनवमी’ के दौरान लोगों की भारी भीड़ यहां उमड़ती है।

वास्तव में, राम नवमी और दशहरा का त्योहार मंदिर में धूमधाम से मनाया जाता है। यहां चलने वाले 10 दिन के महोत्‍सव में पूरे भारत से लोग भारी तादत में अबहुत से लोग इस उत्सव में भाग लेने के लिए पूरे भारत से मंदिर में आते हैं।


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