वीर कुंवर सिंह का इतिहास, जीवनी | Veer Kunwar Singh History in Hindi

Veer Kunwar Singh in Hindi/ बाबू वीर कुंवर सिंह को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक के रूप में जाना जाता है जो 80 वर्ष की उम्र में भी लड़ने तथा विजय हासिल करने का माद्दा रखते थे। अन्याय विरोधी व स्वतंत्रता प्रेमी बाबू कुंवर सिंह कुशल सेना नायक थे। अपने ढलते उम्र और बिगड़ते सेहत के बावजूद भी उन्होंने कभी भी अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके बल्कि उनका डटकर सामना किया। वीर कुंवर सिंह जगदीशपुर के शाही उज्जैनिया राजपूत घराने से संबंध रखते थे।

वीर कुंवर सिंह का इतिहास, जीवनी | Veer Kunwar Singh History in Hindiवीर कुंवर सिंह का परिचय – Veer Kunwar Biography in Hindi

नाम कुंवर सिंह (Kunwar Singh)
जन्म दिनांक 13 नवंबर 1777
जन्म स्थान जगदीशपुर, भोजपुर बिहार
मृत्यु 26 अप्रैल 1858
मृत्यु का कारण अंग्रेजो खिलाफ लड़ते हुवे, घायल होने की वजह से 26 अप्रैल 1858 को अपनी अंतिम सांस ली।
पिता का नाम साहबजादा सिंह
माता का नाम पंचरत्न कुंवर
प्रसिद्धि के कारण भारत के एक महान योद्धा और सच्चे वीर सपूत थे, जिन्होंने 80 साल की उम्र में, अंग्रेजों को धूल छटा दी।

वीर कुंवर सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों में से एक थे। इनके चरित्र की सबसे बड़ी ख़ासियत यही थी कि इन्हें वीरता से परिपूर्ण कार्यों को करना ही रास आता था। इतिहास प्रसिद्ध 1857 की क्रांति में भी इन्होंने सम्मिलित होकर अपनी शौर्यता का प्रदर्शन किया। बाबू कुंवर सिंह ने रीवा के ज़मींदारों को एकत्र किया और उन्हें अंग्रेज़ों से युद्ध के लिए तैयार किया।

नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और बेगम हजरत महल जैसे शूरवीरो ने अपने – अपने क्षेत्रो में अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध किया। बिहार में दानापुर के क्रांतकारियो ने भी 25 जुलाई सन 1857 को विद्रोह कर दिया और आरा पर अधिकार प्राप्त कर लिया। इन क्रांतकारियों का नेतृत्व कर रहे थे वीर कुँवर सिंह।

प्रारम्भिक जीवन – Early Life of Kunwar Singh

वीर कुंवर सिंह का जन्म 1777 ई. को राजा शाहबजादा सिंह और रानी पंचरतन देवी के घर, बिहार राज्य के शाहाबाद (वर्तमान भोजपुर) जिले के जगदीशपुर में हुआ था। इनके पिता बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे। उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह एवं इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह तथा गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे तथा अपनी आजादी कायम रखने के खातिर सदा लड़ते रहे।

कुंवर सिंह बचपन से ही शिक्षा से अधिक शौर्य-युक्त कार्यों में रुचि थी। उन्होंने राजा फ़तेह नारियां सिंह (मेवारी के सिसोदिया राजपूत) की बेटी से शादी की, जो बिहार के गया जिले के एक समृद्ध ज़मीनदार और मेवाड़ के महाराणा प्रताप के वंशज भी थे। साल 1826 में पिता की मौत के बाद कुंवर सिंह को जगदीशपुर के तालुकदार बनाया गया, जबकि उनके दोनों भाई हरे कृष्णा और अमर सिंह उनके सिपहसालार बनें, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध उनका साथ दिया था।

स्वतंत्रता संग्राम – Kunwar Singh History in Hindi

बिहार के शाहाबाद में उनकी एक छोटी रियासत थी। उन पर जब कर्ज़ बढ़ गया तो अंग्रेज़ों ने रियासत का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया। उनका एजेंट लगान वसूल करता, सरकारी रकम चुकाता और रकम से किस्तों में रियासत का कर्ज़ उतारा जाता।

इस अवस्था से बाबू कुंवर सिंह असंतुष्ट थे। इसी समय ‘1857 की क्रान्ति’ आरम्भ हो गई और कुंवर सिंह को अपना विरोध प्रकट करने का अवसर मिल गया। 25 जुलाई, 1857 को जब क्रान्तिकारी दीनापुर से आरा की ओर बढ़े तो बाबू कुंवर सिंह उनमें सम्मिलित हो गए। उनके विचारों का अनुमान अंग्रेज़ों को पहले ही हो गया था। इसीलिए कमिश्नर ने उन्हें पटना बुलाया था कि उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाये। पर अंग्रेज़ों की चालाकी समझकर कुंवर सिंह बीमारी का बहाना बनाकर वहाँ नहीं गए।

आरा में आन्दोलन की कमान कुंवर सिंह ने संभाल ली और जगदीशपुर में विदेशी सेना से मोर्चा लेकर सहसराम और रोहतास में विद्रोह की अग्नि प्रज्ज्वलित की। उसके बाद वे 500 सैनिकों के साथ रीवा पहुँचे और वहाँ के ज़मींदारों को अंग्रेज़ों से युद्ध के लिए तैयार किया। वहाँ से बांदा होते हुए कालपी और फिर कानपुर पहुँचे। तब तक तात्या टोपे से उनका सम्पर्क हो चुका था। कानपुर की अंग्रेज़ सेना पर आक्रमण करने के बाद वे आजमगढ़ गये और वहाँ के सरकारी ख़ज़ाने पर अधिकार कर छापामार शैली में युद्ध जारी रखा। यहाँ भी अंग्रेज़ी सेना को पीछे हटना पड़ा।

1857 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया। उस समय बाबु कुंवर सिंह अपनी आयु के 80 साल पुरे कर चुके थे। इसी उम्र में वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लढे। मंगल पांडे की बहादुरी ने सारे देश में विप्लव मचा दिया। बिहार की दानापुर रेजिमेंट, बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने बगावत कर दी। मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी। ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया।

लगातार गिरती हुई सेहत के बावजूद जब देश के लिए लढने का सन्देश आया, तब वीर कुंवर सिंह तुरंत उठ खड़े हुए और ब्रिटिश सेना के खिलाफ लढने के लिए चल पड़े, लढते समय उन्होंने अटूट साहस, धैर्य और हिम्मत का प्रदर्शन किया था।

27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा। जब अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई। बहादुर स्वतंत्रता सेनानी जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। आरा पर फिर से कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया। बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी। अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे।

ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, ‘उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी। यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र अस्सी के करीब थी। अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता।

वीरगति – Kunwar Singh Death in Hindi

इस समय बाबू कुंवर सिंह की उम्र 80 वर्ष की हो चली थी। वे अब जगदीशपुर वापस आना चाहते थे। नदी पार करते समय अंग्रेज़ों की एक गोली उनकी ढाल को छेदकर बाएं हाथ की कलाई में लग गई थी। उन्होंने अपनी तलवार से कलाई काटकर नदी में प्रवाहित कर दी। वे अपनी सेना के साथ जंगलों की ओर चले गए और अंग्रेज़ी सेना को पराजित करके 23 अप्रैल, 1858 को जगदीशपुर पहुँचे। लोगों ने उनको सिंहासन पर बैठाया और राजा घोषित किया। परन्तु कटे हाथ में सेप्टिक हो जाने के कारण ‘1857 की क्रान्ति’ के इस महान नायक ने 26 अप्रैल, 1858 को अपने जीवन की इहलीला को विराम दे दिया।

Veer Kunwar Singh से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के ऐसे नायक थे। जिन्होंने अपनी छोटी-सी रियासत की सेना के दम पर आरा से लेकर रोहतास, कानपुर, लखनऊ, रीवां, बांदा और आजमगढ़ तक में अंगरेजी सेना से निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं और कई जगह जीत हासिल की थी।
  • कुंवर सिंह का बचपन खेल खेलने की बजाय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने में बीता था। मन जाता हैं की इन्होने मार्शल आर्ट की भी ट्रेनिंग ली थी।
  • छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद भारत में वह दूसरे महान योद्धा थे। इन्हे गोरिल्ला युद्ध नीति की भी जानकारी थी। अपनी इस नीति का उपयोग उन्होंने बार-बार अंग्रेजों को हराने के लिए किया था।
  • अपने अभियान के दौरान कुंवर सिंह ने आरा शहर और जगदीशपुर को तो आजाद कराया ही, साथ ही आजमगढ़ को भी आजाद कराया। हालांकि आजादी चंद दिनों की ही थी। मगर उनके शासन प्रबंध की लोग खूब तारीफ करते थे।
  • स्वतंत्रता संग्राम में पूरे भारत में एकमात्र शहर आरा पर, पुरे आरा शहर को बगावत के आरोप में मुकदमा चला। इसमें अभियुक्त कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा आरा शहर था। हालाँकि बाद शहर आरोप मुक्त हुवा, लेकिन 16 लोगों को फांसी दी गयी थी।
  • कुंवर सिंह पर कई किताबें लिखी गयीं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण काली किंकर दत्त द्वारा लिखित पुस्तक बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एवं अमर सिंह है।
  • कुंवर सिंह पर कई किताबें लिखी गयीं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण काली किंकर दत्त द्वारा लिखित पुस्तक बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एवं अमर सिंह है। इसके अलावे भी – कुंवर सिंह और 1857 की क्रांति नामक पुस्तक आ चुकी हैं।

Kunwar Singh Information in Hindi – FAQ

Q. 1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह की भूमिका का वर्णन

Ans – 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबू कुंवर सिंह की भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी। 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा।

Q. कुंवर सिंह ने विद्रोह का कहां पर नेतृत्व किया

Ans – दीनापुर से आरा

Q. वीर कुंवर सिंह कहां के रहने वाले थे

Ans – जगदीशपुर, भोजपुर बिहार

Q. कुंवर सिंह की मृत्यु कैसे हुई

Ans – ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ लड़ाई में इन्होने अंग्रेजो के भाड़े के सैनिकों को पूरी तरह खदेड़ दिया। उस दिन बुरी तरह घायल होने पर भी इस बहादुर ने जगदीशपुर किले से गोरे पिस्सुओं का “यूनियन जैक” नाम का झंडा उतार कर ही दम लिया। वहाँ से अपने किले में लौटने के बाद 26 अप्रैल 1858 को इन्होंने वीरगति पाई।

Q. कुंवर सिंह का कौन सा हाथ बेकार हो गया था ?

Ans – कुंवर सिंह का दाया हाथ बेकार हो चूका था।


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