सिकंदर लोधी का इतिहास, जानकारी | Sikandar Lodi History in Hindi

Sikandar Lodi / सिकंदर लोधी दिल्ली सल्तनत का दूसरा सुल्तान था। इसका मूल नाम ‘निजाम ख़ाँ’ था और यह 17 जुलाई, 1489 को ‘सुल्तान सिकन्दर शाह’ की उपाधि से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। सिकंदर लोदी की गिनती लोदी वंश सफल शासको में होती हैं। वह प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा को अपनी राजधानी बनाया।

सिकंदर लोधी का इतिहास, जानकारी | Sikandar Lodi History in Hindi

सिकंदर लोधी का इतिहास – Sikandar Lodi Information & History in Hindi

सिकंदर शाह लोदी (Sikandar Shah Lodi), सुल्तान बहलुल खान लोदी और बीबी अम्भा का पुत्र था। उसकी माँ एक स्वर्णकार हिन्दू थी। धार्मिक दृष्टि से सिकन्दर लोदी असहिष्णु था। वह विद्या का पोषक व प्रेमी था। सिकंदर के पिता बहलुल खान लोदी की मृत्यु 17 जुलाई 1489 को हुई। उसके उपरांत सिकंदर वहा का सुल्तान बना। सिकंदर के सुल्तान बनने में कठिनाई का मुख्य कारण था उनका बड़ा भाई। बारबक शाह जो तब जौनपुर का राज्यपाल था। उसने भी इस गद्दी पर अपने पिता के सिकंदर के नामांकन के बावजूद दावा किया था। परन्तु सिकंदर ने एक प्रतिनिधि मंडल भेजकर मामला सुलझा लिया और एक बड़ा खून-खराबा बचा लिया।

हालाँकि बाद में सिकन्दर लोदी ने जौनपुर को अपने अधीन करने के लिए अपने बड़े भाई ‘बारबक शाह’ के ख़िलाफ़ अभियान किया, जिसमें उसे पूर्ण सफलता मिली। जौनपुर के बाद सुल्तान सिकन्दर लोदी ने 1494 ई. में बनारस के समीप हुए एक युद्ध में हुसैनशाह शर्की को परास्त कर बिहार को दिल्ली में मिला लिया। इसके बाद उसने तिरहुत के शासक को अपने अधीन किया। राजपूत राज्यों में सिकन्दर लोदी ने धौलपुर, मन्दरेल, उतागिरि, नरवर एवं नागौर को जीता, परन्तु ग्वालियर पर अधिकार नहीं कर सका। राजस्थान के शासकों पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए तथा व्यापारिक शहर की नींव डाली।

सिकन्दर शाह लोदी गुजरात के महमूद बेगड़ा और मेवाड़ के राणा सांगा का समकालीन था। उसने दिल्ली को इन दोनों से मुक़ाबले के योग्य बनाया। उसने उन अफ़ग़ान सरदारों का दबाने की कोशिश भी की, जो जातिय स्वतंत्रता के आदी थे और सुल्तान को अपने बराबर समझते थे। लेकिन सिकन्दर लोदी को इन सरदारों को क़ाबू में रखने में अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई। अपनी मृत्यु के समय बहलोल लोदी ने अपने पुत्रों और रिश्तेदारों में राज्य बांट दिया था। यद्यपि सिकन्दर एक बड़े संघर्ष के बाद उसे फिर से एकत्र करने में सफल हुआ था।

सिकंदर लोदी एक योग्य शासक

सिकन्दर लोदी – Sikandar Lodi ने भूमि के लिए एक प्रमाणिक पैमाना ‘गज-ए-सिकन्दरी’ का प्रचलन करवाया, जो 30 इंच का था। उसने अनाज पर से चुंगी हटा दी और अन्य व्यापारिक कर हटा दिये, जिससे अनाज, कपड़ा एवं आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ सस्ती हो गयीं। सिकन्दर लोदी ने खाद्यान्न पर से जकात कर हटा लिया तथा भूमि में गढ़े हुए खज़ाने से कोई हिस्सा नहीं लिया। सिकन्दर लोदी सल्तनत काल का एक मात्र सुल्तान हुआ, जिसमें खुम्स से कोई हिस्सा नहीं लिया। उसने निर्धनों के लिए मुफ़्त भोजन की व्यवस्था करायी। उसने आन्तरिक व्यापार कर को समाप्त कर दिया तथा गुप्तचर विभाग का पुनर्गठन किया। अपने व्यक्तित्व की सुन्दरता बनाये रखने के लिए वह दाढ़ी नहीं रखता था।

सिकंदर एक योग्य शासक सिद्ध हुआ। वह अपनी प्रजा के लिये दयालु था। उसने अपने राज्य को ग्वालियर एवं बिहार तक बढाया। उसने अल्लाउद्दीन हुसैन शाह एवं उसकी बंगाल के राज्य से संधि की। सन 1503 में उसने वर्तमान आगरा शहर की नीव रखी थी। सिकंदर ने आगरा को दिल्ली के बाद भारत की दूसरी राजधानी की तरह विकसित किया। क्योकि उस समय दिल्ली से ग्वालियर जाने में बहोत ज्यादा समय लगता था।

सिकंदर लोदी के समय में आगरा भारत का शिराज के नाम से जाना जाने लगा था। अंततः सिकंदर ने ग्वालियर के समीप एक छोटे भूभाग नरवर पर आक्रमण किया और 11 महीनो के लम्बे इंतज़ार के बाद नरवर किले को हासिल किया। 11 महीनो बाद जब लोगो ने पाया की उनके पास खाने के लिये कुछ भी नही। तो लोगो ने स्वयं को सिकंदर के हवाले कर दिया। और फिर बाद में एक बार फिर सिकंदर ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और महाराजा मानसिंह और उनकी पत्नी मृगनयनी से उसे हार का सामना करना पड़ा।

विद्वानों का संरक्षणदाता 

सिकन्दर शाह लोदी विद्या का पोषक था। वह विद्वानों और दार्शनिकों को बड़े-बड़े अनुदान देता था। इसलिए उसके दरबार में अरब और ईरान सहित विभिन्न जातियों और देशों के सुसंस्कृत विद्वान पहुँचते थे। सुल्तान के प्रयत्नों से कई संस्कृत ग्रंथ फ़ारसी भाषा में अनुवादित हुए। उसके आदेश पर संस्कृत के एक आयुर्वेद ग्रंथ का फ़ारसी में ‘फरहंगे सिकन्दरी’ के नाम से अनुवाद हुआ। उसका उपनाम ‘गुलरुखी’ था। इसी उपनाम से वह कविताएँ लिखा करता था। उसने संगीत के एक ग्रन्थ ‘लज्जत-ए-सिकन्दरशाही’ की रचना की।

सिकन्दर शाह लोदी स्वयं भी शिक्षित और विद्वान था। विद्वानों को संरक्षण देने के कारण उसका दरबार विद्वानों का केन्द्र स्थल बन गया था। प्रत्येक रात्रि को 70 विद्वान उसके पलंग के नीचे बैठकर विभिन्न प्रकार की चर्चा किया करते थे। उसने मस्जिदों को सरकारी संस्थाओं का स्वरूप प्रदान करके उन्हें शिक्षा का केन्द्र बनाने का प्रयत्न किया था। मुस्लिम शिक्षा में सुधार करने के लिए उसने तुलम्बा के विद्वान शेख़ अब्दुल्लाह और शेख़ अजीजुल्लाह को बुलाया था। उसके शासनकाल में हिन्दू भी बड़ी संख्या में फ़ारसी सीखने लगे थे और उन्हें उच्च पदों पर रखा गया था।

मृत्यु

जीवन के अन्तिम समय में सुल्तान सिकन्दर शाह के गले में बीमारी होने से 21 नवम्बर, 1517 को उसकी मृत्यु हो गई। आधुनिक इतिहासकार सिकन्दर लोदी को लोदी वंश का सबसे सफल शासक मानते है।


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