पाइथागोरस की जीवनी, इतिहास, निबंध | Pythagoras Biography in Hindi

Pythagoras / पाइथागोरस प्राचीन समय के महान गणितज्ञ, दार्शनिक और पाईथोगोरियनवाद नामक धार्मिक आन्दोलन के संस्थापक  थे, जिन्होंने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बनाया की किसी भी समकोण त्रिभुज में दो भुजाओं के वर्गों का योग तीसरी भुजा के वर्ग के बराबर होता है। यही सिद्धांत आज रेखा गणित का बेसीक है।

पाइथागोरस का इतिहास, निबंध - About Pythagoras Biography & History In Hindiपाइथागोरस का इतिहास, निबंध – About Pythagoras Biography & History In Hindi

दुनिया के इस दार्शनिक का जन्म आज से 580 ई.पू पहले यूनान के पास सामोस नामक जगह में हुआ था, जो एशिया माइनर (Asia Minor) के किनारे पर, पूर्वी ईजियन में एक यूनानी द्वीप है। उनकी माँ पायथायस और पिता मनेसार्चस थे।  दुर्भाग्यवश आज पाइथोगोरस के बारे में बहुत कम तथ्य ज्ञात हैं, क्योंकि उस समय लिखने के साधनों का विकास नहीं हुआ था। उनके संबंध में जो भी जानकारी हमें आज मिलती है। वह बाद के लेखकों द्वारा लिखी गई है। हालाँकि कुछ लेखक गणित और प्राकृतिक दर्शन में उनके योगदान की संभावनाओं पर सवाल उठाते हैं।

ईसा पूर्व की शताब्दियों में यूनानी बहुत ही धनी और अत्यधिक सभ्य थे। सामोस टापू यूनानियों का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, और पाइथागोरस के पिता एक धनी व्यापारी थे। इसलिए उन्हे अच्छी जगहो पर शिक्षा मिली थी। बचपन से ही पैथागोरस बहुत प्रतिभाशाली थे, यह कहा जाता है कि 17 वर्ष की उम्र में ही इस बालक की प्रतिभा इतनी विकसित हो गई थी कि अध्यापक इसके प्रश्नों के उत्तर देने मे असमर्थ हो जाते थे।

अत: इनके पिता ने इन्हे थेल्स ऑफ मिलेटस मे शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा। उन्हीं के साथ पैथागोरस ने अपने विश्वविख्यात प्रमेय का सूत्रपात किया और प्रयोगात्मक प्रदर्शन भी किया। लम्ब्लिकस के अनुसार थेल्स उनकी क्षमताओं से बहुत अधिक प्रभावित था, उसने पाइथोगोरस को इजिप्त में मेम्फिस को चलने और वहाँ के पुजारियों के साथ अध्ययन करने की सलाह दी जो अपनी बुद्धि के लिए जाने जाते थे। वे फोनेशिया में टायर और बैब्लोस में शिष्य बन कर भी रहे। इजिप्ट में उन्होंने कुछ ज्यामितीय सिद्धांतों को सिखा जिससे प्रेरित होकर उन्होंने अंततः प्रमेय दी जो अब उनके नाम से जानी जाती है।

उस समय अध्ययन के लिए चुकी पुस्तकें उपलब्ध नहीं थी इसलिए विद्यार्थियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाकर विद्वानों से संपर्क करना पड़ता था। कहां जाता है कि ज्ञान की तलाश में 30 वर्षो तक पैथागोरस ने बेबिलोन, अरब, फ़ारस और यहां तक कि भारत तक का भ्रमण किया।

सच्चाई तो यह है कि पैथागोरस ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ज्यामिति की प्रमेयो के लिए उपपति प्रणाली की आधार रखा। यह भी कहा जाता है कि पाइथागोरस ने ही सबसे पहले सिद्ध करके दिखाया कि किसी भी त्रिभुज के तीनो अंत:कोणों का योग दो समकोनो के बराबर होता है।

पाइथागोरस ने कई वर्ष मिस्र में गुजारे जहां उन्होंने संगीत और गणित के बीच में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। कई लेखो में ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिनके अनुसार उन्होंने संगीत के स्वरों पर भी काम किया। 50 वर्ष की अवस्था तक इस गणित ने बहुत कुछ सीख लिया था। वह एक ऐसे स्कूल की स्थापना करना चाहते थे जहां वे लोगो को कुछ पढ़ा सके।

लेकिन वहाँ के शासक को ये बात जची नही अत: पाइथागोरस को इटली छोड़ना पड़ा। उन्होंने क्रोटोने जाकर वहाँ एक स्कूल की स्थापना की। जल्द ही स्कूल में 300 के लगभग युवा छात्रों ने दाखिला ले लिया। वास्तविक मे यह स्कूल एक धार्मिक संस्था था जो प्रारंभिक ओर्फिक कल्ट से बहुत अधिक मिलती-जुलती थी। इस स्कूल में मुख्य रुप से चार विषय पढ़ाए जाते थे। यह विषय थे — अंकगणित, ज्यामिति, संगीत और ज्योतिष विज्ञान। साथ में यहां यूनानी दर्शन की शिक्षा भी दी जाती थी। पाइथागोरस का विचार था कि मनुष्य को पवित्र जीवन बिताना चाहिए। उनका विश्वास था कि पवित्र जीवन द्वारा ही आत्मा को शरीर के बंधनों से मुक्त किया जा सकता है। वे पुनर्जन्म को भी मानते थे।

पैथागोरस में अंको के सिद्धांत पर काम किया। उन्हें पिरामिड, घन आदि आकृतियां बनाने का ज्ञान था। इनका विचार था कि तारे वक्र गति में घूमते हैं। इन्होंने दिन और रात होने के विषय में यह बताया था कि धरती किसी केंद्रीय धुरी के चारों ओर घूमती है। वे परमाणु-सिध्दांत को भी स्वीकार करते थे।

जिंदगी के अंतिम चरण में पैथागोरस विचारों के अनुयायी राजनीति में कूद पड़े। उन्हे जहां भी मौका मिलता था वह अपना अधिकार जमाने की कोशिश करते थे। इससे उनका पतन हो गया और लोग उनके विरुद्ध हो गए। इसी आधार पर पाइथागोरस को देश से निकाल दिया गया। 80 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी मृत्यु के बाद कही जाकर ‘पाइथागोरियन’ सिध्दांतों का विकास हुआ जिन्होंने उन्हें ख्याति के उच्च शिखर पर पहुंचा दिया।

वो पहले आदमी थे जो अपने आप को एक दार्शनिक, या बुद्धि का प्रेमी कहते थे, और पाइथोगोरस के विचारों ने प्लेटो पर एक बहुत गहरा प्रभाव डाला।

उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद पैथागोरस की रोम के सीनेट में विशाल मूर्ति बनवाई गई और इस महान गणितग्य को यूनान के महानतम बुद्धिमान व्यक्ति का सम्मान दिया गया।

पाइथोगोरियन – 

यह संगठन कुछ मायनों में एक स्कूल, कुछ मायनों में एक भाईचारा और कुछ मायनों में एक मठ था। यह पाइथोगोरस के धार्मिक उपदेशों पर आधारित था और बहुत ही गुप्त था। सबसे पहले, स्कूल समाज की नैतिकता से बहुत अधिक सम्बंधित था। सदस्यों को नैतिकता के दृष्टिकोण के साथ जीना होता था, एक दूसरे से प्यार करना होता था, राजनीतिक मान्यताओं को बाँटना होता था, शांति का अनुसरण करना होता था और स्वयं को प्रकृति के गणित को समर्पित कर देना होता था।

उनके अनुयायियों का अंको की शक्ति में विश्वास था। जैसे दो का अंक रेखा, तीन सतह, चार घनत्व, छह आत्मा, सात स्वास्थ्य और प्रकाश तथा आठ प्रेम कें घोतक हैं।

पाइथोगोरस के अनुयायी सामान्यतः “पैथोगोरियन्स “कहलाते थे। उन्हें सामान्यतः दार्शनिक गणितज्ञ कहा जाता है, जिनका अक्षीय ज्यामिति की शुरुआत पर एक प्रभाव था, जो इसके विकास के २०० सालों के बाद यूक्लिड के द्वारा दी एलिमेंट्स में लिखा गया।


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