टेलीविजन अविष्कारक जॉन लॉगी बेयर्ड | John Logie Baird Biography In Hindi

John Logie Baird / जॉन लॉगी बेयर्ड एक स्कॉटिश वैज्ञानिक, इंजीनियर और इन्नोवेटर थे। जिन्होंने टेलीविजन आविष्कार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

टेलीविजन अविष्कारक जॉन लॉगी बेयर्ड | John Logie Baird Biography In Hindiजॉन लॉगी बेयर्ड की जीवनी – John Logie Baird Biography In Hindi

जॉन लॉगी बेयर्ड का जन्म 14 अगस्त, 1888 को ग्लैसगो के निकट हैलन्सबर्ग में हुआ था। इनके पिता एक पादरी थे फिर भी अर्थाभाव से घिरे रहे। वे शैशवावस्था से ही निर्बल थे। वे चार भाई बहन थे। उनका बचपन एक माली के लड़के के साथ बीता। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भी स्थानीय विद्यालय में हुई। उनकी सदैव अध्ययन की ओर रुचि रही। उन दिनों उनके विद्यालय में फोटोग्राफी पर विशेष बल दिया जाता था। इसमें उनहोने इतनी रुचि दर्शायी कि विद्यालय में फोटोग्राफी के अध्यक्ष बन गए। उन्होने बारह वर्ष की अल्पावस्था में अपने साथियों की सहायता से एक दूरदर्शन लाइन का निर्माण किया और अपने ऊपर वाले कक्ष को चार साथियों के घर से जोड़ दिया।

स्कूल छोड़ने के बाद उन्होंने ग्लैसगो में स्थित रोयल टेक्निकल कॉलेज में विज्ञान का अध्ययन किया। उनका स्वास्थ अच्छा नहीं रहता था इसलिए इनकी पढ़ाई भी अच्छी प्रकार नहीं हो पाई लेकिन फिर भी 5 साल बाद वे सहायक इंजीनियर बन गए। 26 साल की उम्र में शिलिंग प्रति सप्ताह के वेतन पर उन्होंने एक इलेक्ट्रिकल कंपनी में नौकरी करनी शुरु की। इन्ही दिनों प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था। इनके पैरों को बहुत ठंड लगती थी। ठंड से बचने के लिए वे अक्सर अपने पांव से टॉयलेट पेपर लपेट लेते थे। प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने पर इन्होंने मोजे बनाने आरम्भ किए। इस काम से उन्होंने 1600 पाउंड कमाएं।

बाद में इन्होंने जेम और चटनी बनाने का कारखाना खोला। इन वस्तुओं की स्थानीय खपत कम थी इसलिए उन्होंने यह काम भी बंद कर दिया। चूँकि इनका स्वास्थ्य बहुत खराब रहता था इसलिए उन्होंने अपने एक मित्र के पास जाने का निश्चय कर लिया, जो त्रिनिदाद में रहता था। वहां के लोगों को बेचने के लिए वे अनेक वस्तुएं भी अपने साथ ले गए थे। इस यात्रा के दौरान बेयर्ड के कुछ क्षण बड़े आनंद से गुजरे। हुआ यह कि वह एक रेडियो केबिन में घुस गए और वहां के ऑपरेटर से गप्पे मारने लगे। आपसी बातचीत में इन दोनों ने बिजली द्वारा हवा से तस्वीरें भेजने की समस्या पर विचार किया।

सन 1922 में जब वे वापस लंदन पहुंचे तो उनकी उम्र 24 वर्ष की हो चुकी थी। उनके पास एक समय कोई रोजगार नहीं था और पैसा भी बहुत कम था। इन ही दिनों इन के मन में टेलीविजन का आविष्कार करने का विचार आया। इस समय तक विश्व में और भी लोग इस क्षेत्र में काफी प्रयोग कर चुके थे। बेयर्ड ने पहले सभी प्रयोग के संबंध में जांचा-परखा फिर अपने उपकरण की रुपरेखा बनाई। उन्होंने चाय का पुराना डिब्बा तथा टोप रखने का गत्ते का डिब्बा खरीदा। जिसमें से एक वृत्ताकार डिस्क काटी। बिजली वाले कबाड़ियों से एक पुरानी मोटर ली, जिसमें अनेक छेदों वाली यह चकती लगा दी। जब यह डिस्क घूमती थी तो प्रकाशित किए जाने वाले समूचे दृश्य को अपने छेद द्वारा तीव्र और मन बिंदुओं में खंडित कर देती थी। बिस्किट के खाली डिब्बे में प्रोजेक्शन लैंप लगा दिया था।

सिलेनियम सेल, नियोल लैम्प रेडियो वाल्व आदि टूटे-फूटे उपकरणों की सहायता से उन्होंने अपना प्रयोग आरंभ किया। बेयर्ड कभी अपने उपकरण में कुछ जोड़ते तो कभी कुछ खोलते। कभी कुछ बिगाड़ते तो कभी कुछ सुधारने महीनों तक बहुत मेहनत करने के बाद उनका प्रथम टेलीविजन ट्रांसमीटर और रिसीवर बना जो अभी बहुत ही प्रारंभिक अवस्था में था। काफी परीक्षण के बाद सन 1924 के वसंत में वह एक मल्टी क्रॉस की छाया को 3 गज की दूरी तक प्रसारित करने में सफल हो गए।

सन् 1925 ई. की 2 अक्टूबर को, उन्होंने अपने उपकरण में प्रकाश को विद्युत किरणों में परिवर्तित करने के लिए एक नई चीज लगायी। स्वीच दबाने पर वे स्वयं ही आश्चर्य चकित रह गए। उनके उपकरण में दृश्य का पूरा चेहरा अभर आया था। उसे देखकर वे कुर्सी से उछल पड़े।

उन्होंने मानवाकृति के प्रसारण में सफलता प्राप्त की। सन् 1926 ई, में उन्होंने रॉयल इंस्टीट्यूट लंदन में, चलते-फिरते दूरदर्शन चित्रों के प्रेषण का प्रदर्शन किया। सन् 1926 ई में जर्मन पोस्ट कार्यालय में दूरदर्शन सेवा विकसित करने के लिए उन्हें सुविधाएं दीं। सन् 1928 ई। में ही उन्होंने रंगीन दूरदर्शन के प्रेषण पर भी कार्य करना शुरू कर दिया था। सन् 1936 ई। में बी. बी. सी. ने दूरदर्शन सेवा उनके द्वारा विकसित उपरकण से शुरु कर दी। तब तक मारकोनी की विधि भी विकसित हो गई थी। बेयर्ड अर्थाभाव और स्वास्थ्य के खराब होने पर भी जीवन के अंतिम वर्षों में सन् 1945 ई. तक रंगीन दूरदर्शन के क्षेत्र में कार्यरत रहे। ठंड लग जाने से 14 जून सन् 1946 ई. को बेक्सहील न-सी, ससैक्स में बेयर्ड का निधन हो गया। मरणोपरान्त उनकी स्मृति में अनेक स्तम्भ बनाए गए। और अनेक-अनेक तरीकों से श्रद्धांजलि समर्पित की गई लेकिन दुर्भाग्य से वे जीवनभर संघर्ष करते रहे और अपने जीवन काल में कोई सम्मान प्राप्त ना कर पाए।


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