अर्बुदा देवी मन्दिर का इतिहास और जानकारी | Arbuda Devi Temple History in Hindi

Arbuda Devi Temple / अर्बुदा देवी मन्दिर राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है। अर्बुदादेवी आबू की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि इस स्थान पर मां पार्वती के होंठ गिरे थे। आबू पर्वत शाक्त धर्मका प्रमुख केन्द्र और अर्बुदेश्वरी का निवास माना जाता था। मां अर्बुदा देवी की पूजा माता कात्यायनी देवी के स्वरूप में की जाती है। 

अर्बुदा देवी मन्दिर का इतिहास और जानकारी | Arbuda Devi Temple History in Hindi

अर्बुदा देवी मन्दिर, माउंट आबू – Arbuda Devi Temple History & Information

मां अर्बुदा देवी का मंदिर मांउंट आबू से 3 कि.मी. दूर एक पहाड़ी पर स्थित है। अर्बुदा देवी, अधर देवी और अम्बिका देवी के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में प्रतिष्ठित है। इस मंदिर की स्थापना साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व हुई थी। सफेद संगमरमर से बना यह छोटा सा मन्दिर एक ऊँची और विशाल पहाड़ी के बीचोंबीच में स्थित है और बहुत भव्य और आकर्षक लगता है।

अष्टमी की रात्रि यहां महायज्ञ होता है जो नवमी के सुबह तक पूर्ण होता है। नवरात्रों में यहां निरंतर दिन-रात अखंड़ पाठ होता है। पौराणिक मान्यताअों के अनुसार इस स्थान पर मां पार्वती के होंठ गिरे थे। तभी से यह स्थान अधर देवी के नाम से जाना जाता है। अर्बुदा देवी की पूजा छठे दिन माता कात्यायनी के स्वरूप में की जाती है।

भक्तजन मंदिर में सैकड़ों मीटर की यात्रा के पश्चात 350 सीढ़ियों को चढ़कर के मां के दर्शनों के लिए आते हैं। अर्बुदा देवी के निज मन्दिर में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को गुफा के संकरे मार्ग में होकर बैठकर जाना पड़ता है। मन्दिर की गुफा के प्रवेश द्वार के समीप एक शिव मन्दिर भी बना है।

श्री अर्बुदा देवी ही षष्टम दुर्गा कात्यायिनी दुर्गा है। इस देवी ने अपनी लीला से आबू में यज्ञ कुण्ड की ज्वाला से परमार और परिहार राजपूतों के आदि पुरुषों को प्रकट किया। अतः यह देवी परमार और परिहार जाति के राजपूतों की कुलदेवी कहलाई। परमार और परिहार जाति के जिन जिन राजपूतों को जैन आचार्यों ने प्रतिबोधित कर महाजन बनाया उन सभी की कुलदेवी श्री अधर देवी है।

यहां पर अर्बुदा देवी का चरण पादुका मंदिर भी स्थित है। माता के चरण पादुका के नीचे उन्होंने बासकली राक्षस का संहार किया था। मां कात्यायनी के बासकली वध की कथा पुराणों में मिलती है।

पौराणिक कथा के अनुसार दैत्य राजा कली जिसको बासकली के नाम से जाना जाता था। उसने हजारों वर्ष तप करके भोलेनाथ को प्रसन्न कर उनसे अजेय होने का वर प्राप्त किया। बासलकी वरदान प्राप्त कर घमंडी हो गया। उसने देवलोक में इंद्र सहित सभी देवताओं को कब्जे में कर लिया। देवता उसके आतंक से दुखी होकर जंगलों में छिप गए। देवताअों ने कई वर्षों तक तप करके मां अर्बुदा देवी को प्रसन्न किया।

माता ने प्रसन्न होकर तीन स्वरूपों में दर्शन दिया। देवताअों ने माता से बासकली से मुक्ति दिलाने का वर मांगा। मां ने उन्हें तथास्तु कहा। माता ने बासकली राक्षस को अपने चरणों से दबा कर उसे मुक्ति प्रदान की। उसके पश्चात यहा मां के चरण पादुका की पूजा होने लगी।

मान्यता के अनुसार नवरात्र के दिनों में माता के दर्शन मात्र से व्यक्ति को प्रत्येक दुखों से मुक्ति मिल जाती है अौर भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। नवरात्रों में यहां बहुत संख्या में भक्त मां के दर्शनों के लिए आते हैं। नवरात्र के छठे दिन मां अर्बुदा अर्थात माता कात्यायनी के दर्शनों के लिए यहां भक्तों की सुबह से ही भीड़ जमा हो जाती है।

अर्बुदा देवी मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियों का रास्ता है। रास्ते में सुंदर नजारों की भरमार है। जिसकी वजह से सीढियां कब खत्म हो जाती हैं पता ही नही चलता। ऊपर पहुंचने के बाद यहां के सुंदर दृश्य और शान्ति मन मोह लेती है और सारी थकान पल भर में ही दूर हो जाती है।

स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता के चरण पादुका की महिमा खूब गायी गई है। पादुका के दर्शन मात्र से ही मोक्ष यानि सदगति मिलने की बात भी कही गई है। एक ऋषि ने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी। जब दानव महिषासुर का संहार करने के लिये, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने अपने तेज का एक-एक अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था तब महर्षि कात्यायन ने ही सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी। इसी वजह से ये कात्यायनी कहलायीं।


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