श्री स्वाथि थिरूनल राम वर्मा की जीवनी | Swathi Thirunal Rama Varma

Swathi Thirunal Rama Varma  / स्वाथि थिरूनल राम वर्मा त्रावणकोर (वर्तमान तिरुवंगूर, केरल) के महाराजा थे। ये दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत परंपरा के सर्वोत्कृष्ट संगीतज्ञों में से एक थे। अपने शासन काल के समय में कला के महानतम संरक्षकों में वह गिने जाते थे।

श्री स्वाथि थिरूनल राम वर्मा - Swathi Thirunal Rama Varma History & Biography in Hindi

श्री स्वाथि थिरूनल राम वर्मा – Swathi Thirunal Rama Varma History & Biography in Hindi

स्वाथि थिरूनल राम वर्मा मात्र 16 वर्ष की आयु में ही स्वाति तिरुनल दक्षिण भारतीय राज्य के शासक बन गये थे। अपने शासन काल के समय में कला के महानतम संरक्षकों में वह गिने जाते थे। स्वाति तिरुनल स्वयं भी 10 से अधिक भाषाओं में पारंगत थे, जिनमें संस्कृत, तेलुगू, कन्नड़, मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी शामिल थीं। वह इन भाषाओं में कविताएँ लिखते थे। चित्रकला, शिल्पकारी और अन्य कलाओं में भी स्वाति तिरुनल काफ़ी निपुण थे। माना जाता है कि उन्होंने लगभग 500 गीतों की रचना की थी। ‘वर्णम’, ‘कृति’, ‘स्वरजाति’, ‘पदम’ और ‘जवाली’ के साथ-साथ उन्होंने दो गीति-नाट्यों की भी रचना की थी। स्वाति तिरुनल ने कई ध्रुपद, ख़याल और ठुमरियों की भी रचना की, लेकिन उन्हें कर्नाटक संगीत, विशेषकर ‘पदम’ (प्रेम गीत) के लिए सबसे अधिक ख्याति मिली।

शुरुवाती जीवन 

स्वाथि थिरूनल राम वर्मा का जन्म 16 अप्रैल, 1813 में दक्षिण भारत के प्राचीन राज्य त्रावणकोर (वर्तमान केरल राज्य) में हुआ था। इनके पिता राजराजा वर्मा आउट माता महारानी गोवरी लक्ष्मी बाई थी। राम वर्मा उनके द्वितीय संतान थे। इनका पालन-पोषण कोयिथाम्पुरन स्थित चंगनासेरी के राजमहल में हुआ था।

स्वाथि थिरूनल राम वर्मा की बड़ी बहन का नाम रुक्मिणी बाई और छोटे भाई का नाम उथराम थिरूनल मार्तंड वर्मा था। इनकी मां का निधन छोटे भाई के जन्म के दो माह बाद ही हो गया था। इस समय स्वाथि थिरूनल की उम्र मात्र 17 माह की ही थी। इनकी मां की बहन (मौसी) गोवरी पार्वती बाई ने राज्य का कार्यभार संभाला जबतक की ये बड़े नहीं हो गए।

मात्र 14 वर्ष की अवस्था में राम वर्मा का राज्याभिषेक हुआ और इन्होंने राज्य का कार्यभार संभाला। उस समय भी इनके पिता और मौसी दोनों अच्छे पढ़े-लिखे थे, जिन्होंने इनकी शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया था। इन्होंने छ: वर्ष की अवस्था में संस्कृत और मलयालम की शिक्षा ग्रहण करना प्रारम्भ कर दिया था और अंग्रेजी की शिक्षा सात वर्ष की अवस्था में। युवा अवस्था होते-होते इन्होंने अनेक भाषाओँ में महारथ हासिल कर लिया था, जैसे- मलयालम, तमिल, कन्नड़, हिन्दुस्तानी, तेलगु, मराठी, अंग्रेजी, पर्सियन और संस्कृत आदि. युवा अवस्था में ये भाषाओँ के अलावा व्याकरण, कविता और नाटक में भी काफी रुचि लेते थे। एक विद्वान राजा के रूप में इन्होंने अपने राज्य में कला, संस्कृति और संगीत को विशेष महत्व दिया।

स्वाथि थिरूनल राम वर्मा का अल्पायु में ही विवाह हो गया था, लेकिन पहली पत्नी का जल्दी ही स्वर्गवास हो गया। इसके बाद इनका दूसरा विवाह तिरुवात्तर अम्माची पनापिल्लई अम्मा श्रीमती नारायणी पिल्लई कोचम्मा के साथ हुआ, जिनका सम्बन्ध थिरुवात्तर अम्मावीडू परिवार से था। इनकी दूसरी पत्नी कर्नाटक शैली की गायिका और एक कुशल वीणा वादक थीं।

दूसरी पत्नी से एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम थिरुवत्तर चिथिरा नाल अनंथ पद्मनाभन चम्पकरमण थम्पी था। वर्ष 1843 में स्वाथि तिरुनल ने सुंदर लक्ष्मी अम्मल के साथ अपनी तीसरी शादी कर ली, जो मुदालिअर की बेटी थीं, जो त्रिवेंद्रम से विस्थापित हुए थे। सुंदर लक्ष्मी को सुगंधावल्ली के नाम से भी जाना जाता था, वह एक नृत्यांगना थी। कहा तो यह भी जाता है कि थिरूनल की दूसरी पत्नी ने इस तीसरी शादी को मान्यता नहीं दी थी, इसलिए सुगंधावल्ली त्रावणकोर को छोड़कर अन्यत्र चली गई। जिसकी वजह से थिरूनल बहुत दु:खी हुए थे। इस सन्दर्भ में यह भी कहा जाता है कि इस विरह वेदना को थिरूनल सहन नहीं कर पाए और इसी की वजह से 33 वर्ष की अल्पायु में ही हृदयघात के कारण वर्ष 1846 में इनका निधन हो गया।

संगीतज्ञ जीवन 

श्री स्वाथि थिरूनल राम वर्मा बचपन से ही संगीत के प्रति विशेष प्रेम रखते थे। इनकी सोच थी कि विभिन्न भाषाओं में महारथ हासिल करने के लिए संगीत को एक सर्वश्रेष्ठ माध्यम बनाया जा सकता है। इनके संगीत शिक्षा का प्रशिक्षण करामन सुब्रह्मनिया भागवतार और करामन पद्मनाभ भागवतार की देख-रेख में शुरू हुआ था। इसके बाद इन्होंने अपने अंग्रेजी शिक्षक सुब्बाराव से भी संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी। बाद में इन्होंने संगीत सीखने के लिए उस समय के प्रसिद्ध संगीतकारों को सुनने और स्वयं के अभ्यास पर विशेष बल दिया था।

श्री स्वाति तिरुनाल बालराम वर्मा ने ही तिरुअनन्तपुरम की खगोलीय वेधशाला, सरकारी प्रेस, त्रिवेन्द्रम जनता पुस्तकालय, पौर्वात्य पाण्डुलिपि संग्रहालय (Oriental Manuscript Library) आदि का आरम्भ किया। महाराजा सन् 1843 से रॉयल एशियाटिक सोसायटी के सम्मानित सदस्य भी थे।

महाराजा ने दक्षिण भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी में पद्य-रचना की जिनकी गणना आधुनिक हिन्दी की आरम्भिक रचनाओं में है। इस संगीत एवं कला के महान संरक्षक ने मात्र 33 वर्ष की आयु में ही 27 दिसम्बर, 1846 को हृदयाघात के कारण अपना प्राण त्याग दिया।


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