सम्राट अशोक मौर्या का जीवन परिचय Samrat Ashoka Biography In Hindi

सम्राट अशोक (Ashoka The Great ) प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश का राजा था। अशोक का देवानाम्प्रिय एवं प्रियदर्शी आदि नामों से भी उल्लेख किया जाता है। अशोक का पूरा नाम “अशोक वर्धन मौर्या” था। आदर्शवादी तथा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न, मानव सभ्यता का अग्रदूत तथा प्राचीन भारतीय इतिहास का दैदिप्त्यमान सितारा अशोक एक महान सम्राट था। सभी इतिहासकारों की दृष्टी से अशोक का शासनकाल स्वर्णिम काल कहलाता है। उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर, कर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है।

सम्राट अशोक का जन्म :-

अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिन्दुसार के तथा माता सुभाद्रंगी के पुत्र थे तथा सम्राट अशोक सम्राट चन्द्रगुप्त मोर्य के पौत्र थे सम्राट अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व पटना के पाटलीपुत्र मे हुआ था तथा 72 वर्ष की आयु पूर्ण करने के पश्चात इनकी मृत्यु 232 ईसा पूर्व मे पटलिपुत्र मे ही हुई। लंका की परम्परा में बिंदुसार की सोलह पटरानियों और 101 पुत्रों का उल्लेख है। पुत्रों में केवल तीन के नामोल्लेख हैं, वे हैं – सुसीम जो सबसे बड़ा था, अशोक और तिष्य। तिष्य अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था।सम्राट अशोक को मौर्य साम्राज्य का तीसरा शासक माना जाता था। सम्राट अशोक की माता चंपक नगर के एक बहुत ही गरीब परिवार की बेटी थी। सम्राट अशोक को एक सफल और कुशल सम्राट बनाने मे आचार्य चाणक्य का बहुत बड़ा हाथ है| आचार्य चाणक्य ने उन्हें एक सगल और कुशल सम्राट के सभी गुण सिखाये।

सम्राट अशोक का बचपन :-

सम्राट अशोक बचपन से ही शिकार के शौकीन थे तथा खेलते-खेलते वे इसमे निपूर्ण भी हो गए थे। कुछ बड़े होने पर वे अपने पिता के साथ साम्राज्य के कार्यो मे हाथ बटाने लगे थे तथा वे जब भी कोई कार्य करते अपनी प्रजा का पूरा ध्यान रखते थे इसी कारण उनकी प्रजा उन्हे पसंद करने लगी थी। उनके इन्ही सब गुणो को देखते हुये उनके पिता बिन्दुसार ने उन्हे कम उम्र मे ही उज्जैन का सुबेदार घोषित कर दिया था। उज्जैन ज्ञान और कला का केंद्र था जब 273 ई.पू. में बिंदुसार बीमार हुआ तो पिता की बिमारी की खब़र सुनते ही सम्राट अशोक पाटलीपुत्र के लिये रवाना हुआ लेकिन रास्ते में ही अशोक को पिता बिंदुसार के मृत्यु की ख़बर मिली।

पाटलीपुत्र पहुँचकर उसे उन लोगों का सामना करना पड़ा जो उसे पसंद नही करते थे। युवराज न होने के कारण अशोक उत्तराधिकार से भी बहुत दूर था। लेकिन अशोक की योग्यता इस बात का संकेत करती थी कि अशोक ही बेहतर उत्तराधिकारी था। बहुत से लोग अशोक के पक्ष में भी थे। अतः उनकी मदद से एंव चार साल भाइयों के साथ गृह-युद्धके कड़े संघर्ष के बाद 273 ई.पू. में अशोक का औपचारिक रूप से राज्यभिषेक हुआ। और पूर्ण रूप से 272 ई. मे अशोक को राजगद्दी मिली उसने 232 ई. पूर्व तक शासन किया। उन्होने विदिशा की राजकुमारी शाक्य कुमारी से विवाह किया । शाक्य कुमारी देखने मे अत्यंत ही सुंदर थी। शाक्य कुमारी से विवाह के पश्चात उनके पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ।

सम्राट अशोक का साम्राज्य-विस्तार और धर्म :-

अशोक घोर मानवतावादी था। वह रात–दिन जनता की भलाई के काम ही किया करता था।. उसे विशाल साम्राज्य के किसी भी हिस्से में होने वाली घटना की जानकारी रहती थी। धर्म के प्रति कितनी आस्था थी, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह बिना एक हजार ब्राम्हणों को भोजन कराए स्वयं कुछ नहीं ख़ाता था. कलिंग युध्द अशोक के जीवन का पहला और आखरी युध्द था, उस उद्ध ने अशोक के जीवन को ही बदल डाला।

अशोक इस छोटे से राज्य(कलिंग) को अपने साम्राज्य में मिलाना चाहता था। लेकिन स्वाभिमानी और बहादुर कलिंगवासी अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते थे। इसवी सन 260 के आस-पास अंततः अशोक ने कलिंग पर चढ़ाई की और घमासान युध्द शुरु हुआ. अशोका ने कलिंगा के साथ एक भयंकर युद्ध किया। जिसमे उसने कलिंगा को परास्त किया जो इस से पहले किसी सम्राट ने नहीं किया था और ना ही कर पाया था। अशोका से हुए कलिंगा-अशोका युद्ध में 100000 से भी ज्यादा मृत्यु हुई और 150000 से भी ज्यादा घायल हुए। इस युध्द में हुए भारी रक्तपात ने उसे हिलाकर रख दिया, उसने सोचा कि यह सब लालच का दुष्परिणाम है और जीवन में फिर कभी युध्द न करने का प्रण लिया. उसने बौध्द धर्म अपना लिया और अहिंसा का पुजारी हो गया। उसने देशभर में बौध्द धर्म के प्रचार के लिए स्तंभों और स्तूपों का निर्माण कराया. विदेशों में बौध्द धर्म के विस्तार के लिए उसने भिक्षुओं की तोलियां भेजीं. बुद्ध का प्रचार करने हेतु उन्होंने अपने रज्य में जगह-जगह पर भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमाये स्थापित की. और बुद्ध धर्म का विकास करते चले गये। बौध्द धर्म को अशोक ने ही विश्व धर्म के रूप में मान्यता दिलाई. विदेशों में बौध्द धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संधमित्रा को श्री लंका भेजा अशोक द्वारा लिखवाये गये अधिकांश शिला-अभिलेख धर्म प्रचार के साधन थे।

अशोक के अधिकांश संदेश ब्रह्मी लिपि में हैं। कुछ अभिलेखों में खरोष्ठी तथा आरमेइक लिपि का भी प्रयोग हुआ है। सर्व प्रथम 1837 में जेम्स प्रिंसेप नामक विद्वान ने इसे पढने में सफलता हासिल की थी। अशोक द्वारा लिखवाये अभिलेखों को चार भागों में विभाजित किया गया है, चौदह -शिलालेख, लघु-शिलालेख, स्तम्भ-शिलालेख तथा लघु-स्तम्भ शिलालेख। अशोक ने अपने शासनकाल में अनेक स्तंभ बनवाये थे उसमें से आज लगभग 19 ही प्राप्त हो सकें हैं। इनमें से हमारी संस्कृति की धरोहर अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में अंगीकार किया गया है। स्तंभ में स्थित चार शेर शक्ति, शौर्य, गर्व और आत्वविश्वास के प्रतीक हैं। अशोक स्तंभ के ही निचले भाग में बना अशोक चक्र आज राष्ट्रीय ध्वज की शान बढ़ा रहा है।

सम्राट अशोक की मृत्यु :-

लगभग 40 वर्षो के शासन के बाद अशोक सम्राट की मृत्यु हो गयी । उनकी पत्नियों के बारे मे कोई खास जानकारी किसी किताब या कही और नहीं है। कहा जाता है अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य लगभग 50 वर्षों तक चला। इसके आखिरी शासक का नाम ब्रह्द्रत था जिसे 185 BCE में उसके जनरल पुष्यमित्र संगा ने मार डाला था।

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