सम्राट जलाल उद्दीन अकबर इतिहास | Great Akbar History In Hindi

Great Akbar History & Biography In Hindi,

The Great King Akbar History:- जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर जो साधारणतः अकबर महान, शहंशाह अकबर, महाबली शहंशाह के नाम से भी जाने जाते है, वे भारत के तीसरे और मुघल के पहले सम्राट थे। अकबर मुगल काल का सबसे कुशल शाषक और धर्म निरपेक्ष बादशाह थे। इन्हे इतिहास मे सबसे सफल शासक के रूप मे जाना जाता हैं। यह एक ऐसे राजा थे जिन्हे दोनो संप्रदायो हिंदू एवं मुस्लिमने प्यार से स्वीकारा इसलिए इन्हे जिल-ए-लाही के नाम से नवाज़ा गया।

जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर की जीवनी – About Akbar Biography In Hindi :-

पूरा नाम  –  अबुल-फतह जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर
जन्म       –  15 अक्तुबर, 1542. अमरकोट.
मृत्यु        –  3 अक्टूबर 1605
पिता       –  हुमांयू.
माता       –  नवाब हमीदा बानो बेगम साहिबा.
शिक्षा      –  अल्पशिक्षित होने के बावजूद सैन्य विद्या में अत्यंत प्रवीण थे.
विवाह     –  रुकैया बेगम सहिबा, सलीमा सुल्तान बेगम सहिबा, मारियाम उज़-ज़मानि बेगम सहिबा, जोधाबाई राजपूत
संतान     –  जहाँगीर.

प्रारंभिक जीवन – Early Life :

सम्राट अकबर मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का पौत्र और हुमायु के बेटे थे, जिन्होंने पहले से ही मुघल साम्राज्य का भारत में विस्तार कर रखा था। 1539-40 में चौसा और कन्नौज में होने वाले शेर शाह सूरी से युद्ध में पराजित होने के बाद मुघल सम्राट हुमायु पश्चिम की और गये जहा सिंध में उनकी मुलाकात 14 साल की हमीदा बानू बेगम से हुई। जो हुमायु के छोटे भाई के अध्यापक शैख़ अली अकबर जामी की बेटी थी।

उन्होंने उनसे शादी कर ली और अगले साल ही जलाल उद्दीन मुहम्मद का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को राजपूत घराने में सिंध के उमरकोट में हुआ (जो अभी पकिस्तान में है) जहा उनके माता-पिता को वहा के स्थानिक हिंदु राजा राना प्रसाद ने आश्रय दिया। बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से संबंधित था अर्थात उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान से थे और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था। मुघल शासक हुमायु के लम्बे समय के वनवास के बाद, अकबर अपने पुरे परिवार के साथ काबुल स्थापित हुए, जहा उनके चाचा कामरान मिर्ज़ा और अस्करी मिर्ज़ा रहते थे।

हुमायूँ की अपने छोटे भाइयों से बराबर ठनी ही रही इसलिये चाचा लोगों के यहाँ अकबर की स्थिति बंदी से कुछ ही अच्छी थी। यद्यपि सभी उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे और शायद दुलार प्यार कुछ ज़्यादा ही होता था। जिस कारण उन्होंने अपनी पूरी जवानी शिकार करने में, युद्ध कला सिखने में, लड़ने में, भागने में व्यतीत की जिसने उसे एक शक्तिशाली, निडर और बहादुर योद्धा बनाया। लेकिन अपने पुरे जीवन में उन्होंने कभी लिखना या पढना नहीं सिखा था। ऐसा कहा जाता है की जब भी उन्हें कुछ पढने की जरुरत होती तो वे अपने साथ किसी को रखते थे जिसे पढना लिखना आता हो. किन्तु ज्ञानोपार्जन में उसकी रुचि सदा से ही थी। शायद इसलिए जब वह सोने जाते थे, तब एक व्यक्ति उसे कुछ पढ़ कर सुनाता रह्ता था।

बादशाह अकबर की शादी और राजगद्दी :-

1551 में अकबर ने अपने चाचा हिंडल मिर्जा की इकलौती बेटी रुकैया सुल्तान बेगम से निकाह कर लिए, जो उनकी पहली और मुख्य पत्नी थी। उनकी यह पहली शादी अकबर के पिता और रुकैया के चाचा ने रचाई थी।

शेर शाह सूरी से पहली बार पराजित होने के बाद, हुमायु में दिल्ली को 1555 में पुनर्स्थापित किया और वहा उन्होंने एक विशाल सेना का निर्माण किया, और इसके कुछ ही महीनो बाद हुमायु की मृत्यु हो गयी। इसके बाद अकबर का वयस्क होने तक राजपाट की ज़िम्मेवारी बैरम खान को सौपा गया। अकबर को एक सफल शक्तिशाली बादशाह बनाने के लिए अकबर के रक्षक बैरम ख़ान ने उनसे उनके पिता की मृत्यु की बात छुपाई थी। 13 वर्ष की उम्र में 14 फरवरी 1556 को बैरम ख़ान ने अकबर को दिल्ली की राजगद्दी पर बिठा दिया, ताकि वे अपने लिए एक नया विशाल साम्राज्य स्थापित कर सके जहा उन्हें “शहंशाह” का नाम दिया गया।

सुरी साम्राज्य ने छोटे बालक का भय ना करते हुए हुमायु की मौत के बाद फिर से आगरा और दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था। बैरम खान के नेतृत्व में उन्होंने सिकन्दर शाह सुरी के खिलाफ मोर्चा निकाला, उस समय सिंकंद्र शाह सुरी का सेनापति हेमू था और बैरम खान के नेतृत्व में अकबर अकबर की सेना ने हेमू को 1556 में पानीपत के दुसरे युद्ध में पराजित कर दिया। इसके तुरंत बाद मुगल सेना ने आगरा और दिल्ली पर अपना आधिपत्य कर दिया। इसके बाद यही से शहंशाह अकबर अपने राज्यो का विस्तार करते गये।

अकबर के शासन के अंत तक 1605 में मुगल साम्राज्य में उत्तरी और मध्य भारत के अधिकाश भाग सम्मिलित थे और उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। अकबर एक बहादुर और शक्तिशाली शासक थे उन्होंने गोदावरी नदी के आस-पास के सारे क्षेत्रो को अपने अधीन कर लिया था। उनके अनंत सैन्यबल, अपार शक्ति और आर्थिक प्रबलता के आधार पर वे धीरे-धीरे भारत के कई राज्यों पर राज करते चले जा रहे थे। अकबर अपने साम्राज्य को सबसे विशाल और सुखी साम्राज्य बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने कई प्रकार की निति अपनाई जिस से उनके राज्य की प्रजा ख़ुशी से रह सके।

वे ऐसे बादशाह थे, जिसे हिन्दू मुस्लिम दोनों वर्गों का बराबर प्यार और सम्मान मिला। उसने हिन्दू-मुस्लिम संप्रदायों के बीच की दूरियां कम करने के लिए दीन-ए-इलाही नामक धर्म की स्थापना की। उसका दरबार सबके लिए हर समय खुला रहता था। उसके दरबार में मुस्लिम सरदारों की अपेक्षा हिन्दू सरदार अधिक थे। अकबर ने हिन्दुओं पर लगने वाला ‘जज़िया'(ग़रीब हिंदुओ को कर देना) ही नहीं समाप्त किया, बल्कि ऐसे अनेक कार्य किए जिनके कारण हिन्दू और मुस्लिम दोनों उसके प्रशंसक बने। उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया। सम्राट के रूप में अकबर ने शक्तिशाली और बहुल हिन्दू राजपूत राजाओं से राजनयिक संबंध बनाये और उनके यहाँ विवाह भी किये।

अकबर के शासन का प्रभाव देश की कला एवं संस्कृति पर भी पड़ा। उसने चित्रकारी आदि ललित कलाओं में काफ़ी रुचि दिखाई और उसके प्रासाद की भित्तियाँ सुंदर चित्रों व नमूनों से भरी पड़ी थीं। मुगल चित्रकारी का विकास करने के साथ साथ ही उसने यूरोपीय शैली का भी स्वागत किया। उसे साहित्य में भी रुचि थी और उसने अनेक संस्कृत पाण्डुलिपियों व ग्रन्थों का फारसी में तथा फारसी ग्रन्थों का संस्कृत व हिन्दी में अनुवाद भी करवाया था। साहित्य एवं कला को उन्होंने बहुत अधिक प्रोत्साहन दिया, अनेक ग्रंथो, चित्रों एवं भवनों का निर्माण उनके शासनकाल में ही हुआ था। उनके दरबार में विभिन्न विषयों के लिए विशेषज्ञ नौ विद्वान् थे, जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा जाता था।

अकबर को भारत के उदार शासकों में गिना जाता है। संपूर्ण मध्यकालीन इतिहास में वो एक मात्र ऐसे मुस्लीम शासक हुए है जिन्होंने हिन्दू मुस्लीम एकता के महत्त्व को समझकर एक अखण्ड भारत निर्माण करने की चेष्टा की।

बादशाह अकबर ने अपने आर्थिक बल से विश्व की एक सबसे शक्तिशाली सेना बना रखी थी, जिसे किसी के लिए भी पराजित करना असंभव सा था। अकबर ने जो लोग मुस्लिम नहीं थे उनसे कर वसूल करना भी छोड़ दिया और वे ऐसा करने वाले पहले सम्राट थे, और साथ ही जो मुस्लिम नहीं है उनका भरोसा जितने वाले वे पहले सम्राट थे। अकबर के बाद, सफलता से उनका साम्राज्य उनका बेटा जहागीर चलाया था।

मुगल स्थापत्य कला हिन्दू और मुस्लिम स्थापत्य का मिश्रण था। अकबर अकबर ने इन दोनों के मिश्रण से कई इमारते बनवाई, अकबर के निर्माण का अपना अलग तरीका था जिससे उसने भवन ,इमारते ,महल , मस्जिद , कब्रे और किले बनवाए। अकबर अकबर ने सबसे पहले आगरा के किले का निर्माण करवाया, इस किले के दो द्वार दिल्ली गेट और अमर सिंह गेट है। अकबर ने लाल पत्थरों से 500 से भी ज्यादा इमारतो का निर्माण करवाया जिसमे से कुछ अभी भी है और कुछ लुप्त हो गये है। इसमें अकबरी महल और जहाँगीर महल इन दोनों महलो को एक ही तरीके से बनवाया।

इसके बाद उन्होने लाहौर का किला और अलाहबाद का किला बनवाया। उनकी स्थापत्य कला का सबसे सुंदर नमूना फतेहपुर सीकरी था। जिसे उन्होने अपनी राजधानी बनाया था। इस वीरान जगह को पूरा करने में अकबर को 11 साल लगे।इस शहर को उन्होने तीन तरफ से दीवारों से और एक तरफ से कृतिम झील बनवाई। इस दीवार के 9 दरवाजे है। और इसका मुख्य द्वार आगरा गेट है। उन्होने मजबूत दरवाज़ा का भी निर्माण करवाया जो मार्बल और बलुआ पत्थरों से निर्मित है। दीवाने ख़ास भी इसकी प्रसिद्ध इमारत है। अकबर ने गरीबो की मदद करने के लिए कई सरायो का निर्माण करवाया। इसके अलावा उन्होने कई विद्यालयों और इबादत करने की जगहों का निर्माण करवाया।

जोधा अकबर की कहानी – Jodha Akbar History In Hindi :- 

बादशाह अकबर ने भारत को अपने अधीन करने के लिए बिल्कुल अलग तरह की रणनीति का इस्तेमाल करते थे। जिसमे युद्ध और समझौता समिल था। अकबर के पास विशाल सेना था, जिससे आसानी से वो किसी को हरा सकते थे और अपने अधीन कर सकते थे। लेकिन इन सब मे बहुत अधिक खून-ख़राबा होता जो बादशाह अकबर को पसंद नही था। इसलिए उन्होने समझौते की नीति को अपनाया, जिसके तहत वे अन्य राजाओ की बेटियो से विवाह कर सम्मान के साथ उनसे रिश्ते बनाकर उन रियासतो को बिना जन-हानि के अपने अधीन कर लेते थे।

उन दीनो अकबर के सबसे बड़े शत्रु राजपूत थे। जिन्हे वो इन दोनो नीतियो मे एक के तहत अपने अधीन कर लेते थे। जब उनका युद्ध राजा भारमल से हुआ तब अकबर ने उनके तीनो बेटो को बंदी बना लिया, जिसके बाद राजा भारमल ने समझौते के लिए हाथ बढ़ाया और इस तरह राजा भारमल की कन्या राजकुमारी जोधा का अकबर के साथ विवाह हुआ। कुछ इतिहासकार का मानना हैं की इसी कारण बादशाह अकबर मे दोनो धर्मो के प्रति समानता का भाव था। क्यूंकी अकबर बाकी सभी बेगमो मे सबसे ज़्यादा जोधा से प्रेम करते थे।

बादशाह अकबर और बीरबल की मुलाकात :-

अकबर बिरबल की बहुत सारी किस्से आप सुने होंगे, पर क्या आपको पता हैं सम्राट अकबर की मुलाकात बिरबल से कैसे हुई थी। चलिए जानते हैं. – एक बार बादशाह अकबर शिकार के लिए निकले थे, घोडे़ पर सरपट दौड़ते हुए उन्हें पता ही नहीं चला और वो बहुत आगे निकल गये और केवल कुछ सिपाहियों को छोड़ कर बाकी सेना पीछे रह गई। शाम भी हो गयी थी, सभी भूखे और प्यासे थे, और समझ गए थे की वो रास्ता भटक गए हैं। बादशाह को समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरफ जाएं। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक तिरछा नजर आया। वहाँ बादशाह को लगा की अब किसी तरह वे अपनी राजधानी पहुंच ही जाएंगे। लेकिन तिरछा रास्ता मे जाएं तो जाएं किस तरफ, बादशाह उलझन में थे। वे सभी सोच में थे किंतु कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी। तभी उन्होंने देखा कि एक लड़का उन्हें सड़क के किनारे खड़ा-खडा़ घूर रहा है। सैनिकों ने यह देखा तो उसे पकड़ कर बादशाह के सामने पेश किया।

बादशाह सलामत ने कड़कती आवाज में पूछा, ये लड़के, आगरा के लिए कौन-सी सड़क जाती है? लड़का मुस्कुराया और कहा- जनाब, लोग चलते हैं, रास्ते नहीं। यह सुनकर बादशाह बड़ी प्रसन्न हुए और कहा- नहीं, तुम ठीक कह रहे हो, तुम्हारा नाम क्या है, तब उस लड़के ने उत्तर दिया मेरा नाम महेश दास है महाराज, इसके बाद बादशाह अकबर ने अपनी अंगूठी निकाल कर महेश दास को देते हुए कहा मुझे निडर लोग पसंद हैं। तुम मेरे दरबार में आना और मुझे यह अंगूठी दिखाना। यह अंगूठी देख कर मैं तुम्हें पहचान लूंगा। अब तुम मुझे बताओ कि मैं किस रास्ते पर चलूं ताकि मैं आगरा पहुंच जाऊं। महेश दास ने सिर झुका कर आगरा का रास्ता बताया और जाते हुए हिंदुस्तान के सम्राट को देखता रहा और इस तरह बादशाह अकबर भविष्य के बीरबल से मिले।

मृत्यु – अकबर को पेचिश की बीमारी हुई, तीन सप्ताह तक बीमार रहने के बाद अंत: वे कभी ठीक नहीं हो पाए. उनकी मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को हुई। उसके बाद आगरा में उनकी समाधी बनाई गयी।

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