सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का इतिहास | Chandragupta Maurya History In Hindi

Chandragupta Maurya / चन्द्रगुप्त मौर्य भारत के महान सम्राट थे। इन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी। वह भारत के पहले ऐसे सम्राट थे जिन्होने अखंड भारत का निर्माण किया था। चन्द्रगुप्त पूरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल रहे। सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण की तिथि साधारणतया 322 ई.पू. निर्धारित की जाती है। उन्होंने लगभग 24 वर्ष तक शासन किया, और इस प्रकार उनके शासन का अंत प्राय: 298 ई.पू. में हुआ।

Chandragupta Maurya History & Biography In Hindi

    About Chandragupta Maurya Biography In Hindi – सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

पूरा नाम     —   चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य
जन्म           —   340 ई. पू.
जन्म स्थान   —   मगध, भारत
संतान         —   बिन्दुसार
उपलब्धि      —  सम्राट
शासन काल  —  322 से 298 ई. पू.

चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति थे। जब वह किशोर ही थे, उन्होने पंजाब में पड़ाव डाले हुए यवन (यूनानी) विजेता सिकंदर से भेंट की। उन्होने अपनी स्पष्टवादिता से सिकंदर को नाराज़ कर दिया। सिकंदर ने उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया, लेकिन वह अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए हुआ सिकंदर के शिकंजे से भाग निकले और कहा जाता है। कि इसके बाद ही उसकी भेंट तक्षशिला के एक आचार्य चाणक्य या कौटिल्य-से हुई।

मौर्य साम्राज्य को इतिहास के सबसे सशक्त सम्राज्यो में से एक माना जाता है। अपने साम्राज्य के अंत में चन्द्रगुप्त को तमिलनाडु (चेरा, प्रारंभिक चोला और पंड्यां साम्राज्य) और वर्तमान ओडिसा (कलिंग) को छोड़कर सभी भारतीय उपमहाद्वीपो पर शासन करने में सफलता प्राप्त की थी। उनका साम्राज्य पूर्व में बंगाल से अफगानिस्तान और बलोचिस्तान तक और पश्चिम के पकिस्तान से हिमालय और कश्मीर के उत्तरी भाग में फैला हुआ था, और साथ ही दक्षिण में प्लैटॉ तक विस्तृत था।

शासन की सुविधा की दृष्टि से संपूर्ण साम्राज्य को विभिन्न प्रांतों में विभाजित कर दिया गया था। प्रांतों के शासक सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होते थे। राज्यपालों की सहायता के लिये एक मंत्रिपरिषद् हुआ करती थी। केंद्रीय तथा प्रांतीय शासन के विभिन्न विभाग थे और सबके सब एक अध्यक्ष के निरीक्षण में कार्य करते थे। साम्राज्य के दूरस्थ प्रदेश सड़कों एवं राजमार्गों द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे। पाटिलपुत्र (आधुनिक पटना) चंद्रगुप्त की राजधानी थी। मौर्य शासन प्रबंध की प्रशंसा आधुनिक राजनीतिज्ञों ने भी की है जिसका आधार ‘कौटिलीय अर्थशास्त्र’ एवं उसमें स्थापित की गई राज्य विषयक मान्यताएँ हैं। चंद्रगुप्त के समय में शासनव्यवस्था के सूत्र अत्यंत सुदृढ़ थे।

चंद्रगुप्त मौर्य के जन्म और वंश संबंध में विभिन्न मत हैं कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नही हैं :-

 चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है। चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में चाणक्य चंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार नंद वंश द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। संयोगवश उसकी भेंट चंद्रगुप्त से हो गई और वह उसे तक्षशिला ले गया।

 धुंढिराज के मतानुसार चंद्रगुप्त का पिता मौर्य था और सर्वार्थसिद्धि ने अपना सेनापति अपने नंद पुत्रों को न बनाकर मौर्य को बनाया था, इस पर नंद बंधुओं ने छल से मौर्य तथा उसके सब पत्रों को मरवा दिया, केवल चंद्रगुप्त भाग निकला। नंदों का एक दूसरा शत्रु चाणक्य भी था। समान शत्रुता के कारण ये दोनों मित्र बन गए।

 वृत्तांतों के अनुसार चंद्रगुप्त का जन्म मोरिय नामक क्षत्रिय जाति में हुआ था जिनका शाक्यों के साथ सम्बन्ध था। अपनी जन्मभूमि छोड़कर चली आने वाली मोरिय जाति का मुखिया चंद्रगुप्त का पिता था। दुर्भाग्यवश वह सीमांत पर एक झगड़े में मारा गया और उसका परिवार अनाथ रह गया। उसकी अबला विधवा अपने भाइयों के साथ भागकर पुष्यपुर (कुसुमपुर पाटलिपुत्र) नामक नगर में पहुँची, जहाँ उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। सुरक्षा के विचार से इस अनाथ बालक को उसके मामाओं ने एक गोशाला में छोड़ दिया, जहाँ एक गड़रिए ने अपने पुत्र की तरह उसका लालन-पालन किया और जब वह बड़ा हुआ तो उसे एक शिकारी के हाथ बेच दिया, जिसने उसे गाय-भैंस चराने के काम पर लगा दिया। कहा जाता है कि एक साधारण ग्रामीण बालक चंद्रगुप्त ने राजकीलम नामक एक खेल का आविष्कार करके जन्मजात नेता होने का परिचय दिया। इस खेल में वह राजा बनता था और अपने साथियों को अपना अनुचर बनाता था। वह राजसभा भी आयोजित करता था जिसमें बैठकर वह न्याय करता था। गाँव के बच्चों की एक ऐसी ही राजसभा में चाणक्य ने पहली बार चंद्रगुप्त को देखा था।

 कुछ लोग चंद्रगुप्त को मुरा नाम की शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नंद सम्राट की संतान बताते हैं पर बौद्ध और जैन साहित्य के अनुसार यह मौर्य (मोरिय) कुल में जन्मा था और नंद राजाओं का महत्त्वाकांक्षी सेनापति था। चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रंथों, मुद्राराक्षस, विष्णुपुराण की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की धुण्डिराज द्वारा रचित मुद्राराक्षस की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।

 बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’ के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है। चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है।

चंद्रगुप्त की मृत्यु :-

50 वर्ष की उम्र में चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म से काफी प्रेरित होकर जैन धर्म का अनुयायी बन गये और जैन संत भद्रबाहु को अपना गुरु बना लिया। 298 BC में अपना साम्राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार को सौंप दिए। चन्द्रगुप्त मौर्य उसके बाद कर्नाटक की श्रवनबेलोगॉला गुफाओ में चले गये और 5 सप्ताह तक बिना खाए पिए तप किया और अंत में संथारा (भूख से मर जाना) से मौत को प्राप्त हो गया।

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